अपने भीतर उठने वाली क्रोध की ज्वाला से अगले का नुकसान हो या नहीं, लेकिन उसमें अपने सब सद्गुण जलकर स्वाहा हो जाते हैं। क्रोध अनर्थों की खान है, जिसमें इंसान अंधा बन जाता है। जब ज्ञानी से ज्ञानी आत्मा में भी पागलपन का भूत सवार हो जाता है, तो उस समय वह चांडाल से कम नहीं होते। राष्ट्रसंत कमल मुनि कमलेश ने गुरुवार को पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के संवत्सरी समारोह को संबोधित करते हुए यह उद्गार व्यक्त किए। मुनि ने कहा कि जैसे आग से आग को कभी समाप्त नहीं किया जा सकता, ठीक वैसे ही क्रोध से कभी क्रोध को नहीं जीता जा सकता। क्रोध वर्षों के प्रेम को एक क्षण में तोड़ कर आपस में जहर घोल देता है। खून के रिश्ते में कड़वाहट घोल देता है। मुनि ने कहा कि विश्व के सभी धर्मों ने क्रोध को अत्यंत खतरनाक बताया है, क्योंकि आत्मा को दुर्गति का मेहमान भी यही बनाता है। वर्षों की तप-तपस्या, दान और तीर्थ क्रोध की चिंगारी में...
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ माधवरम के महाश्रमण समवसरण में आचार्य महाश्रमण कहा कि समाधि के द्वारा साधु समाधिस्थ रह सकता है। निर्जरा के मुख्यत: तीन माध्यम बताए गए हैं-स्वाध्याय, सेवा और अनाहार की तपस्या। साधु को इनमें से कोई न कोई हमेशा अपने पास रखने का प्रयास करना चाहिए। तीनों में से किसी को भी अपना मुख्य माध्यम बनाकर कर्मों की निर्जरा कर आत्मा को निमर्ल बनाने का प्रयास करना चाहिए। तपस्या में बहुत गुण होते हैं। तपस्या केवल निर्जरा की भावना की जानी चाहिए। तपस्या में भौतिक चीजों की कामना नहीं करने का प्रयास करना चाहिए। वर्तमान में लोग अनाहार (आहार का त्याग) को ही तपस्या कहते हैं। मुख्यमुनि महावीकुमार ने ‘सुरंगों शील सजो’ गीत का संगान किया। उसके बाद आचार्य महाश्रमण ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के 25वें भव राजर्षि नन्दन के भव का वर्णन करते हुए कहा कि एक समय ऐसा आया जब राजा नंदन राजर...
गुरुवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज द्वारा पर्युषण पर्व के अंतिम दिन संवत्सरी महापर्व पर उपस्थित जैन मैदिनी को प्रवचन में कहा कि साधर्मिक की सेवा करना तीर्थंकर परमात्मा की भक्ति करने के समान है। जो इस भावना के साथ अपने साधर्मिक भाइयों की सहायता करनी चाहिए। आज महापर्व पर ऐसी भावना भाएं कि इस संसार से आज तक बहुत कुछ लिया है और अब मुझे इस संसार को देना है और मानव, साधर्मिक, और संघ सेवा को अपना उद्देश्य बनाएं। जीवन में यदि किसी के विचारों से असहमती हो तो उसे अपने मन में गांठ की तरह न बांधें, दुश्मनी का रूप न दें। क्षमा के महापर्व पर प्रण लें कि यदि किसी से एग्री न हो तो कभी भी एंग्री न होंगे। यदि संघ में किसी बात पर असहमति हो जाए तो भी ऐसा प्रयास करें कि संघ की प्रभावना ही हो विरोध नहीं।...
तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमणजी की अनुज्ञा से पर्युषण महापर्व की आराधना कराने के लिए तेरापंथ सभा भवन में उपासक श्री पदमचंद आंचलिया (चेन्नई) ने कहा कि -एक बिंदु पर अपने चित को केंद्रित करना ध्यान है| ज्ञान, दर्शन, वीर्य ,आनंद ये आत्मा के मूल चार गुण हैं, इनको विस्तार से समझाया| आत्मा को आव्रत करने वाले कर्मों का क्षय होने पर ही हमें मोक्ष की प्राप्ति होती हैं| हमें धर्म यानि संयम, अहिंसा , तप की सम्यक् आराधना करनी चाहिए! संवत्सरी महापर्व के दिन हमें उपवास और 8 प्रहरी, 6 प्रहरी या 4 प्रहरी पौषध करने की प्रेरणा दी| तपस्या की विशेषताओं के बारे में बताया| उपासक श्री स्वरूपचन्द दाँती (चेन्नई) ने कहा कि पर्युषण महापर्व हमें अपने जीवन का सार निकालने की प्रेरणा देते हैं! हमें संघ से बहीर भूत व्यक्ति को कभी भी प्रश्रय नहीं देना चाहिए| देव, गुरु ,धर्म के प्रति अपनी आस्था क...
महान दार्शनिक संतश्री ललितप्रभ जी महाराज ने कहा कि संवत्सरी विश्व मैत्री का पवित्र पर्व है। यह भाई-भाई, सास-बहू, देराणी-जेढाणी, पिता-पुत्र और पड़ोसी-पड़ोसी को आपस में बन चुकी दीवारों को हटाकर निकट आने की प्रेरणा देता है। जो व्यक्ति संवत्सरी पर्व मनाने के बावजूद मन में किसी के प्रति वैर-विरोध या थोड़ी-सी भी प्रतिशोध की भावना रखता है उसके सारे धर्म-कर्म-पुुण्य निष्फल हो जाते हैं। धर्म की नींव है टूटे हुए दिलों को जोडऩा एवं जुडऩा। जो धर्म इसके विपरित करता है वह धर्म नहीं मानवता के नाम पर कलंक है। उन्होंने कहा कि अपरिचित व्यक्ति से क्षमायाचना करना आसान है, पर आपस में कोर्ट केस चलने वाले दो लोगों के द्वारा आपस में क्षमायाचना करना तीस उपवास करने से भी बड़ी तपस्या है। हमसे उससे क्षमा मांगे जिससे हमारी बोलचाल नहीं है ऐसा करना मिच्छामी दुक्कड़म् के पत्र या एसएमएस करने से भी ज्यादा लाभकारी होगा। भग...
आचार्य तीर्थभद्रसूरीश्वर के सान्निध्य में श्री चन्द्रप्रभु जैन नया मंदिर ट्रस्ट के तत्वावधान व श्री गुजराती श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ के सहयोग से श्री तमिलनाड जैन महामंडल द्वारा अ_ाई व इससे ऊपर के तपस्वियों के पच्चक्खाण की शोभा यात्रा निकाली गई। श्री प्रवीणभाई मफ़तलाल मेहता गुजराती वाड़ी में तपस्वी एकत्र हुए। मुनि चंद्रयशविजय ने सभी तपस्वियों को मांगलिक सुनाया। तमिलनाड जैन महामंडल द्वारा सभी तपस्वियों का बहुमान किया गया। यहां से रवाना हुई तपस्वियों की शोभा यात्रा घोड़ा बग्गी, बैंड व ढोल की मधुर ध्वनि के साथ विभिन्न मार्गों से होते हुए श्री आराधना जैन भवन पहुंची। यहां आचार्य तीर्थभद्रसूरीश्वर ने सभी तपस्वियों के तप के महत्व को समझाया व केसरवाड़ी में आयोजित होने जा रहे उपधान तप में सभी के जुडऩे की प्रेरणा देते हुए सभी तपस्वियों को पच्चक्खान दिया। श्री आदिनाथ जैन युवक मंडल, सहुकारपेट व ...
साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने गुरुवार को पर्यूषण पर्व के आखिरी दिन संवत्सरी के अवसर पर कहा कि यह बहुत ही महान पर्व है। सुख और दुख मनुष्य को उसके विचारों से मिलता है। यह जानकर प्रत्येक व्यक्ति को प्राणीमात्र के साथ मित्रता का भाव रखना चाहिए तभी मनुष्य जीवन में शांति, आनंद और सुख प्राप्त कर पाएगा। इस दिन अपने करीबी से क्षमायाचना करनी चाहिए। संवत्सरी पर्व की दिव्य आराधना से किया हुआ प्रतिक्रमण मनुष्य की समस्त आलोचनाओं को दूर कर आत्म को हल्का बनाने का कार्य करती है। प्रतिक्रमण से शुद्धि करण होता है। यदि कोई दोष है तो प्रतिक्रमण से उसकी शुिद्ध की जा सकती है। अगर कोई दोष नहीं है तो प्रतिक्रमण से आत्मा को और शुद्ध किया जा सकता है। मनुष्य की आत्मा के मैल को दूर करने के लिए प्रतिक्रमण करना जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि संवत्सरी मनाने के बाद लोग क्षमायाचना करते हैं। ज्ञानी क...
यहां शांति भवन में गुरुवार को ज्ञानमुनि के सान्निध्य में पर्वाधिराज पर्यूषण महापर्व का अंतिम दिन सांवत्सरिक दिवस के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर ज्ञानमुनि ने कहा कि पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिन सांवत्सरिक पर्व है। यह पर्व आत्मा का पर्व है, परमात्मा का पर्व है। शरीर का ममत्व छोडऩे एवं लालसा छोडऩे का दिन है। दूसरा और कोई पर्व आने पर लोग धन सहित अन्य विलासी चीजें मांगते हैं लेकिन संवत्सरी पर्व में भगवान से आत्म कल्याण मांगा जाता है। संसार में दो तरह के प्राणी हैं, मुमुक्षु एवं बुबूक्षू। बुबूक्षु वाले सिर्फ खाऊ-खाऊ करते हैं, भोग में विश्वास रखते हैं लेकिन मुमुक्षु छोडऩे में विश्वास करते हैं। त्याग करते हैं। परमात्मा के नजदीक जाने का दिन है संवत्सरिक पर्व। जैन धर्म में क्षमा को मित्रता का आधार माना गया है, इस लिए पर्यूषण पर्व को क्षमा या मैत्री के पर्व के रूप में भी मनाया जात...
साहुकार पेठ स्थित श्री राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने बारसासूत्र का सार बताते हुए कहा कि वैर से वैर कभी शांत नहीं होता, सिर्फ प्रेम से ही वैर शांत होता है। उन्होंने स्वरचित ‘देर क्यूं करता है अभी, आज कह दे प्रभु को सभी’ क्षमा का गीत गाते हुए कहा कि पापों से भरी हुई पोटली को प्रभु व गुरु चरणों में सौंपकर अपनी आत्मा को हल्की बना देना चाहिए। क्षमा मांगनी चाहिए, क्षमा देनी चाहिए, शांत रहना चाहिए। जो व्यक्ति क्रोध, मान, माया, लोभ व राग-द्वेष को शांत कर क्षमा-याचना करता है,उ सी की आराधना सार्थक होती है। अभिमान के कारण हम अपना अपराध स्वीकार नहीं कर पाते। हमारी आत्मा सब कुछ जानते हुए भी सत्य बोलने से कतराती है और भ्रम का भूत हटाने से घबराती है। प्रभु के पास प्रायश्चित करने से सब पाप मिट जाते हैं और भजन से सारे वजन सिर से हट जाते हैं। क्षमा रूपी जल से हमारा जीवन निर्मल हो जाता है। ...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि पतन के लिए एक ही कुअवसर काफी है। नौ माह की गर्भ पीड़ा से जन्मा बालक गलत औषधि के कारण एक क्षण में मरण को प्राप्त हो सकता है। जन्मों -जन्मों के पुरुषार्थ से प्राप्त सुसंस्कारित जीवन एक गलत आदत से बदनाम हो जाता है। मन को विकृत करने वाली कामना-वासना मन को रावण बना देती है। आपके सुदंर बगीचे में सभी प्रकार के कमल खिले हैं और यदि आपका मित्र वहां आकर कांटे डाल जाए और आप उसे संकोच वश कुछ नहीं कहते तो उस बगीचे का हाल क्या होगा। अगर आपके दोस्त व्यसनी हैं और आप उनसे कुछ नहीं कहते और न ही उनका साथ छोड़ते तो आपके जीवन की क्या दुर्दशा होगी। क्या आपने कभी सोचा है कि आप की एक छोटी सी भूल जीवन को बरबाद कर सकती है। यह एक सच है कि पानी की एक बूंद उपवन को हरा-भरा नहीं कर सकती लेकिन एक चिंगारी पूरे भवन को जला सकती है। इसका अर्थ है कि सुस...
एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि संवत्सरी के पांच कर्तव्य हैं लोच, प्रतिक्रमण, आलोचना, तपस्या और क्षमा। क्षमा राग द्वेष तोड़ती है और प्रेम के पुल बांधती है। क्षमा रूपी महल में प्रवेश पाने के लिए पासपोर्ट है मिच्छामी दुक्कड़म। यदि यह पासपोर्ट होगा तो क्रोध रूपी द्वारपाल क्षमा के महल में प्रवेश करने की स्वीकृति अवश्य देगा। भूलों को भूल जाओ तो भगवान बन जाओगे और नहीं भूले तो भव परंपरा बढ़ जाएगी। सवंत्सरी के पावन पर्व पर समता को जोडऩा और ममता को तोडऩा है। पापी को पवित्र, पराजित को विजयी, रागी को वैरागी, अज्ञानी को ज्ञानी, कठोर को दयालु, दुर्जन को सज्जन और दुखी को सुखी बनाने का पर्व है संवत्सरी। हमें कैमरे की तरह भूलों को पकडऩा नहीं है, दर्पण की तरह भूल जाना है। क्षमा के इस विशाल सागर में वैर का विर्सजन करके वैरी से जौहरी बनना है। क्षमापना विषय कषाय और ऋण से मुक्त करवा क...
जैन पर्व पजुषन प्रति वर्ष धूमधाम से तपस्या और त्यागमय जीवन के साथ मनाया जाता है लेकिन जैन धर्म के अनेक सगठन पर्व पजुषन की तिथि और तारीख पर एक जुट न हो कर अलग अलग दिन मनाते है इस से जैन एकता और एकजुटता में कमी नजर आती है / जैन धर्म के चार स्तम्भ दिगंबर श्वेताम्बर मूर्तिपूजक एवं तेरापंथ समाज देश और विदेश में भगवान महावीर के उपदेशो का प्रचार प्रसार कर रहे है लेकिन जैन पर्व पजुषन जैसे महान पर्व की आरधना के लिए एकजुट नहीं हो पाते है इस से आम जैन व्यक्ति हमेशा अपने धर्माचार्य और पंथ के अनुसार जैन पर्व मनाता है यही नहीं सभी जैन संघटन भिन्न भिन्न तरीको से जैन धर्म की परुपना करते है और अपने आचरण को ही शुद्ध मानते है अत सभी जैन धर्मचर्यो और संघटनो के पधादिकारियो को जैन एकता का परिचय देते हुए जैन पर्व पजुषन को एक दिन मनाने के साथ साथ सभी को राष्टीय छुट्टी घोषित कराने का प्रयास करना चाहिए / यदि जैन पर...