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किसी जीव पर प्रहार करना अर्थात स्वयं पर प्रहार करने जैसा है जीवदया अपनी ही दया हैं.

*🌧️विंशत्यधिकं शतम्* *📚📚📚श्रुतप्रसादम्🌧️* 🌧️ 6️⃣3️⃣ 🪔 किसी जीव पर प्रहार करना अर्थात स्वयं पर प्रहार करने जैसा है जीवदया अपनी ही दया हैं.! 🛑 नेत्र रोग,अंधापन विकृत देह,भीभत्स रूप संपत्ति की निर्धनता आदि प्रतिकूलता से भरी जिंदगी जीवहिंसा का ही परिणाम है.! 🌻 अतः हिंसा का परित्याग करो.! *📗श्रीसार समुच्चय कुलक*   🌷 *तत्त्वचिंतन:* *मार्गस्थ कृपानिधि* *सूरि जयन्तसेन चरण रज* मुनि श्रीवैभवरत्नविजयजी म.सा.   *🦚श्रुतार्थ वर्षावास 2024🦚* श्रीमुनिसुव्रतस्वामी नवग्रह जैनसंघ @ कोंडीतोप, चेन्नई महानगर  

मुलमुनीजी म.सा. कठीण जीवन जगले-साध्वी प. पू. सत्यसाधनाजी म. सा.

Sagevaani.com /जालना: नऊ वर्षाचे असतांना आई आणि बारा वर्षाचे असतांना वडीलांचे छत्र हरवल्यानंतर मुलमुनी म. सा. अत्यंत कठीण परिस्थितीतून गेलेl परंतू ते डगमले नाहीत तर खंबीरपणे उभे राहिले, असा हितोपदेश संथारा प्रेरिका उपप्रवर्तीनी प. पू. सत्यसाधनाजी म. सा. यांनी येथे बोलतांना दिलाl तपोधाम परिसरातील गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात त्या बोलत होत्या. यावेळी विचारपीठावर संथारा प्रेरिका उपप्रवर्तीनी प. पू. सत्यसाधनाजी म. सा व अन्य काही साध्वींची याप्रसंगी उपस्थिती होतीl प्रवचनाच्या प्रारंभीच साध्वी प. पू. सत्यसाधनाजी म. सा. यांनी प्रभूंचे गुणगाण केले. दुनियामें देव अनेक है। पर अरिहंत क्या कहना॥ पुढे बोलतांना साध्वी प. पू. सत्यसाधनाजी म. सा. म्हणाल्या की, ज्यांच्या डोक्यावरील आई- वडीलांचे छत्र हरपते त्यांना खर्‍या अर्थाने जीवनाचा अर्थ कळतो. राजस्थानमध्ये गादिया कुटूंबात जन्मल...

तेरापंथ जैन विद्यालय पट्टालम का 26 वां वार्षिक खेल दिवस आयोजित

Sagevaani.com /चेन्नई: तेरापंथ जैन विद्यालय, पट्टालम, चेन्नई का 26वॉ खेल दिवस नेहरू स्टेडियम में प्रातःकालीन बेला में दिवस मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ ईष्ट वंदना से किया गया। विद्यालय प्रबंधन समिति सदस्यों व मुख्य अतिथि के द्वारा ध्वजारोहण किया गया। छात्रों द्वारा भव्य मार्चपास्ट किया गया। खेल सचिव शशिप्रभा ने मशाल प्रज्जवलित की। मुख्य अतिथि श्री धर्मेन्द्र प्रताप यादव आईएएस, प्रिंसीपल सेकेट्री टू गवर्मेन्ट हैंडलूम, हैंडीक्राफ्ट, टैक्सटाइल एंड खादी डेवलेपमेंट गवर्मेंट ऑफ तमिलनाडु का सम्मान विद्यालय कार्यकारिणी के सदस्यों द्वारा किया गया। स्वागत भाषण प्रधानाचार्य श्रीमती आशा क्रिस्टी ने दिया। मुख्य अतिथि ने विद्यालय के राजकीय स्तर पर प्रतिभाशाली छात्रों को सम्मानित किया। कप्तानों ने निष्पक्ष जाँच के लिए शपथ ग्रहण ली। पश्चात् सन् 2024 के खेलों की उद्‌घोषणा की गई। चारों हाउस के बच्चों ने ...

जो आत्मा को परतंत्र करता हैं, दु:ख देता है,

वीरपत्ता की पावन भूमि आमेट के जैन स्थानक मे साध्वी चन्दन बाला ने कहा जो आत्मा को परतंत्र करता हैं, दु:ख देता है, संसार में परिभ्रमण कराता है उसे कर्म कहते हैं। अनादि काल से जीव का कर्म के साथ सम्बन्ध चला आ रहा है, इन दोनो का अस्तित्व स्वत: सिद्ध है। ‘मैं हूँ।” इस अनुभव से जीव जाना जाता है और जगत में कोई दरिद्र है कोई धनवान है, कोई रोगी है कोई स्वस्थ्य है इस विचित्रता से कर्म का अस्तित्व जाना जाता है। वे कर्म मुख्य रुप से आठ प्रकार के हैं – (1) ज्ञानावरणी (2) दर्शनावरणी (3) वेदनीय (4) मोहनीय (5) आयु (6) नाम (7) गोत्र (8) अंतराय साध्वी विनीत प्रज्ञा ने कहा शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होती है। माना जाता है कि जो व्यक्ति के कर्मों के आधार पर अपना जीवन व्यतीत करता है, उसे जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है। ऐसे म...

साधना की अभिव्यक्ति है ध्यानयोगी आध्यात्म योगी, मौन साधक है आचार्य डॉ. शिवमुनीजी म.सा.- साध्वी डॉ. राज श्री जी

साधना पथ के योगी! साधना की अभिव्यक्ति है ध्यानयोगी आध्यात्म योगी, मौन साधक है आचार्य डॉ. शिवमुनीजी म.सा.- साध्वी डॉ. राज श्री जी म.सा. आज आकुर्डी स्थानक भवनमें तीन महापुरुषों का जन्मोत्सव आध्यात्मिक रुपसे महासाघ्वी डॉ. राज श्रीजी डॉ. मेघा़श्रीजी, साध्वी समिक्षा श्री जी, साध्वी जिनाज्ञा श्री जी के सानिध्य में अनेक गणमान्य श्रावक श्राविका के उपस्थिती में मनाया गया! “ पुच्छिसुणं” जाप के 13 वे गाथा का संपुट हुआ! साध्वी समिक्षा श्री जी ने “ मिला मुझको तो वरदान है, खिला खुशियोंका उद्यान है !” यह सुंदर भजन सादर किया! डॉ. राज श्री जी, डॉ. मेघा़श्री जी साध्वी जिनाज्ञा श्री जी ने श्रमण संघ के प्रथम आचार्य पु. आत्मारामजी म. सा. चतुर्थ पट्टधर डॉ. शिवमुनीजी म.सा, दादगुरुणीसा कुसुमवती जी के गुण विशेष आध्यात्म आस्था का गौरवपूर्ण उल्लेख करएवं अनुभव कथन किये! Near (गुरु के पास रहकर ज्ञान पाना) Hear (गुरुवा...

श्रावक के 14 नियम जो हमें रोज़ लेने चाहिये

  *१. सचित्त :- सचित्त अर्थात जिस पदार्थ में जीव राशि है ।* इसमें सचित पदार्थो के सेवन की दैनिक मर्यादा रखी जाती है।जैसे कच्ची हरी सब्जी , कच्चे फल , नमक , कच्चा पानी, कच्चा पूरा धान आदि का सम्पूर्ण त्याग अथवा इतनी संख्या से अधिक उपयोग नही करूँगा ऐसा नियम करना । ( 3, 5 ,7 आदि )   *२ . द्रव्य :- खाने – पीने की वस्तु / द्रव्य की प्रतिदिन मर्यादा रखनी है , इसमें पदार्थो की संख्या का निश्चय किया जाता है ।* भिन्न भिन्न नाम व स्वाद वाली वस्तुएं इतनी संख्या से अधिक खाने के काम में नहीं लूँगा । जैसे खिचड़ी , रोटी, दाल, शाक, मिठाई, पापड़, चावल आदि की मर्यादा करना । (11, 15, 21 आदि )   *३ . विगय :-* : – प्रतिदिन तेल घी दूध दही शक्कर / गुड तथा घी या तेल में तली हुयी वस्तु ये छः विगय है । इनका यथाशक्ति त्याग करना या रोज कम से कम 1 विगय त्याग करना ।   *४. उपानह :- जूता, मोजा, चप...

82 दिवसीय “धर्म- चक्र तप” श्रीमती कल्पना जी बसवंतलालजी कोचर द्वारा संप्पन्न

आचार्य भगवंत विश्वकल्याण सुरिश्वरजी के सानिध्य मे 82 दिवसीय “धर्म- चक्र तप” श्रीमती कल्पना जी बसवंतलालजी कोचर द्वारा संप्पन्न! लोणी (धामणी) – प्रतिष्ऱ्ठाचार्य, पुना जिला तिर्थउद्धारक आचार्य पु. विश्वकल्याण जी म.सा. आदि ठाणा लोणी धामणी मे चातुरमासार्थ विराजमान है! गुरुदेवने धर्म संदेश मे तप अनुमोदना कर सत्संग, तप, दान, धर्म, आराधना और संघटित रह कर कार्य करनेका एहलान किया! गुरुदेव के निश्रा मे श्रीमती कल्पना जी कोचर ने 82 दिवसीय “ धर्मचक्र- तप आराधना” कर एक उच्चांक प्रस्थापित कियाl संघ समाज सह कोचर परिवारका नाम रोशन किया! इसके पुर्व अनेक 11 बार विविध तपधारणा कर आत्माका कल्याण किया है! श्री उव्वसग्गहरं तप, पॉंच मेरु पर्वत तप, शत्रुंजय गिरिराज तप, सौभाग्य तप, मेरुदंड तप, तीन उपध्यान तप(110 दिन)108 पार्श्वनाथ तप, अठाई तप पॉंच बार, 24 तिर्थंकर भगवान तप,आयंबील ओली तप 28 बार, वर्षितप, और अब ...

आत्मदर्शन क्यां है-साध्वी प.पू. हर्षप्रज्ञाजी म. सा.

Sagevaani.com /जालना: समोरा- समोर घेतले जाते ते दर्शन! दर्शन या शब्दाचा अर्थ असा आहे की, देखना! आपण एखादी मुव्ही बघायला जातो, ती तीन तासाची मुव्ही पाहयला आपल्या आत्मदर्शन होते? तर नाही ना, अशाच प्रकारे आपण दर्शन तर घेतो पण आत्मदर्शन कुठे आहे, हा प्रश्न शेवटी उरतोच, असा हितोपदेश साध्वी प.पू. हर्षप्रज्ञाजी म. सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. तपोधाम परिसरातील गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात त्या बोलत होत्या. यावेळी विचारपीठावर संथारा प्रेरिका उपप्रवर्तीनी प. पू. सत्यसाधनाजी म. सा व अन्य काही साध्वींची याप्रसंगी उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना साध्वी प.पू. हर्षप्रज्ञाजी म. सा. म्हणाल्या की, तुम्ही या गणेश दरबारात येतात, कशासाठी येतात. तर गुरु गणेशलालजी म. सा. यांचं दर्शन घेण्यासाठी! आपण सुट्ट्यांच्या दिवसात लोणावला, महाबळेश्वर, हॉटेलात जातो तेथे गेल्यानंतर काय करतो तर जी वस्तू...

सबके साथ प्रेम की दृष्टि रखो

आज हमको उत्तम धर्म मानव भाव उत्तम गुरु और सर्वज्ञ प्रभु का शासन मिल गया है इस भाव में जाकर हमने क्या किया है, जीवन को कैसे दिया है..? जीवन कैसे बनाना है सुगंधित सुभाषित बनाना है बहुत भाव से गंदगी जमा की है भीतर के घर में कचरे का कोई पार नहीं हैl अगर कचरे को साफ नहीं किया तो भविष्य अंधकार में यहां से जाने का समय होगा तब कर्म सत्ता हमें पूछेगीl तुझे इस अच्छे भव में भेजा सतगुरु के पास बैठाया तू वहां बैठकर क्या करके आया मानव बनकर आया या समय ज्ञान प्राप्त करके आयाl साधुता को धारण कर सिद्ध गति का परमिशन लेकर आया बताओ आपके पास क्या जवाब है? दिन बनकर यानी कहना पड़े कि मैं सिर्फ टाइम पास करके आया जाना पक्का हैl मुद्दत मिली है तो जवाब देने की तैयारी रखना पड़ेगा ना जिंदगी को साफ सुथरा करके सुगंध से भर दl आप कहेंगे हम तो सवेरे स्नान करके स्प्रे सेंट अत्तर सब कुछ लगा कियाl हमारे सब भाइयों कहना तो बहुत ...

एक ही लक्ष्य देहनाश के पूर्व कर्मनाश

*☀️प्रवचन वैभव☀️* 🌧️ 6️⃣2️⃣ 🪔 306) एक ही लक्ष्य देहनाश के पूर्व कर्मनाश.! 307) कोई व्यक्ति या देवता न मेरा दुख ले सकता हैं न मुझे दुख दे सकता हैं.! मेरे अंतर के मलिन परिणाम ही मेरे दुख का कारण हैं.! 308) प्रभु कहते है की थोड़ा दुख सहन करलें अनंत सुख भेट में मिलेगा.! 309) बूंद मात्र विषय भोग की लालसा में अनंत दुखो की कैद मिलेगी.! 310) देह के ममत्व का त्याग होगा वही से साधना का मंगल प्रारंभ होगा.! 🌧️ *प्रवचन प्रवाहक:* *सूरि जयन्तसेन चरणरज* मुनि श्रीवैभवरत्नविजयजी म.सा.   *🦚श्रुतार्थ वर्षावास 2024🦚* श्रीमुनिसुव्रतस्वामी नवग्रह जैनसंघ @ कोंडीतोप, चेन्नई महानगर

भारतीय दर्शन में सत् का स्वरूष

क्रमांक – 4 . *तत्त्व – दर्शन*  *🔹भारतीय दर्शन में सत् का स्वरूष* *👉 ‘सत्’ शब्द अस्तित्व का वाचक है। विश्व में जितने भी अस्तित्ववान पदार्थ हैं, वे सब सत् हैं। जड़ और चेतन-दोनों प्रकार के पदार्थों का समावेश सत् में हो जाता है। इस दृष्टि से सत्, वस्तु, तत्त्व, द्रव्य, पदार्थ एक ही अर्थ के बोधक शब्द हैं।* *सत् के स्वरूप के सन्दर्भ में भारतीय दर्शन में पांच मान्यताएँ हैं-* *1. सत् का स्वरूप कूटस्थ नित्य है। उसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता। वेदान्त दर्शन इस सिद्धान्त का समर्थक है।* *2. सत् का स्वरूप अनित्य है। वह हर क्षण परिवर्तनशील है। बौद्ध दर्शन इस सिद्धान्त का समर्थक है।* *3. चेतन सत् (पुरुष) कूटस्थ नित्य तथा अचेतन सत् (प्रकृति) परिणामी नित्य है। सांख्य दर्शन इस सिद्धान्त का पोषक है।* *4. परमाणु, आत्मा आदि कुछ सत् कूटस्थ नित्य तथा घट-पट आदि कुछ सत् अनित्य हैं। इस मत...

शल्य रहित अंतर में प्रभु पधारते हैं

*☀️प्रवचन वैभव☀️* 🌧️ 6️⃣1️⃣ 🪔 301) शल्य रहित अंतर में प्रभु पधारते हैं.! 302) वीतराग धर्म की आराधना से भाव परिवर्तन नही हो रहा तो हमे अपनी रीत का निरीक्षण करना चाहिए.! 303) जिसका व्यवहार कमजोर होता है.. लोक विरुद्ध,शास्त्र विरुद्ध आज्ञाविरुद्ध हो ऐसे लोगो का निश्चय भी खोखला ही होता है..! 304) जिस सुख के आने से धर्म छूट जाए आत्मार्थी को ऐसे सुख का.? 305) इच्छाओं के अंत से मोक्ष का प्रारंभ होता हैं.! 🌧️ *प्रवचन प्रवाहक:* *सूरि जयन्तसेन चरणरज* मुनि श्रीवैभवरत्नविजयजी म.सा. *🦚श्रुतार्थ वर्षावास 2024🦚* श्रीमुनिसुव्रतस्वामी नवग्रह जैनसंघ @ कोंडीतोप, चेन्नई महानगर  

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