चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने कहा मन को निर्मल करना आवश्यक है। जैसे कपड़ों को धोने से उनका मैल निकल जाता है वैसे ही मन को धोकर मैल निकालकर मन को लेश्याओं के माध्यम से निर्मल बनाना आवश्यक है। लेश्याओं के माध्यम से व्यक्ति स्वर्ग और नरक दोनों को प्राप्त कर सकता है। ये 6 प्रकार की होती हैं-कृष्ण, नील, कपोत, तेजो ,पद्म शुक्ल। इनमें से तीन लेश्या व्यक्ति के पतन का कारण बनती है और तीन से व्यक्ति की उन्नति होती है। हर लेश्या वाले व्यक्ति के अलग अलग विचार होते हैं। लेश्याओं का चयन व्यक्ति पर निर्भर करता है। पद्म और शुक्ल लेश्या में जीओगे तो एक दिन कृष्ण बन जाओगे। उत्तराध्ययन के 34वें अध्याय में भगवान ने लेश्याओं के बारे में बताया है कि कषायों से मुक्ति पाने का साधन ही लेश्या है। जहां हमारे मन में राग होता है वहां कृष्ण, नील, कपोत लेश्या होती है। जहां राग नहीं ह...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने सोमवार कहा कि परमात्मा की वाणी भाग्यशाली लोगो को ही सुनने को मिलता है। जिनका सौभाग्य होता है वही गुरु वाणी का लाभ लेने के लिए आगे आते हैं। जिन वाणी सुनते सुनते जीवन मे ऐसे अहो भाव बनते है कि किस दिन मनुस्य अपने जीवन को समझने का प्रयत्न करेगा। हमने दूसरो को तो बहुत समझा, लेकिन अब खुद को धर्म से जोडऩे का समय आया है। उन्होंने कहा कि लोगो को यह तो पता है कि किस मौसम में कौन सा कपड़ा पहना जाता है। लेकिन ज्ञानी कहते हैं कि जब तक आत्मा की परख नही करेंगे तो सब बेकार है। यह परख नही करेंगे तो जीवन का उद्धार नही हो सकता। यदि जीवन को पावन बनाना चाहते हैं तो परमात्मा की वाणी से अपनी आत्मा की परख कर लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस जीवन को समझने की आवश्यकता है। जो भाग्यशाली आत्मा अपने जीवन के स्वरूप को समझ जाता है वह वास्तव में सबकुछ जान लेत...
चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा नमस्कार महामंत्र त्रिभुवन में अनुपम है। यह जन्म मरण रूपी संसार को समाप्त करने में समर्थ है। केवल ज्ञान और निर्वाण सुख देने वाला है। चारित्र को चमकाने वाला निर्मल नभ है। मोक्ष मंदिर में प्रवेश करने वाला नगर है और नम्रता की निधि है। कोई भी मंत्र तंत्र ध्यान हो नवकार में समाहित हो जाता है। मन की रक्षा के लिए नवकार मंत्र जरूरी है। तीर्थंकरों ने अपने पूर्व भवो में महामंत्र की अराधना द्वारा अपनी मंजिल की ओर प्रयाण किया। नवकार रूपी कल्पवृक्ष हमें शाश्वत मोक्ष धाम पहुंचाने की शक्ति रखता है। तीर्थंकर प्रभु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले हैं। इसी कड़ी में पांचवें तीर्थंकर सुमतिनाथ के स्मरण के जीन लाभ हैं। ज्ञानचक्षु खुलते हैं, बुद्धि तीक्ष्ण होती है और अनुमान क्षमता बढ़ती है। ये विचार साध्वी अपूर्वा ने व्यक्त किए। संघ में 11 लाख...
कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत धारा बरस रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि आज संगठन की बहुत जरूरत है, चाहे घर हो संघ हो समाज हो या देश हो। हर जगह पर प्रेम प्यार संगठन की आवश्यकता है। आ जाओ – आ जाओ एक बार संप की छाया में संप सदा जिसमें रहता है। उसके नित्य पड़ा रहता है संसार संप की छाया में एकता में संगठन में शक्ति है। जिस घर में संघ परिवार में समाज में देश में एकता रहती है उस संघ समाज को कोई भी तोड़ बिखेर नहीं सकते। कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्तिथ आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत धारा की कड़ी में नेहरू विद्यालय में महासंघ की ओर से सामूहिक क्षमापना एवं तपस्वीयों का बहूमान कार्यक्रम के अंतर्गत स्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के आचार्य श्री चंद्रजीत विजयजी म. सा . एवं श्वेतांबर तेराप...
चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने कहा कि महापुरुषों का गुणगान देवता भी करते हैं। तप जीवन की प्रयोगशाला है और मोक्ष की प्राप्ति के लिए मनुष्य को इस प्रयोगशाला से होकर गुजरना पड़ता है। उन्होंने गणेश चौदस अनंत चौदस के बारे में कहा कि मूर्तिपूजक की संवत्सरी अनंत चौदस व गणेश विसर्जन दिगंबर परम्परा की संवत्सरी होती है। आज ही के दिन 99 करोड़ मुनि सिद्ध-बुद्ध मुक्त हुए थे। जो व्यक्ति इस दिन उपवास करता है उसके समस्त कर्म खप जाते हैं। आचार्य जयमल की जन्म जयंती मनाते हुए उन्होंने कहा कि आज से 300 वर्ष पूर्व राजस्थान की माटी में आचार्य जयमल का जन्म हुआ था। उन्होंने जीव-अजीव संवर आश्रय का अध्ययन किया। आचार्य जयमल ने 3 घंटे एक वृक्ष के नीचे खड़े रहकर प्रतिक्रमण याद किया था। उन्होंने 20 मासखमण किए। उन्होंने छह वर्ष तक सिर्फ छाछ का पानी पीया। साध्वी महाप्रज्ञा ने भक्ति शब्...
चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने ‘ठाणं आगमाधारित प्रवचन में कहा पांच इन्द्रियों में एक इन्द्री स्पर्श भी होती है। स्पर्श से पुण्य और पाप भी होते हैं जिस प्रकार स्पर्श से किसी की समस्या का समाधान अथवा अनेक प्रकार की बीमारियों का इलाज भी किया जा सकता है तो किसी स्पर्श से कष्ट देने अथवा बुरे विचार से भी किया जा सकता है। स्पर्श सनेह और वात्सल्य का भी कारण हो सकता है। वैसे अस्पर्श साधना का एक प्रकार है। स्वयं द्वारा भी स्वयं के अंगों के स्पर्श का प्रयास न करना, एक विशेष साधना की बात हो सकती है। स्पर्श एक विज्ञान है। स्पर्श कितना करना और नहीं करना, इसकी सीमा आदमी ही नहीं साधुओं में भी हो, ऐसा प्रयास होना चाहिए। साधुओं को गृहस्थों के सिर पर हाथ रखने से बचने का प्रयास करना चाहिए। स्पर्श की एक सीमा बताई गई है। कितना स्पर्श करना और कितना स्पर्श ...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा जो अपने जीवन में जिनवाणी को महत्व देते हैं वही जीवन को परमात्मा की वाणी से जोडऩे का प्रयास करते हैं। अनंत काल से इस संसार में जन्म मरण करते हो गया। अब भी अगर इससे छुटकारा पाने की भावना नहीं आई तो जीवन को जिनवाणी से नहीं जोड़ा जा सकता। धर्म कार्यों में सहयोग देने वाला पुत्र अपने मां बाप के उपकारों से हल्का होने का कार्य करता है। जिन माता पिता ने बचपन में उंगली पकड़ कर मनुष्य को चलना सिखाया तो मौका मिलने पर उनका हाथ पकडऩे से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। उन्हें धार्मिक कार्यों से जोडऩा हर पुत्र का कर्तव्य बनता है। उन्होंने कहा माता पिता का हर पग पर सहयोग करने वाला पुत्र लोगों की नजरों में उठता है। श्रवण कुमार ने ऐसे ही अपना नाम रोशन नहीं किया बल्कि उन्होंने अपना पूरा जीवन अपने माता-पिता की सेवा में खपाया, तब लोग आज श्रवण कुमार को ...
चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने युवाओं को ‘मोटिवेशन मर जाता है, हैबिट्स जिंदा रहती हैं विषय पर उद्बोधन देते हुए कहा जीवन में पड़ी हुई आदतों को यदि हम सुधार लें तो जिंदगी की सारी समस्याएं समाप्त हो जाएं। एक अच्छी आदत हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचा देती है। धन कमाएं तो दुआओं के साथ कमाएं, किसी को दर्द पहुंचा कर नहीं। धन यदि नीति का होगा तो अन्न भी सात्विक होगा, अन्न सात्विक तो मन भी सात्विक, मन सात्विक तो तन सात्विक और तन सात्विक तो जीवन भी स्वस्थ व सात्विक होगा। जब हमें किसी से कोई मोटिवेशन मिलता है तो वह थोड़े समय के लिए ही रहता है, फिर मर जाता है और मोटिवेशन के मरते ही जोश भी ठंडा प? जाता है। फिर वही जिंदगी जीने लगते हैं जो पहले से जीते आए हैं। प्रेरणा का पलायन होते ही आदतें जिंदा हो जाती हैं। आदत कोई भी हो, वह लंबे समय तक चलती है, क्योंकि वह म...
चेन्नई. गोपालपुरम स्थित छाजेड़ भवन में विराजित कपिल मुनि के सानिध्य व श्री जैन संघ के तत्वावधान में रविवार को आचार्य जयमल का 311वां, आचार्य आत्माराम का 136वां एवं आचार्य डॉ. शिवमुनि का 77वां जन्म दिवस जप तप की आराधना व सामूहिक सामायिक साधना के साथ मनाया गया। रविवार को छाजे? भवन में आयोजित एक साथ इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुगओं ने तीन-तीन सामायिक साधना व एकासन की आराधना की। धर्मसभा को संबोधित करते हुए कपिल मुनि ने तीनों आचार्यों का गुण उत्कीर्तन करते हुए कहा महापुरुषों का जीवन चरित्र हमारे जीवन निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। उनके स्मरण से जीवन में गुण सम्पदा का विस्तार होता है । आचार्य जयमल 18वीं सदी में जैन धर्म के महाप्रभावी आचार्य थे। उनकी प्रेरणा से तत्कालीन अनेक राजा महाराजाओं ने मांसाहार का त्याग कर अहिंसा व्रत अपनाया उन्होंने सोलह वर्ष तक एकान्तर तप की आराधना की और करीब ...
चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा जैसी संगत वैसी रंगत हो जाती है। महर्षि बाल्मीकि कुसंग से डाकू बन गए थे, संतों का क्षणिक संपर्क जीवन की दिशा बदल देता है। साध्वी ने कहा गंगा पाप का, चंद्रमा ताप का, कल्पवृक्ष दीनता के अभिशाप का अपहरण करता है लेकिन सत्संग पाप, ताप व दैन्य तीनों का तत्काल नाश कर देता है। संतों के संग से वैर और अभिशाप का सुलगता दावानल बुझ जाता है। जैसे पारस के संपर्क से लोहा सोना बन जाता है वैसे ही संतों के संग से पापी धर्मात्मा बन जाता है। आज के युग में संत और साहित्य ही उत्थान के मार्ग हैं। आध्यात्मिक भाव रत्नों से भरी मंजूषा के समान है। यदि मन स्थिर न होने पर होने वाली आराधना व्यर्थ होती है। जबान पर शब्द और हृदय में भाव हो तब तक तो ठीक वरना वैसे ही होता है जैसे तेली का बैल कहीं पहुंचता नहीं और केवल एक ही सर्किल में घूमता रहता है वैसे ही इन्...
मुंबई: डा मुनि षांतिप्रिस सागर सागर महाराज ने कहा कि चिंता समस्याओं का समाधान नहीं, वरन् खुद सबसे बड़ी समस्या है। चिंता न केवल बीमार करती है, वरन् सौ अन्य रोगों को भी पैदा कर देती है। चिंता तो चिता से भी बदतर है, क्योंकि चिता को इंसान को एक बार वह भी मरने के बाद जलाती है, पर चिंता इंसान को पल-प्रतिपल जलाती रहती है। व्यक्ति चिंता की बजाय चिंतन करे और हर परिस्थिति का आनंद उठाए। उन्होंने कहा कि जीवन में न तो सम्पन्नता सदा शाश्वत रहती न ही सुंदरता। यहाँ अमीर गरीब हो जाते हैं और गरीब अमीर बन जाते हैं। रूप ढल जाता है और पद एक दिन छूट जाता है। इसलिए जीवन में कुछ मिल जाए तो गुमान न करें और चला जाए तो गिला न करें। मुनिश्री रविवार को मां मांगल्य भवन, योगी नगर सर्कल के पास, मेटरो ब्रिज पिल्लर 195 के सामने, लिंक रोड़, बोरीवली वेस्ट में आयोजित सत्संग समारोह में श्रद्धालु भाई-बहनों को संबोधित कर रहे थे। स...
चेन्नई. रविवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज के प्रवचन का कार्यक्रम आयोजित किया गया। उपाध्याय प्रवर ने जैनोलोजी प्रैक्टिकल लाइफ में अन्तर की शक्ति को जाग्रत करने के लिए आत्मा के तीसरे तत्त्व चरित्र के बाद में बताया। क्रिया, व्यवहार, आचार सामने दिखता है लेकिन जरूरी नहीं कि जो क्रिया वह कर रहा है उसकी अनुभूति उसे हो रही हो। अनुभूति और अहसास को चरित्र कहते हैं। क्रिया, व्यवहार और आचार से पृथक होता है। कई बार अच्छी क्रिया करने के बाद भी समाधान नहीं होता। आचरण करने के बाद भी उसका फल नहीं मिलता। क्योंकि जैसा चरित्र होता है वैसा ही फल मिलता है। क्रिया, आचार और व्यवहार तो सिखाया जा सकता है लेकिन अहसास और चरित्र नहीं सिखाया जा सकता। पक्षी भी रटारटाया बोल सकते हैं, लेकिन वह उनके चरित्र और भावना ...