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विश्व कल्याण की भावना से करें पर्व की आराधना: साध्वी धर्मप्रभा

एसएस जैन संघ एमकेबी नगर स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि यह पर्व साधना की उत्कृष्ट स्थिति का ज्ञान कराता है। यह उत्तम मांगलिक और आत्मशुद्धि की उपासना का संदेश देता है। आत्मा को राग से वीरागता, क्रोध से क्षमा, द्वेष से स्नेह, मान से विनय, माया से सरलता ,लोभ से संतोष और विषमता से समता की ओर अग्रसर करने वाला पर्व है। भावों की निर्मलता और विश्व कल्याण की भावना से पर्व की आराधना करें। सभी प्राणियों के सुख और कल्याण की कामना करें। उदारता, कोमलता और सहिष्णुता के भावों से हृदय को स्वच्छ करे तभी पर्व मनाना सार्थक होगा। यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि दूसरों के गुण-दोष पर ध्यान न देकर खुद अपनी आलोचना करना, अपने गुण दोषों पर ध्यान देना ही लाभकारी है। साध्वी स्नेह प्रभा ने कहा कि सच्ची मैत्री वो होती है जिसमें छोटा -बड़ा, ऊंच-नीच, गरीब-अमीर का कोई भेदभाव नहीं होता। विपदा की घड़ी में भी ज...

संस्कार हीन और चरित्र रहित शिक्षा उत्पात मचा सकती है: पुष्पदंत

कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि संस्कार हीन और चरित्र रहित शिक्षा उत्पात मचा सकती है लेकिन शांति का कारण नहीं बन सकती। अमीर उच्चपद को टिकाने के लिए, गरीबों को प्रलोभन देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करेगा। अनपढ़ अक्सर जालसाजी का शिकार बनता है। वह बैंकों व महाजनों से कर्जा लेकर चुकाते-चुकाते थक जाता है। लेकिन ऋण कम नहीं होता। साहुकार और राजनेता उसके अनपढ़ होने का फायदा उठाते हैं। राजनेता कहते हैं अशिक्षित को शिक्षित बना भी दोगे तो क्या उनमें सरलता, सज्जनता आत्मयीता आ जाएगी। सज्जनता, विनम्रता हीन शिक्षा अभिशाप ही सिद्ध होगी। अपराध कम नहीं होगें। नेपोलियन के पास सब कुछ था फिर भी शक्तिहीनों को दबाया। अमीर देश धमकाने में लगे हुए हैं। संस्कार सहित शिक्षा वरदान है। संस्कार डालने और मन को पवित्र बनाने की योजनाएं बनाए तो संस्कृति बच सकती है, नहीं तो गरीब आश्वासन की भुखमरी...

माधावरम बनी देवनगरी

श्रद्धालुओं का उमड़ रहा जनसैलाब   माधावरम स्थित जैन तेरापंथ नगर में महाश्रमणमय वातावरण छाया हुआ है। समस्त क्षेत्र मानो देवनगरी बना हुआ है। देश के विभिन्न प्रान्तों से श्रद्धालु श्रावक श्राविकाएं सेवा उपासना हेतु पधार रहे हैं। ऐसा विरल वातावरण और साथ में समुचित व्यवस्थाओं से हर व्यक्ति अपने आप को प्रसन्नचित्त और प्रफुल्लित पा रहे हैं। देश विदेश से प्राप्त हो रहे प्रोत्साहन के शब्द व्यवस्था समिति एवं सहयोगी संस्थाओं के दायित्व बोध को और अधिक प्रगाढ़ कर रहे हैं। यह सभी पूज्यप्रवर के पुण्य प्रताप एवं वृहद आशीर्वाद सहित समस्त कार्यकर्ताओं के अथक श्रम का ही सुफल है। समस्त सहयोगी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं के श्रम को नमन करते हुए साधुवाद।

चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि ने जैन दिवाकर दरबार में धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि अंतगढ़ सूत्र में उन महान पुण्यशाली आत्माओं का वर्णन किया है जिन्होंने भगवान की अमृतमयी वाणी सुनकर संसार को त्याग दिया और आत्म साधना के पथ पर अग्रसर हो गये संसार त्याग कर मुनिधर्म अंगीकार किया। फिर पीछे मुड़कर भी नहीं देखा कि परिवार क्या कर रहा है उनका संसार कैसा चल रहा है मोह माया राग द्वेष छोड़े तभी सही रूप में मुनि बन सकते जहाँ मेरा तेरा है। एक परिवार छोड़ा पर गांव-गांव में परिवार बढ़ा लिया ये मेरे श्रावक है मेरे संप्रदाय के हैं। ऐसे भाव जहां होते हैं वहाँ आत्मा का कल्याण नहीं राग द्वेष संसार में परिभ्रमण कराते हैं। भगवान महावीर स्वामी से गौतम स्वामी ने पूछा प्रभु मेरे बाद दीक्षा लेने वाले किसान नौकर चपरासी थे। वो भी केवली हो गये ...

त्योहार मनुष्य की इन्द्रियों, मन और शरीर को पुष्ट करते हैं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन कहा पर्यूषण आने से घर घर में आनंद छाता है। पर्व और त्योहार हमारे समाज के अंदर हमेशा से चलते आए हैं। त्योहार मनुष्य की इन्द्रियों, मन और शरीर को पुष्ट करते हैं जबकि पर्व मनुष्य के आत्मगुणों को। इससे आत्मा को बहुत बड़ा लाभ होता है। त्योहार पर लोग अच्छे कपड़ा पहनते हैं, लेकिन पर्व के दिनों में त्याग और तप करने की इच्छा होती है।  दिल को सद्गुणों से जोडऩे की इच्छा होती है। पर्यूषण पर्व पर लोगों को तप तपस्या कर अपना  जीवन सफल बनाने की ओर आगे बढऩा चाहिए। इस आठ दिन में अपनी आत्मा की निर्जरा कर लेनी चाहिए। इसका वास्तविक लाभ तब मिलेगा जब अपने द्वारा कोई भी भूल हुई हो तो उससे क्षमा याचना करलें। छोटा हो या बढ़ा, गलती के लिए क्षमा मांग लेनी चाहिए।   पर्यूषण में मनुष्य अपने आत्महित के लिए जो भी करना चाहे कर सकता है। सागरमुनि...

यात्रात्रिक यानी परमात्मा की भक्ति: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने पर्यूषण के दूसरे दिन वार्षिक 11 कर्तव्य समझाते हुए कहा जो कर्तव्य पथ पर चलता हुआ ठोकरें नहीं गिनता, वह एक दिन ठाकुर बन जाता है।  स्वरूप अ_ाई महोत्सव करना। नगर के समस्त जन धर्म से प्रभावित हो ऐसी रथयात्रा निकालना, आत्मशुद्धि के साथ सिद्धिकरण हो, स्नात्र महोत्सव यानी विधि-अर्थ-भावपूर्वक प्रभु की पूजा-भक्ति करना, देवद्रव्य वृद्धि अर्थात नीतिपूर्वक कमाई हुई लक्ष्मी का सदुपयोग प्रभु-भक्ति में करना। अष्ट कर्म के आवरण का अनावरण करने के लिए इस पर्व का आगमन होता है। ईहलोक व परलोक कल्याणकारक, कर्म के मर्म को समझाकर निर्मल आत्मधर्म की ओर ले जाने वाला यह पवित्र पर्व है। संघपूजा यानी संघ की पूजा तीर्थंकरों की पूजा के समान है। साधर्मिक भक्ति अर्थात श्री संभवनाथ परमात्मा ने पूर्व के तृतीय भव में साधर्मिक भक्ति करके तीर्थंकर पद को प्राप्त कर...

भाव दृष्टि से शाश्वत और काल दृष्टि से अशाश्वत: साध्वी धर्मप्रभा

एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन कहा कि  पर्यूषण शाश्वत भी है और अशाश्वत भी। भाव की दृष्टि से शाश्वत है और काल की दृष्टि से अशाश्वत है। सत्य दिवस रूप में मनाए गए इस दिवस पर कृष्ण चरित्र का वाचन करते हुए उन्होंने कहा वे महान कर्मयोगी भी थे और ध्यानयोगी भी। उन्होंने लोकनीति और अध्यात्म का समन्वय किया। वे एक सफल राजनीतिज्ञ भी थे। नम्रता और विनय की पराकाष्ठा के दर्शन उन महान योगीश्वर के जीवन में होते हंै। समाज सुधारक, शांति दूत, ज्ञानेश्वर, अध्यात्म योगी,प्रेम की मूर्ति, उदारता जैसे कई गुणों के स्वामी थे। सााध्वी स्नेह प्रभा ने सत्य दिवस पर चर्चा करते हुए कहा कि भगवान सत्य है यह कहने के बदले ये कहना उचित होगा कि सत्य ही भगवान है। मनुष्य के धर्म की जितनी भी क्रियाएं हैं उन सबका लक्ष्य सत्य ही है। हमारी आत्मा अनादि काल से असत्य के अंधकार में फंसकर द...

वैराग्य और गुरु दुख में ही याद आते हैं: साध्वी धर्मलता

एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि वैराग्य और गुरु दुख में ही याद आते हैं। यदि दुख के सागर में सुख के मोती बंटोरने हैं तो दो शर्तो को स्वीकार करना पड़ेगा-पहली भूलना सीखो एवं दूसरा विचार को नया मोड़ दो। दूसरों पर किए उपकार को भूल जाओ। सर्दी हो जाए तो ये मत समझो कि क्षय रोग हो जाएगा। सुख और दुख जीवन के दो फूल हैं। हमें दुख में से सुख निकालने की कला सीखनी चाहिए। सुख का कमल भी दुख के कीचड़ में एवं गुलाब कांटों की डाल पर खिलता है। जीवन में दुख आने पर रोने से काम नहीं चलता। सुख का काम है तो दुख भी निकम्मा नहीं है। वह अपने और परायों की पहचान कराता है। विचारों को नया रूप दो। तभी दुख में सुख मिलेगा। सुख-दुख मन के ही प्रतिबिंब हैं। मन को मोड़ देेंगे तो आनंद का सागर लहराता मिलेगा। सुख में सावधान रहें, दुख में समाधान करें। साध्वी सुप्रतिभा ने अंतगड़ सूत्र के माध्यम से देवकी के 6...

देने का भाव ही सर्वश्रेष्ठ: स्वाध्यायी प्रेमलता

एसएस जैन संघ मदुरान्तकम में पर्यूषण पर्व पर पधारे स्वाध्याय संघ की स्वाध्यायी प्रेमलता बंब ने कहा शास्त्रों ने देने के भाव को श्रेष्ठ कहा है। प्रकृति के नियम भी यही कहते हैं कि जो देता है वो पाता है। जो रोकता है वो सड़ता है। देने वाले निस्वार्थ होते है, अपना सब कुछ लुटाने के बाद भी उनको आंतरिक संतुष्टि और सुख की अनुभूति होती है। देने से जो दुआएं मिलती हैं उसके सामने बड़े से बड़ा भौतिक सुख भी फीका पड़ जाता है इसलिए हमें देने का संस्कार अपने भीतर उजागर करना चाहिए और आने वाली पीढ़ी में भी इसके लिए जागरूकता बढ़ानी चाहिए। आज के समय में यह दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है कि हम अपना उचित हिस्सा दिए बिना सामने वाले से सिर्फ लेने का कार्य करते हैं। जब आप किसी को देते हैं तो आप उसकी ही नहीं खुद की नजर में भी बड़े बन जाते हैं। विश्वास रखने वाले की झोली कभी खाली नहीं होती, प्रकृति हमेशा उसकी भरपाई करती है। संच...

महापुरुष मां से बड़ा नहीं होता: साध्वी कुमुदलता

अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने मां की ममता, मां का उपकार व वात्सल्य पर प्रेरक उद्बोदन देते हुए कहा कि  महापुरुष मां से बड़ा नहीं होता। मां की ममता, वात्सल्य, उपकार, त्याग आदि का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता और भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने एक मार्मिक प्रसंग के माध्यम से मां के वात्सल्य का वर्णन करते हुए कहा कि बच्चे भले ही मां का तिरस्कार कर दें लेकिन मां हमेशा अपने बच्चों को प्यार ही बांटती है। मां बच्चों के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है। मां की ममता ऐसी होती है कि अगर बच्चा रोता है तो मां भी रो देती है और बच्चे के हंसने पर मुस्कुराती है। दुनिया के किसी भी शब्दकोश में मां से बड़ा शब्द नहीं है। सागर की गहराई, सूर्य की किरणें, चांद की चांदनी से भी अगर मां का उपमा दी जाए तो यह भी कम है। दुनिया में कई महान संत पुरुष हुए हैं लेकिन मां से ब...

साधुओं की न कोई आशा है न निराशा: ज्ञानमुनि

यहां शांति भवन में विराजित ज्ञानमुनि ने कहा कि साधुओं की न कोई आशा है न निराशा है। कभी जिंदगी में भी चुभता वचन नही बोलते हैं। जीवन में तन का ढ़ंग, जन का ढ़ंग एवं इंसान का क्या ढ़ंग है ये भगवान व गुरु बताते हैं। जिसके जीवन में कषाय शांत है वो ही साधु। कषाय का मतलब लोभ, क्रोध,मोह, माया का नियंत्रण करना। जिसके रोम रोम में दया व करुणा भरी होती है। जो लेते एक है लेकिन देते दो हैं वो साधु है। साधु के एक शब्द में अर्थ छिपा हुआ है।  भगवान का एक वचन भी जीवन में बहुत बड़ी बात है। मानव शुभ कार्य करने में कभी देरी न करें क्योंकि सांय तक कब क्या होगा वो कोई नहीं जानता है।

तीर्थंकर व अरिहंत मंगल रूप होते हैं: साध्वी मंयकमणि

आरकाट के जैन स्थानक में विराजित साध्वी मंयकमणि ने कहा कि तीर्थंकर व अरिहंत मंगल रूप होते हैं। मंगल की शरण लेने पर अमंगल भी मंगल हो जाता है। अगर मंगल की शरण नहीं लेते है तो जीवन के जो मंगल है वे भी अमंगल बन जाते है इसलिए अरिहंतों के शरण लेना बहुत जरूरी है क्योंकि ये मंगल हैं और लोक के लिए उत्तम हैं। हम उस व्यक्ति की शरण चाहते या लेते हैं जो स्वयं किसी अन्य की शरण ले रहा है। हम उस निर्भर रहते हैं जो स्वयं दूसरों पर निर्भर है। हम उनसे सहयोग लेते हैं जो खुद ही दूसरों का सहयोग रहे होते हैं।

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