यहा गोपालपुरम स्थित छाजेड़ भवन में विराजित कपिल मुनि ने पर्वाधिराज पर्यूषण की शुरुआत पर कहा हमारा यह सौभाग्य है कि हमें पर्व प्रधान देश की संस्कृति में जन्म लेने का अवसर मिला है। पर्व पावनता के प्रतीक होते हैं। पर्यूषण पर्व एक लोकोत्तर पर्व है जिसका सन्देश और उद्देश्य आत्मा का शुद्धिकरण है। ये पर्व आत्म स्मरण और आत्म जागरण की पावन वेला है। इन ८ दिनों में अपनी आत्मा का हित चाहने वाले को देह के धरातल से ऊपर उठकर चेतन के धरातल पर जीने का पुरुषार्थ करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस लोकोत्तर पर्व को रीति रिवाज के तौर पर नहीं हार्दिकता से मनाना चाहिए। यह पर्व जीवन के लिए वरदान बने इसके लिए जीवन में धर्म की प्रेरणा का प्रकाश और आत्मगुणों के विकास के लिए वीतराग वाणी का श्रवण करना जरूरी है। इस संसार में सत्ता, संपत्ति, सम्मान और संतान सभी को प्रिय है लेकिन तत्वदर्शियों ने गहन चिंतन करके इन सभी को नश्व...
अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने गुरुवार को पर्यूषण पर्व आरंभ होने के अवसर पर कहा कि साल भर के लंबे इंतजार के बाद पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व की सुनहरी बेला का आगमन हो गया है। इस महापर्व में सारे पर्व समाहित हो जाते हैं। भगवान ऋषभदेव और परमात्मा महावीर स्वामी के शासन में पर्यूषण की परंपरा है जबकि अन्य तीर्थंकरों के शासन में यह परंपरा नहीं है। पर्यूषण पर्व के दौरान हमें आत्मा के समीप रहने का अवसर प्राप्त होता है। यह पर्व हमें दया व करुणा का संदेश देता है। इस पर्व के आठ दिनों के दौरान आत्मा में लगे कषाय, राग-द्वेष आदि दागों को मिटाकर आत्मा की शुद्धि के लिए ज्यादा से ज्यादा तपस्या, धर्म ध्यान और परमात्मा की आराधना कर कर्मों की निर्जरा करने का प्रयास करना चाहिए। पर्वाधिराज पर्व हमें अहिंसा सिखाता है। हमें ऐसी चीजों का उपयोग करने से बचना चाहिए जिसमें किसी न किसी प्रकार की ...
यहां बेरी बक्काली स्ट्रीट स्थित शांति भवन में विराजित ज्ञानमुनि ने पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के शुभारंभ पर कहा कि इंसान अपने जीवन में आनन्द, बोध एवं प्रसन्नता चाहता है इसलिए इंसान की प्रसन्नता को देखते हुए समय समय पर पर्वो का आयोजन किया जाता है। मानव को महोत्सव अच्छा लगता है, पर्वो से इनके तनाव की दशा ठीक हो जाती है। मानसिक तनाव को दूर करने के लिए ही पर्व मनाते हैं। कुछ पर्व ऐसे हैं जिससे मनुष्य आलौकिक आराधना करने हैं। भौतिकता से हटकर धर्म की ओर चलते हैं। अज्ञान से हटकर ज्ञान की मार्ग पर चलने का समय ही है ये पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व है। जो आठ दिन मनाया जाता है। इन आठ कर्मो से ही आत्मा व परमात्मा का भेद होता है। मनुष्यों को ये आठ दिन आत्मा के शुद्धि करने व सारे कर्मो को धोने के प्रयास करना चाहिए। पर्यूषण पर्व आत्मा का संदेश लेकर आता है। ये 12 महिने की जमी हुई धुल को मिटाने का समय है। अपने आप क...
राष्ट्रसंत महोपाध्याय श्री ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि शांति, सिद्धि और प्रगति के द्वारों को खोलने का दुनिया में सबसे महत्त्वपूर्ण मार्ग ध्यान है। इंसान जब-जब दुखी, चिंतित अथवा तनावग्रस्त हुआ तब-तब ध्यान ने उसे समाधान का मार्ग दिया है। ध्यान ने अतीत को संवारा है और इसी से वर्तमान और भविष्य को संवारा जा सकता है। ध्यान तो जिंदगी की घड़ी में भरी जाने वाली चाबी है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने चैबीस घंटों को चार्ज कर सकता है। अध्यात्म का सार है ध्यान। जिस ईश्वरीय तत्त्व की तलाश व्यक्ति जीवनभर बाहर करता है, वह तो उसके भीतर है जिसका साक्षात्कार ध्यान से संभव है। महावीर और बुद्ध जैसे महापुरुषों ने ध्यान के माध्यम से ही परम सत्य को उपलब्ध किया था। उन्होंने कहा कि शरीर के रोगों को मिटाने के लिए मेडीसिन है और मन के रोगों को मिटाने के लिए मेडीटेशन है। अगर प्रतिदिन केवल बीस मिनिट का ध्यान किया जाए तो द...
कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि ने जैन दिवाकर दरबार में धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने 9 वें सामायिक व्रत के विषय में फरमाया है। सामयिक के बिना मुक्ति नहीं, सामयिक में तो आना ही पड़ता है। सामायिक का यह मतलब नहीं कि सिर्फ मुंहपति बांधकर बैठना – मन वचन काया की शुद्धि होना आवश्यक है. सामायिक में मन से बुरे विचार नहीं करना और कठोर या पापों की प्रवृत्ति हो ऐसे शब्द (वचन) नहीं बोलना। बिना विचारे सोचे समझे बिना वचन बोलने से महाभारत हो गया महासती द्रोपदी ने जो शब्द उच्चारित किया कि ” अंधे का जाया अंधा ” जिसके कारण कैसे कष्ट झेलने पड़े। इसलिये सामायिक में सावद्य भाषा का प्रयोग न करें। हिंसा कारी पापकारी कठोर वचन नहीं बोले सामायिक समता भाव में रहना सिखाती है। सामायिक आप कहीं पर भी किसी स...
महापुरुषों ने कभी कल्पना तक नहीं की होगी कि जिसको उन्होंने त्याग तपस्या समर्पण प्रेम और सद्भाव के साथ संपूर्ण मानव समाज को एकता के सूत्र में पिरोया आज उन्हीं के नाम पर उनके उपासक कन कन में बिखर जाएंगे। शायद अब जीवित होते तो इस दुर्दशा को देखकर सदमे से ही दम तोड़ देते उत्तर विचार राष्ट्र संत कमल मुनि कमलेश ने महावीर सदन में एकता का आव्हान करते हुए कहा कि अलग-अलग दिन जन्माष्टमी मनाना पर्युषण पर्व मनाना। यहां तक की दो कार्तिक मास आ जाते हैं तब दीपावली जैसा त्योहार भी एक महीना आगे पीछे तक मनाने को मजबूर हो जाते हैं। धर्म के नाम पर बिखराव से जनता ने उपहास के पात्र बनते हैं युवा पीढ़ी ने अनास्था पैदा हो जाती है। सामान्य जनता भी हंसी उड़ाती है कई धर्म की ओट में टकराव और बिखराव महापुरुषों को मानने वाले उनके के उपासक अपने हाथों अलग-अलग गुटों मे मना कर जनता की आस्था को तार तार करने का पाप तो नहीं कम...
अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने हमें अपनी वाणी का उपयोग कैसे करना है इस पर चिंतन करना चाहिए। वाणी हमेशा मधुर होनी चाहिए। कोयल भले ही काली हो लेकिन उसे वाणी का सौंदर्य प्राप्त है इसीलिए वह सबको प्यारी लगती है। वाणी का सौंदर्य संसार का सबसे बड़ा सौंदर्य है। हमें बोलने पर संयम बरतना चाहिए। ऐसे शब्दों का उपयोग नहीं करना चाहिए जिसे सुनकर किसी को ठेस पहुंचे बल्कि ऐसी वाणी बोलनी चाहिए कि सुनने वाला प्रसन्न हो जाए। शिक्षक दिवस के अवसर पर अपने उद्बोधन में कहा जीवन पथ पर आगे बढने में शिक्षक की अहम भूमिका होती है। शिक्षक ही हमारा मार्गदर्शन करते हैं। उन्होंने अतिथि संविभाग व्रत की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में अतिथि को देवता का रूप माना जाता है। भगवान महावीर ने दान देने का सुंंदर वर्णन किया है कि दान हमेशा शुद्ध भाव से देना चाहिए। चंदनबाला का वर्णन...
यहां जैन स्थानक में विराजित साध्वी मयंकमणि ने कहा हर आत्मा शुद्ध और निर्मल होता है लेकिन कर्म बंधन से अशुद्ध हो जाती है। शुभ व अशुभ कर्मो का बंध आत्मा निरंतर कर रही है। अशुभ विचार व अशुभ कर्मबंध एवं शुभ विचार शुभ कर्मबंध। अशुभ कर्म पाप और शुभ कर्म पुण्य है। कर्म चार प्रकार के होते हैं-स्पृष्ट,बद्ध, निबद्ध व निकाचित। कुछ कर्म ऐसे हीं टूट जाते हैं, कुछ कर्म थोड़ी मेहनत से, कुछ अधिक मेहनत व प्रायश्चित से टूट जाते हैं लेकिन कुछ कर्म ऐसे होते हैं जो भुगते बिना नहीं टूटते हैं। इसी प्रकार हम लोगों को भावों के हिसाब से फल मिलता है।
यहां शांति भवन में विराजित ज्ञानमुनि ने कहा हमारे मन में हमेशा उठने वाली इच्छाओं और अनिच्छाओं व वृत्तियों में हम विवेक शून्य होकर शिखर की ओर बढऩे की मंजिल को पाने की बात तो दुर कभी उस मार्ग पर जाने के बारे में सोचा भी नहीं। कभी अपने आत्मा को समझने का प्रयास नहीं किया। जिसके हृदय में प्रेम, वात्सल्य है व आत्मा को जानने की उत्सुकता है एवं जिसके जीवन में सदाचार व सदगुणों भरे हैं वही स्वयं को विकास के शिखर पर पहुंचा सकता है। मन ही हमारे पतन व उत्थान की कुंजी है। मन से ही स्वर्ग व नरक मिल सकता है। मानव के संयम में पुरुषार्थ नहीं करने के मुख्य कारण हैं, धनलिप्सा, सत्ता की महत्वकांक्षा, विलासिता, अविश्वास व सुसंस्कारों का अभाव। संयम का फल होता है जबकि मोक्ष से अनंत सुख मिलता है। संयम के प्रभाव से अपवित्र व्यक्ति भी पवित्र हो जाता है एवं सेवक भी स्वामी व पतित भी पावन बन जाता है।
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा पुण्य का गलत उपयोग मत करो। पुण्य का भुगतान करते समय यह स्मृति होना चाहिए कि मेरे पाप का बंध तो नहीं हो रहा। यद्यपि पुण्य भी मोक्ष मार्ग में बाधक है। बंधन तो बंधन ही होता है। चाहे लोहे का हो या सोने का हो। पुण्य को एकत्रित करना भी जरूरी है। समयानुसार छोडऩा भी जरूरी है। जब तक पुण्य प्रबल हैं तब तक कोई भी कष्ट नहीं दे सकता। पुण्य कमजोर होते ही व्यक्ति गिर जाता है। आध्यात्म जीवन को टिकाने के लिए चार विकल्प है। विचारबल, श्रद्धाबल, संयमबल और तीनों को पुष्ट करने पर आता है त्यागबल। जितना त्याग बढ़ेगा उतना पुण्य मजबूत होगा। साध्वी ने कहा कि 9 प्रकार के पुण्य बांधकर 42 प्रकार के भुगतान किया जाता है। साध्वी अपूर्वा ने कहा कि संसार दुख से भरा है। एक-एक जीव अनेक दुखों से पीडि़त है। जिस प्रकार पर्वत दूर से रमणीय नजर आता है परन्तु पास से काजल के समान।...
साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा यदि हम पापों को नष्ट व शत्रु को परास्त करना चाहते हैं, क्लेश को लेशमात्र भी रखना नहीं चाहते, सर्व अपराधों व अपकीर्ति से दूर होना चाहते हैं तथा अगले भव में लक्ष्मी प्राप्त करना चाहते हैं तो अपने मन में चुगली को मत आने दो। जैसे अग्नि में कमल, सर्प की जिह्वा में अमृत, पश्चिम दिशा में सूर्य का उदय, आकाश में फसल, पवन में स्थिरता तथा मारवाड़ में कल्पवृक्ष नहीं होता, वैसे ही दुर्जनता में चंद्र जैसे उज्ज्वल यश की प्राप्ति नहीं होती। जो मानव चुगली करता हुआ सौभाग्य चाहता है, वह मानो बिना परिश्रम के संपदा, कलह करता हुआ कीर्ति, प्राणियों के प्राण लेकर पुण्य, लज्जा रखकर नृत्य करना, अभक्ष्य भोजन करके निरोगता व निद्रा लेता हुआ विद्या प्राप्त करना चाहता है जो असंभव है। चुगली करने वाला धर्म की गली को तोड़ देता है, बुद्धि की समृद्धि दूर क...
साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा समय के साथ जीवन को सार्थक बनाने वाले सफल हो जाते हैं। ऐसा नहीं करने वालों के हाथ में निराशा ही लगती हैं। जिनका भाग्य अच्छा होता है उनको गुरु का इशारा ही बदल देता है। देव गुरु की भक्ति जब भी पाने का मौका मिले तो दिल से स्वीकार कर आनंद पूर्वक करना चाहिए। दिव्य जिनशासन प्रत्येक आत्माओं को दिव्यता प्रदान करता है। देव गुरु का सानिध्य मिलने पर अनन्य भक्ति आस्था के साथ अपने अमुल्य जीवन को सार्थक बनाना चाहिए। उन्होंने कहा इस भव को बेहतर करने के लिए धर्म का मार्ग अपनाना चाहिए। मन में जिज्ञासा होने पर मनुष्य दिल से धर्म को अपनाता है। यह कार्य मनुष्य के जीवन को बदल देता है। परमात्मा की वाणी का श्रवण सिर्फ भाग्यशाली ही कर पाते हैं। इसका लाभ उठाने वालों का जीवन बदल जाता है। सागरमुनि ने कहा हमारी संस्कृति में कुछ ही ऐसे पर्व है जिनका जैसा नाम होत...