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जीवन में शिक्षा से ज्यादा जरूरत है संस्कारों की – राष्ट्र-संत ललितप्रभ

मुंबई,  राष्ट्र-संत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि जीवन में जितनी जरूरत शिक्षा की है, उतनी ही जरूरत संस्कारों की है। शिक्षा न मिली तो खुद को नुकसान उठाना पड़ेगा, पर संस्कार न मिले तो सारे कुटुम्ब को नुकसान झेलना पड़ेगा। जो इंसान अपने जीवन में संस्कारों की माला धारण कर लेता है, उसे फिर हाथ में माला पकडने की जरूरत नहीं होती। यों तो जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कारों की जरूरत होती है, पर जीवन-निर्माण के लिए 7 संस्कार काफी हैं। उन्होंने कहा कि पहला है स्वच्छता का संस्कार। स्वच्छता स्वर्ग को साकार करने की पहली सीढ़ी है। सफाई कर्मचारी तो आजीविका जुटाने के लिए सफाई करते हैं, पर हम इसे स्वस्थ जीवन और सुन्दर पर्यावरण के लिए अपनाएँ। हमारी प्रतिज्ञा हो- हमन गंदगी करेंगे, न करने देंगे। हम हर रोज स्नान करें, धुले वस्त्र पहनें, पालतू जानवरों को स्वच्छ रखें, पड़े लगाएँ, घर, तालाब, नदी, स्कूल, ऑफि...

216वें भिक्षु चरमोत्सव पर चतुर्विध धर्मसंघ का आस्था चरम पर

चेन्नई: जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य प्रवर्तक, तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम अनुशास्ता, महामना आचार्य भिक्षु के 216वें चरमोत्सव का भव्य आयोजन चेन्नई महानगर के माधावरम में विराजित तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में परम उत्साह और उल्लासमय वातावरण में हुआ। आस्थासिक्त श्रद्धालुओं के उमड़े ज्वार से मानों पूरा चतुर्मास परिसर जनाकीर्ण बन गया। चतुर्विध धर्मसंघ का उत्साह और उल्लास अपने चरम पर था। सभी अपने आराध्य के प्रति अपने भावों के सुमन चढ़ाने का को आतुर नजर आ रहे थे, तो वहीं उमड़ी हजारों-हजारों की जनमेदिनी का शायद यही मानना था कि उन्हें तो आचार्य भिक्षु के पट्टधर आचार्यश्री महाश्रमणजी में ही आचार्य भिक्षु के दर्शन हो जाते हैं और हम इसी अभिलाषा में आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में पहुंच जाते हैं। माधाव...

व्यक्ति को भोग में योग में जीना चाहिए: साध्वी कुमुदलता

चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता व अन्य साध्वीवृन्द के सान्निध्य में चल रहे चातुर्मास के दौरान शनिवार को साध्वी महाप्रज्ञा ने कहा कि व्यक्ति को भोग में योग में जीना चाहिए। योग करने से निरोगी बन जाओगे। उन्होंने गीतिका के माध्यम से कहा कि अगर आपकी दृष्टि अच्छी है तो सृष्टि भी अच्छी ही लगेगी। जैसा बिम्ब होता है वैसा ही प्रतिबिम्ब भी दिखाई देता है। अगर आप नजरें बदल दोगे तो नजारे भी बदल जाएंगे। संसार में अगर हंस जैसी दृष्टि लेकर चलेंगे तो हमेशा मोती ही नजर आएंगे। उन्होंने कहा संसार में लोगों की प्रवृत्ति शकुनी या दुर्योधन जैसी नहीं होनी चाहिए बल्कि हमें राम, बुद्ध, महावीर बनने की कोशिश करनी चाहिए। साध्वी राजकीर्ति ने कहा कि अहंकार की कार से नीचे उतरकर विनम्रता के विमान में बैठकर मोक्ष की मंजिल मिल सकती है।

शरीर की आवश्यकता गुलाम बनाती है: पुष्पदंत सागर

चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेश मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने उत्तम आकिंचन्य धर्म का विवेचन करते हुए कहा शरीर की आवश्यकता गुलाम बनाती है। भूख सबसे बड़ा रोग है। पेट के खातिर मनुष्य पापकर्म  करता है। पेट की मांग के साथ जब मन की भी मांग जुड़ जाती है तो मनुष्य आधा हो जाता है। उन्होंने कहा, पेट की मांग को बहुत सीमित है। आकिंचन्य होने के लिए मन की गुलामी से मुक्त होना जरूरी है। जब हम किसी दूसरे पर निर्भर होते हैं तो मन अशुद्ध होने लगता है। कामनाएं व वासनाएं मन को अशुद्ध बनाती हैं।   जीवन में तीन प्रकार की जरूरतें होती हैं – शरीर की, मन की और आत्मा की। शरीर की आवश्यकता रोटी, कपड़ा और मकान है। इसके बिना शरीर सुरक्षित व जीवित नहीं रह सकता। मन की आवश्यकता  संगीत-साहित्य कला है। शरीर जब थक जाता है तो मनोरंजन चाहता है। मन खाली नहीं बैठता, कुछ न कुछ करता रहता है। मन कुछ करके दिख...

संत का जीवन दीपक की लौ के समान: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. ताम्बरम स्थित जैन स्थानक में विरोजित साध्वी धर्मलता ने प्रवचन में कहा कि संत का जीवन दीपक की लौ के समान है जो स्वयं मिटकर जगत को प्रकाश बांटती है। संतों के सान्निध्य में पहुंचने वाला अपनी ज्ञान की झोली अवश्य भर लेता है। चंदन की तरह सभी को जिनशासन की महक प्रदान करने वाले संत ही होते हैं। संत और स्वार्थ दो विपरीत दिशाएं हैं। स्वार्थ का त्याग करना एक कठिन तपस्या है पर कठिन तपस्या में तपने वाला ही संत होता है। संत स्वार्थ से ऊपर होता है। उन्होंने कहा, सुख-दुख, लाभ-अलाभ, जय-पराजय में समभाव रखना ही संत की समता है।  संसार में तीन प्रकार के व्यक्ति होते हैं – स्वार्थी, आत्मार्थी और परमार्थी। स्वार्थी गधे को भी बाप बना लेते हैं तो आत्मार्थी स्वयं की आत्मा का चिंतन करता है जबकि परमार्थी स्व एवं पर के आत्मोत्थान का मार्ग प्रशस्त करता है।

प्रवचन सुनना और उसे अपने जीवन में उतारना जरूरी: विनयमुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक विनयमुनि के सान्निध्य में शनिवार को आचार्य जयमल की 311वीं जयंती मनाई गई। विनयमुनि ने आचार्य जयमल की जीवनी पर प्रकाश डाला। सागरमुनि ने कहा आचार्य जयमल का जीवन बहुत ही अलग था। एक बार प्रवचन सुनने से उनका जीवन बदल गया। जीवन में प्रकाश लाने के लिए प्रवचन सुनना और उसे अपने जीवन में उतारना जरूरी होता है। ऐसा करके ही अपने जीवन के अंधकार को दूर कर प्रकाशमय जीवन में प्रवेश किया जा सकता है। संयम के प्रति उनकी भावना प्रबल थी। उन्होंने कहा कि जीवन को सफलता की ओर ले जाने के लिए मनुष्य को गुरुभगवंतों के दिखाए मार्र्ग का अनुसरण करना चाहिए। आचार्य जयमल का जीवन तपस्वी जीवन था। उन्होंंने  अपने जीवन में बहुतों को धर्म के कार्यों से जोड़ा। इससे पहले तप, त्याग और आराधना से जयमल की जयंती मनाई गई। इस मौके पर संघ के अध्यक्ष आनंदमल छल्लाणी एवं अन्य पदाधिकारी उपस्थि...

श्रद्धा के साथ की गई क्रिया आराधना बन जाती है: प्रवीणऋषि

चेन्नई. शनिवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का प्रवचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने जैनोलोजी प्रैक्टिकल लाईफ सत्र में युवाओं को कहा कि जीवन में सफलता के लिए तीन चीजें शरीर, दिमाग और आत्मा अत्यंत जरूरी है। इन तीनों के साथ यदि श्रद्धा का समावेश हो जाए तो सफलता को उत्कृष्टता शिखर पर पहुंचा सकते हैं। श्रद्धा के साथ की गई क्रिया आराधना बन जाती है। श्रद्धा आ जाए तो आपकी भावना ही भक्ति बन जाती है। आपसी रिश्तों की यदि समझ आ जाए और उनमें पारदर्शिता हो तो आपके रिश्तों को कोई भी क्षति नहीं पहुंचा सकता। उपाध्याय प्रवर ने बताया कि अंतराय कर्म तोडऩे का पहला सूत्र है कि जो आपको आज तक प्राप्त नहीं हुआ वह दूसरों को देना शुरू कर दें। इस भावना से नहीं कि वह पुन: लौटाएगा। यदि शुरुआत नकारात्मकता से कर देंगे तो सकारात्मकता आ नहीं पाएगी। ...

खुशी से होता है आत्मा की शक्ति का जागरण : उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

चेन्नई. शुक्रवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज के प्रवचन का कार्यक्रम आयोजित किया गया। उपाध्याय प्रवर ने जैनोलोजी प्रैक्टिकल लाइफ में कहा कि शक्ति और ज्ञान का संबंध जोडऩे के बारे में बताया। जब तक एक-दूसरे को देखकर खुशी हो तो प्यार बढ़ता रहता है लेकिन जब यह रुक जाती है तो सामने वाले की एनर्जी भी उसी प्रकार का व्यवहार करना शुरू कर देती है। यह प्रमाद और सबसे बड़ा पाप है। और जब देखकर गुस्सा आता है तो दुश्मनी बढ़ती जाती है। पूरी एनर्जी के साथ नफरत होने लगती है। जहां एनर्जी जाग्रत होगी वही डवलपमेंट होगा और जहां नहीं होगी वो डेमेज होगा। आपकी श्रद्धा और प्रेम वैसे-वैसे ही बढ़ता जाता है। हम इसे अनदेखा करके स्वयं की एनर्जी पर ताला लगा देते हैं और सामने वाले की एनर्जी भी रूक जाती है। जिस कारण से ...

संयम में कडक़ और स्वभाव में नरम थे रूपेंद्रमुनि

चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता एवं अन्य सहवर्तिनी साध्वीवृंद के सान्निध्य में रूपेंद्रमुनि के पुण्य स्मरण दिवस तप, त्याग के साथ गुणानुवाद दिवस के रूप में मनाया गया। इस मौके पर साध्वी धर्मलता ने कहा वे मन से सरल थे। उनके वचन में मधुरता, काया में विनम्रता, विचार में उदारता, आत्मा में मुमुक्षुता का गुण था। अपने 52 वर्ष के दीक्षा पर्याय में सूर्य संत जिनशासन की महती प्रभावना करते हुए जगत से विदा हुए। आज के युग में इन्सान को चाय, खाखरे और वस्त्र सभी कडक़ चाहिए लेकिन गुरु नरम चाहिए। रूपेंद्रमुनि संयम से कडक़ व स्वभाव से नरम थे। अंदर में रहकर सबके कार्य कर देना उनकी विशेषता थी। यही कारण है कि मृत्य के बाद उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया जाता है। जगत में पूज्य तो बहुत होते हैं लेकिन पूजनीय कोई-कोई ही होते हैं। साध्वी ने कहा जन्म वटवृक्ष की तरह होता है लेकिन उनका जन्म वटवृक्ष की...

आत्मा का निकल जाना ही मृत्यु है: साध्वी कुमुदलता

चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने कहा शरीर से आत्मा का निकल जाना ही मृत्यु है। जीवन तो पशु पक्षी को भी मिलता है पर मानव जीवन महामानव बनने के लिए मिला है। मानव अगर किसी की अर्थी देखता है तो चिंतन मनन नहीं करता। मौत को स्वीकार नहीं करता। मौत कई तरीके से आती है यह सच समझ जाएंगे तो उद्धार हो जाएगा। अपने आज के जीवन को स्वर्ग बनाऐगे तो आगे भी स्वर्ग मिलेगा। हम परमात्मा से जुड़ जाएं तो यह जीवन सार्थक हो जाएगा। मृत्यु का साक्षात्कार समझ में आ जाए तो जीवन जीने का तरीका आ जाए। उन्होंने कहा कि लेश्या 6 प्रकार की होती है। जीवन के सारे अधिकारों को जीओ पर लेश्या को समझो। कृष्णा लेश्या का रंग है काला। कृष्णा लेश्या वाला हमेशा दूसरों को दुख देने का प्रयास करेगा। वह हमेशा आर्त और रौद्र ध्यान ध्याता है। हम कृष्णा लेश्या में जीते हैं तो नारकी का बंधन बांधते हैं। जीएं तो तेजो ...

आचार्य जयमल जन्म जयन्ती समारोह रविवार को

चेन्नई. गोपालपुरम स्थित छाजेड़ भवन में विराजित कपिल मुनि के सानिध्य व श्री जैन संघ के तत्वावधान में रविवार को आचार्य जयमल का 311वां जन्म जयंती महोत्सव आयोजित होगा। इसके साथ ही श्रमण संघ के प्रथम पट्टधर आचार्य आत्माराम की जन्म जयंती और आचार्य डॉ. शिवमुनि का 77वां जन्म जयन्ती समारोह जप तप की आराधना और सामूहिक सामायिक साधना के द्वारा मनाया जाएगा। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रावक श्राविकाओं के द्वारा एकासन, आयम्बिल, उपवास आदि तप की आराधना की जाएगी। मुनि ने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि इन तीनों आचार्यों की जन्म जयन्ती के मौके पर अधिकाधिक धर्म आराधना और जीवदया, शिक्षा, चिकित्सा के क्षेत्र में कार्य करें। इन महापुरुषों का का समग्र जीवन आत्म कल्याण के साथ मानवता की सेवा के लिए समर्पित रहा है। अत: इनकी जन्म जयन्ति को परोपकारी कार्यों के सम्पादन के साथ मनाएं। संघमंत्री राजकुमार कोठारी ने...

बुरा करने से आत्मा बुरी हो जाती है: उपप्रवर्तक गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा पंचपरमेष्टि का गुणानुवाद दिल से किया जाना चाहिए। हम किसी का बुरा करते हैं तो उसका बुरा नहीं होगा लेकिन अपनी आत्मा का बुरा जरूर हो जाएगा। इसलिए सभी का अच्छा करने का भाव रखना चाहिए। बुरा करने का भाव मन में भी नहीं लाना चाहिए। ऐसा करने पर ही जीवन में धर्म फलिभूत हो पाएगा। भावना हमेशा ऊंची होनी चाहिए। लोग साधु न बने लेकिन मन में भावना साधु बनने की रखनी चाहिए तभी जीवन सफल हो पायेगा। मनुष्य को जितना हो सके भलाई के कार्य करने चाहिए। अगर भलाई का कार्य न कर पाए तो किसी के साथ बुरा भी नहीं करना चाहिए। जीवन को सफल बनाने के लिए हमेशा अच्छा करने का ही विचार रखना चाहिए। उन्होंंने कहा जब तक यह गुण जीवन में नहीं आएगा तब तक हम धार्मिक नहीं बन सकते हैं। जानते हुए भी अगर मनुष्य किसी के साथ गलत करता है तो यह दोष के बराबर होता है। थोड़ा जीवन को ...

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