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संसार में वही फंसेगा जो आसक्ति में फंसा हुआ है- युवाचार्य महेंद्र ऋषि

 एएमकेएम में उत्तराध्ययन सूत्र के 25 व 26वें अध्यायों का हुआ स्वाध्याय एएमकेएम में चातुर्मासार्थ विराजित श्रमण संघीय युवाचार्य महेंद्र ऋषिजी ने उत्तराध्ययन सूत्र के 25वें यज्ञीय अध्याय की विवेचना करते हुए कहा कि भगवान महावीर ने चारों आघाती कर्म नष्ट किए और सिद्ध बुद्ध हो गए। यदि हमें भी कर्मों की निर्जरा करनी है तो पाप से बचना पड़ेगा। इस अध्याय में एक सुंदर प्रसंग है। वाराणसी नगरी में दो सगे भाई जयघोष व विजयघोष रहते थे। वहां बहुत विशाल पैमाने में ब्राह्मण वर्ग रहता था। वे दोनों भाई स्नान के लिए नदी पर गए। वहां एक पंछी को देखा, जिसके मुंह में सांप था। यह देखकर वे सोचने लगे कैसा है यह संसार। उन्होंने वहां संसार की नश्वरता देखी। उन्होंने कहा ब्राह्मण हमारे यहां ज्ञान, उपासना करने वाला वर्ग है। जयघोष ने चिंतन करते हुए मुनि दीक्षा ग्रहण की। विजयघोष भी वेदों का ज्ञाता था। मुनि जयघोष विजयघोष के य...

पाप के अठारह प्रकार हैं

क्रमांक – 35 . *तत्त्व – दर्शन*  *🔹 तत्त्व वर्गीकरण या तत्त्व के प्रकार* *👉जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं – जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष।* *🔅 पाप तत्त्व* *पाप के अठारह प्रकार हैं-* *09. लोभ : पदार्थों की लालसा या लालच प्रवृत्ति लोभ पाप है।* *10. राग : प्रियता और रागात्मक प्रवृत्ति राग पाप है। राग व्यक्त और अव्यक्त दोनों प्रकार का है। रागात्मक प्रवृत्ति में माया और लोभ का अस्तित्व रहता है। आसक्ति रूप जीव का परिणाम राग है।* *11. द्वेष : अप्रियता या द्वेषात्मक प्रवृत्ति द्वेष पाप है। द्वेष व्यक्त और अव्यक्त दोनों प्रकार का है। द्वेषात्मक प्रवृत्ति में क्रोध और मान का अस्तित्व रहता है। अप्रीति रूप जीव का परिणाम द्वेष है।* *12. कलह : लड़ाई-झगड़ा करना कलह पाप है। हाथापाई, अपशब्द प्रयोग आदि कलहकारी प्रवृत्ति है।* *13. अभ्याख्यान : मिथ्या दोषारोपण...

स्वाध्याय का सिंचन नकारात्मक तत्वों को दूर करता है- युवाचार्य महेंद्र ऋषि

एएमकेएम में उत्तराध्ययन सूत्र के 23वें और 24वें अध्याय का हुआ स्वाध्याय एएमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर में चातुर्मासार्थ विराजित श्रमण संघीय युवाचार्य महेंद्र ऋषिजी ने रविवार को उत्तराध्ययन सूत्र की 23वें अध्ययन केशी गौतमीय की विवेचना करते हुए कहा कि हमने पिछले अध्यायों में देखा कि उत्तराध्ययन सूत्र में अनेकों संवाद दिए गए। हर जगह ऐसी चर्चाएं आती है, जिनके माध्यम से हम गूढ़ रहस्यों को समझ सकें। ऐसा ही एक मधुर संवाद केशीकुमार श्रमण, जो पार्श्वनाथ परंपरा के थे, ने गौतमस्वामी के साथ किया। दोनों प्रचंड विद्वान और विशिष्ट ज्ञानी थे। इस अध्याय में श्रावस्ती नगरी के तिनुक उद्यान में दोनों में जो चर्चा हुई, उसका रोचक वर्णन है। वह एक अद्भुत दृश्य, प्रसंग होगा। जिन लोगों ने स्वयं प्रत्यक्ष अनुभव किया, वे वास्तव में धन्य थे। यह हमारा पुण्य है कि उस संवाद को सुनकर भावों से वहां पहुंचने का सौभाग्य मिला। श्...

“समाज-भुषण” “ समाज- रत्न” श्रीमान विजयकांत जी कोठारी का “ सहस्र- चंद्र दर्शन” संप्पन्न

“समाज-भुषण” “ समाज- रत्न” श्रीमान विजयकांत जी कोठारी का “ सहस्र- चंद्र दर्शन” संप्पन्न! गुरु भगवंतो का पाया आशिर्वाद! पुनाः महाराष्ट्र गौरव, खान्देश भुषण पु. गौतम मुनीजी म. सा. के पावन सानिध्य मे विजयकांतजी को आज विविध सामाजिक, राजनितीक संस्थाओं द्वारा नवाजा गया! इस मंगलमय पावन अवसरपर विजयकांतजी का गुण गौरव करते समय उनके अविरत, अविश्रांत परिश्रम की, लगन, कार्यक्षमता, सकारत्मकता, संकल्प पुर्ति, निद्रा छोड काममे स्वयंको झोक देना. आलस्य से दुर आदि गुण विशेषो का वर्णन कर गुरु सुमति-विशाल-आशिष गुरुपरिवार द्वारा साधुवाद प्रदान किया और सदैव कार्यरत रहनेकी प्रेरणा दी! महावीर प्रतिष्ठान के प्रांगण मे हुये इस शानदार समारोह मे पुनाके सकल जैन समाज, जितो, महावीर स्कुल, विविध संघ एवं संस्थाओं के पदाधिकारीयो द्वारा विजयकांत जी के सन्मानीत किया गया! इस शुभ अवसर पर प्रसिध्द उद्योजक भामाशा प्रकाशजी धारिवाल,...

उत्तराध्ययन सुत्र समुद्रासारखं असलं तरीही-प. पू. हर्षप्रज्ञाजी म. सा.

Sagevaani.com /जालना: श्रीमद् उत्तराध्ययन सुत्र हे समुद्रासारखं असलं तरीही प्रभूंनी आमच्यासाठी त्यात लहान- लहान सुत्राचा समावेश केला आहे. जो की आपल्यासाठी आहे. समुद्राचं पाणी आपण पूर्णपणे पीऊ शकत नाहीत, परंतू घड्यात असलेलं पाणी ग्लासाने थोडे- थोडे पीऊ शकतो, अगदीत्याच प्रमाणे उत्तराध्यन सुत्राचेही आहे, असा हितोपदेश साध्वी प. पू. हर्षप्रज्ञाजी म. सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. तपोधाम परिसरातील गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात त्या बोलत होत्या. पुढे बोलतांना साध्वी प. पू. हर्षप्रज्ञाजी म. सा. म्हणाल्या की, ज्याप्रमाणे आपण समुद्र, तलाव आणि नदीचं पाणी एकसाथ पीऊ शकत नाही. परंतू तेच पाणी घड्यात भरल्यानंतर आपण त्यासोबतच एक तांब्या आणि एक ग्लास ठेवतो. ज्यामुळं आपल्याला थोडे- थोडे करुन ते पाणी गृहण करणे सोपे जाते. अगदी याचप्रमाणे उत्तराध्यन सुत्राचंही आहे. उत्तराध्यन सुत्र समुद्...

बड़े दोषों का कारण है छोटे दोष

*☀️प्रवचन वैभव☀️*   *🪷 सद् उपदेशक:🪷* *शासननिष्ठ सद्गुरु* *सूरि जयन्त सेन कृपाप्राप्त,* श्रुत साधक क्षमाश्रमण, मुनि श्रीवैभवरत्नविजयजी म.सा. ✒️ 9️⃣8️⃣ 🔊 *_486)_* बड़े दोषों का कारण है छोटे दोष.! *_487)_* ज्ञानी दुःख के कारणों के प्रति घृणा द्वेष या क्रोध नही रखते.! *_488)_* कदाग्रह सुकुन छीन लेता है.! *_489)_* पाप क्रिया से अधिक घातक है पाप की रुचि.! *_490)_* जो चीज व्यर्थ है,नश्वर है उसकी प्राप्ति के लिए दुख भुगतना तो मूर्खता हैं.!   *🦚श्रुतार्थ वर्षावास 2024🦚*

जब तक भोगों की अधीनता नहीं छोड़ते, अनाथता सबके लिए है- युवाचार्य महेंद्र ऋषि

एएमकेएम में उत्तराध्ययन सूत्र का स्वाध्याय एएमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर में चातुर्मासार्थ विराजित श्रमण संघीय युवाचार्य महेंद्र ऋषिजी ने उत्तराध्ययन सूत्र के 20वें महानिर्ग्रंथीय अध्याय की विवेचना करते हुए कहा कि यह एक तरह से सभी के मानसिक, आत्मिक स्वास्थ्य को निरंतर करने वाला एक रसायन है। यह रसायन आप अलग-अलग भावों में ले सकते हैं। जन्म की बीमारी, उपाधि- व्याधि मिटाना चाहते हैं तो उसके लिए यह रसायन है। इसमें महानिर्ग्रन्थ की चर्या एवं मौलिक सिद्धांतों का वर्णन हुआ है। इस अध्याय का प्रारंभ अनाथी मुनि और श्रेणिक महाराजा की वार्तालाप से होता है। मुनि अनाथी का नाम मूल ग्रंथ में कहीं नहीं है। उसमें उनके भाव दिल को इससे जोड़ने वाले हैं। इस अध्याय में हम पारंपरिक रूप से जिस पंच परमेष्ठि की आराधना करते हैं उनका संक्षिप्त परिचय है। राजा श्रेणिक महारानी के साथ उद्यान भ्रमण को आए हुए हैं। उनकी दृष्टि म...

संसारापेक्षाही दिक्षा घेण्यात आनंद-प. पू. हर्षप्रज्ञाजी म. सा.

Sagevaani.com /जालना: संसार हा क्षणभंगुर आहे, त्यात सर्वत्र दु:खच दु:ख आहे. असे असतांनाही मनुष्य त्यालाच का चिकटून बसला आहे, हे कळत नाही. दिक्षा घेणे हे कधीही चांगले आहे. यात दु:ख नसून सुखाची अनुभूती आल्याशिवाय राहत नाही, म्हणून दिक्षा ही केव्हाही चांगलीच आहे, असा हितोपदेश साध्वी प. पू. हर्षप्रज्ञाजी म. सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. तपोधाम परिसरातील गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात त्या बोलत होत्या. तत्पूर्वी सभा मंडपात जप करण्यात आला. त्यानंतर प. पू. हर्षप्रज्ञाजी म. सा.मार्गदर्शन केले. त्ंंया म्हणाल्या की, ही आत्मा असून तिला त्रास देऊ नका, तीला त्रास दिल्याने आपले भले थोडेच होणार आहेे.संसार हा क्षणभंगुर आहे, त्यात सर्वत्र दु:खच दु:ख आहे. असे असतांनाही मनुष्य त्यालाच का चिकटून बसला आहे, हे कळत नाही. दिक्षा घेणे हे कधीही चांगले आहे. यात दु:ख नसून सुखाची अनुभूती आल्याश...

श्री हरिभद्राचार्यजी ने भावपूजा को सफल बनाने 33 कर्तव्यों का विधान किया है

*विंशत्यधिकं शतम्* *📚💎📚श्रुतप्रसादम्* 🪔 *तत्त्वचिंतन:* *मार्गस्थ कृपानिधि* *सूरि जयन्तसेन चरणरज* मुनि श्रीवैभवरत्नविजयजी म.सा.   9️⃣7️⃣ 📜 श्री हरिभद्राचार्यजी ने भावपूजा को सफल बनाने 33 कर्तव्यों का विधान किया है.. ⚡ माता पिता विद्यागुरु, धर्मगुरु आदि गुरुजनों के प्रति विनय बहुमान भाव रखना.! ⚡ हेय के त्याग में उपादेय का आचरण के यथाशक्ति प्रवृत्ति अवश्य करें.! ⚡ कुछ बोलने से पहले कार्य करने से पहले दीर्घदृष्टि से परिणाम का विचार करके ही प्रवृत्ति करनी.! ⚡ मृत्यु को सदैव दृष्टि में रखें अमरत्व लेके जन्मे है ऐसे भ्रम में कदापि न रहें जीवन की क्षणिकता एवं नश्वरता को सदैव ध्यान में रखें जिससे दुष्कृत्य पर रोक लगेगी.! *📚श्री ललितविस्तरा वृत्ति📚*  

उदय में आये हुये अशुभ कर्म पुद्गल को पाप कहते हैं

क्रमांक – 33 . *तत्त्व – दर्शन*  *🔹 तत्त्व वर्गीकरण या तत्त्व के प्रकार* *👉जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं – जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष।* *🔅 पाप तत्त्व* *उदय में आये हुये अशुभ कर्म पुद्गल को पाप कहते हैं। जैन सिद्धान्त दीपिका में कहा गया है- अशुभं कर्म पापम्। ज्ञानावरणादि अशुभ कर्मों को पाप कहा जाता है। उपचार से पाप के हेतु भी पाप कहलाते हैं, इससे पाप के अठारह भेद हो जाते हैं। जैसे- प्राण वध जिस पाप का हेतु होता है, उसे प्राणातिपात पाप कहते हैं। इसी प्रकार मृषावाद, अदत्तादान, मैथुन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, कलह, अभ्याख्यान, पैशुन्य, पर परिवाद, रति-अरति, मायामृषा और मिथ्या दर्शन शल्य- ये अठारह पाप होते हैं।* *पाप पुण्य का प्रतिपक्षी तत्त्व है। पाप का बंध मिथ्यात्व, अव्रत, प्रमाद, कषाय और अशुभ योग से होता है। पापाश्रव के ...

पुण्य की उत्पत्ति स्वतंत्र है या नहीं?

क्रमांक – 32 . *तत्त्व – दर्शन*  *🔹 तत्त्व वर्गीकरण या तत्त्व के प्रकार* *👉जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं – जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष।* *🔅 पुण्य तत्त्व* *🔹पुण्य की उत्पत्ति स्वतंत्र है या नहीं? धर्म के बिना पुण्य का बन्ध होता है या नहीं?* *👉 आत्मा की जितनी क्रिया होती है, उसके दो प्रकार हैं-अशुभ एवं शुभ। अशुभ से पाप-कर्म का बन्ध होता है और शुभ क्रिया से दो कार्य होते हैं-एक मुख्य, दूसरा गौण। शुभयोग की प्रवृत्ति से मुख्यतया कर्म-निर्जरा होती है और उसके प्रासंगिक फल के रूप में पुण्य-बंध होता है। यह पुण्य-बंध का स्वरूप है। अब इस विषय में ध्यान देने की बात यह है कि अशुभ प्रवृत्ति से तो पुण्य का बन्ध होता ही नहीं और जहां कहीं शुभ प्रवृत्ति होगी वहां निर्जरा अवश्य होगी। निर्जरा से आत्मा उज्ज्वल होती है, अतः वह धर्म है। इसके सिवाय कोई भी ऐसा स...

“डोर रिस्तों की” सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया

ब्यावर एसोसिएशन मद्रास का दीपावली मिलन समारोह “डोर रिस्तों की” सांस्कृतिक कार्यक्रम दिनांक -20 oct 2024 रविवार को सुबह राजा अन्नामलई मंडपम में आयोजित किया गया। ब्यावर एसोसिएशन के सचिव श्री राज़ेश बोहरा ने बताया कि इस समारोह में लगभग 600 सदस्यों ने शिरकत की । अध्यक्ष श्री अजीत जी गोठी ने सभी का स्वागत अभिनंदन किया । दिवाली चेयरमैन श्री सुनील रांका ने बताया कि ८५ लोगों ने अपनी प्रतिभा को मंच पर दिखाया । कमलेश कोठारी और मनीष कोठारी ने मंच संचालन किया। ब्यावर यूथ एसोसिएशन की टीम प्रवीण सपना सेठया अध्यक्ष श्री राकेश ललवानी की देख रेख में सांस्कृतिक रंगारंग कार्यक्रम नायब रूप से पेश किया गया।  प्रोग्राम की हाईलाइट “चार पीढ़ी” संयुक्त परिवार एक साथ स्टेज पर आये। ब्यावर एसोसिएशन के श्री भंवरलालजी अजीत जी गोठी परिवार ने समारोह के आयोजन का लाभ लिया। समारोह में पूर्व अध्यक्ष श्री सुभाष चंद रांक...

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