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जिनवाणी सुनकर जीवन में लाएं बदलाव: गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने शनिवार को कहा कि परमात्मा की वाणी जब भी सुनने को मिले तो व्यक्ति को अंतरात्मा से उसका श्रवण करना चाहिए। उन्होंने कहा ज्ञानी कहते हैं कि गुरुदेव शासनपति का पत्र सुनाने के लिए आते हैं। इसे सुनने के लिए बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए, नींद में रहकर जीवन को बेकार नहीं करना चाहिए। शरीर की सुस्ती को दूर कर कथानक को बहुत ही ध्यान से सुनकर जीवन में उतारना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रवचन सुनने के दौरान अगर पास में बैठा मनुष्य भी बात करने की कोशिश करे तो उसे रोक कर ध्यान केंद्रित करें। जिनवाणी से  मिलने वाली प्रेरणा ही जीवन को बदलने में मुख्य भूमिका निभाती है। प्रवचन सुनते सुनते दिल में उत्कृष्ट भाव आने पर मनुष्य जीवन बदल सकता है। बहुत सारे ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने प्रवचन सुन कर अपने जीवन में अहोभाव उत्पन्न किया। इस बात को ध्यान में रखते हुए...

शरीर का वास्तविक मूल्य निर्धारण साधना से: ज्ञान मुनि

वेलूर. बेरी बक्काली स्ट्रीट स्थित शांति भवन में विराजित ज्ञान मुनि ने कहा कि आत्मा की दृढ़ता शरीर की दृढ़ता पर निर्भर नहीं होती है। वह चाहे कृश शरीर में हो या दृढ़ शरीर में, उसका क्षयोपशम जितना शीघ्र होगा उतना ही अधिक ज्ञान-दर्शन प्राप्त कर सकेगा। आत्मा की पवित्रता के लिए शरीर की दृढ़ता या सौंदर्य कोई मूल्य नहीं रखता। शरीर का वास्तविक मूल्य साधना से ही निर्धारित होता है। जो शरीर आत्मा की साधना में सहायक बनता है वही मूल्यवान कहलाने का अधिकारी है। इसके विपरीत शरीर आत्मा को नरक के द्वार पर पहुंचा देता है एवं भवभ्रमण बढ़ा देता है। वह कितना भी रूप संपन्न क्यों न हो उसका कोई मूल्य नहीं होता। दूसरों के कष्टों को अपना समझना ही सच्ची मानवता है।

प्रेम को समाप्त करता है क्रोध: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि क्रोध से हमारी पुरानी पहचान है। यदि कोई आपका अहित कर देता है तो आप उसे शत्रु के रूप में देखते है। उससे सावधान रहते है और अगर वो आपके घर में प्रवेश करे तो आप उसे धक्के मार कर घर से बाहर निकाल देते है। क्रोध भी प्रेम संबंध समाप्त करने वाला भयंकर दुश्मन है। इसे बाहर निकालना है। क्रोध बारुद का कारखाना है। बारुद में चिंगारी लगते ही चंद मिनटो में समाप्त हो जाता है। क्रोधी मनुष्य माता पिता, भाई बहन, गुरु शिष्य को भी मारने में नहीं हिचकिचाता है। क्रोधी खुद भी जलता है और दूसरो को भी जलाता है। उपकारी के उपकार को भूल जाता है। हर मानव ऊर्जा का पुंज है। जब हम क्रोध करते है तो ये ऊर्जा क्रोध में बदल जाती है। व्यक्ति गिर जाता है। यही ऊर्जा क्षमा में लगती है तो ऊध्र्वगामी हो जाती है। साध्वी अपूर्वा ने कहा कि जिनकी भक्ति हमारे भीतर के ताप-से...

भोजन की तरह जरुरी है साधना: साध्वी कुमुदलता

चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने ज्योतिष की चर्चा करते हुए कहा कि मकर राशि और कुंभ राशि का विवेचन आपके जीवन की पत्री बता देता है। जैन धर्म में कहा गया है कि सामयिक का की अराधना करें। कर्मकर जीवन में सुख शांति पाएं। पंडित आपको मांगलिक नहीं दे सकता। मकर राशि वाले कभी चुप नहीं बैठ सकते। कुंभ राशि वाले का स्वभाव घड़े के समान होता है। इस राशि वाले हमेशा पी जाते है। इनके जीवन में उतार चढ़ाव चलेगा। वे सहनशील होते है। जो काम लेते है वो कर के छोड़ते है। शनि की महादशा 19 वर्ष की होती है। कुंभ राशि में शनि चल रहा है। मकर और कुंभ राशि वालों को कष्ट होगा। राहू-केतु की पीड़ा होगी। शनि व्यक्ति को कर्म फल देते है। शनि का स्टोन नीलम है। वो राजनेता को समाज में बुलंदी देता है। हर शनिवार को सुकृत स्वामी की अराधना करे।  पाश्र्वनाथ की अराधना नहीं करेगा तो बुरी दशा आएगी। जैसे रो...

मृत्यु को मिटाना मुमकिन नहीं, किंतु जीवन को सुधारना मुमकिन है: मुनि संयमरत्न विजय

चेन्नई. साहुकार पेठ स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कस्तूरी प्रकरण के ‘ब्रह्म-प्रक्रम’ का वर्णन करते हुए कहा कि दोनों हाथ से समुद्र को पार करने वाले, आकाश में पैरों से भ्रमण करने वाले, बिना कवच और बाणों के रणसंग्राम में युद्ध करने वाले, चतुर होने पर भी जंगल में भटकने वाले असंख्य लोग मिल जाएंगे। उन्होंने कहा कि मृत्यु को मिटाना मुमकिन नहीं, किंतु जीवन को सुधारना मुमकिन है, जीवन को सुधार लो, मृत्यु भी सुधर जाएगी और परलोक भी सुधर जाएगा। किंतु चित्त को चलायमान कर देने वाली स्त्रियों के परिचय में आने पर भी जो विचलित न हो,ऐसे तो कुछ विरले  ही जगत में होते हैं। पतंगाओं से जैसे सूर्य नहीं ढकता, हिरणों से जैसे केसरी सिंह, राक्षसों से इंद्र, सर्पों से गरुड़ और पवन के समूह से मेरु पर्वत चलायमान नहीं होता। वैसे ही जिसका हृदय स्त्रियों को देखकर विचलित नहीं होता, वे पुर...

चिंतन के दो प्रकार: वीरेन्द्र मुनि

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत धारा बरस रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि सुबाहु कुमारजी धर्म आराधना करते हुए रात्रि के तीसरे पहर में सोते हैं परंतु आंखों से नींद गायब हो गई। चिंतन शुरू हुआ मनुष्य को जब निद्रा नहीं आती है तब कुछ सोचने लगता हैं। चिंतन दो प्रकार का होता है एक तो कुटुम्ब जागरणा और दूसरा धर्म जागरणा।   ( 1 ) एक कुटुम्ब याने परिवार के विषय में चिन्ता करना जैसे – कि घर परिवार में कोई बीमार है तो दवा डॉक्टर के विषय में सोचते रहते है। कौन से डॉक्टर को बताना जो अच्छा हो, जल्दी बीमारी को दूर कर सके  तथा पढ़ने वाले बच्चे हैं घर में बराबर पढ़ाई नहीं हो रही है तो कौन से मास्टर से पढ़ाना , या कौन से स्कूल कॉलेज में दाखिला दिलाना। विवाह योग्य हो गये और कहीं पर भी संबंध नहीं हो ...

हृदय से की गई स्तुति का फल अवर्णनीय: कपिल मुनि

चेन्नई. गोपालपुरम में लॉयड्स रोड स्थित छाजेड़ भवन में चातुर्मासार्थ विराजित कपिल मुनि के सान्निध्य व श्री जैन संघ, गोपालपुरम के तत्वावधान में रविवार को सवेरे  9 .00 बजे से 10.30 बजे तक ध्यान साधना सत्र और सर्व सिद्धि प्रदायक, विघ्न बाधा विनाशक श्री वज्रपंजर (आत्म रक्षाकर) स्तोत्र जप अनुष्ठान का आयोजन किया जाएगा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु मुनि के निर्देशन में विशेष विधि के तहत ध्यान साधना और जप आराधना करेंगे। कपिल मुनि ने इस स्तोत्र की महिमा बताते हुए कहा कि पञ्च परमेष्ठी देव असीम शक्ति के पुंज हैं। उनकी स्तुति और भक्ति से पाप रूपी अन्धकार का नाश होता है और आत्मा के मौलिक गुणों का प्रकटीकरण होता है। आत्मोत्कर्ष के लिए जितनी भी साधनाएं हैं, प्राय: उन सब में मंत्र, स्तोत्र, छंद आदि जप का समावेश किसी न किसी रूप में अवश्य होता है क्योंकि मंत्र विद्या मनुष्य के अंतरंग में सोई उन शक्तियों और क्षम...

जीवन की सार्थकता के लिए नियति को पहचानें: आचार्य पुष्पदंत सागर

चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा बच्चा मां से और श्रावक साधु से सीखता है। जगत बहुत बड़ा है किसी से भी जीने की कला सीख सकते है। लेकिन हर कार्य को सफल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रयत्न करना हमारे हाथ में है पर परिणाम हमारे हाथ में नहीं है। भाग्य के अधीन है। अनुकूलता में मन की प्रसन्नता को और प्रतिकूलता में मन को स्थिर रखना मुश्किल है। सुख में धन का दुरुपयोग करने से और बुरे कर्म करने से खुद को दूर रखने का प्रयास ही धर्म है। गिरता हुआ मनुष्य बच सकता है, पतित होता हुआ मनुष्य संभल सकता है यदि प्रतिकूलता के समय धैर्य और समता से जीए। धोखा खाने पर आंख खुलती है। उसी आंख के खुलने पर सच्चाई की संवेदना होती है। अपनी नियति को पहचानो और अपने भवितव्य जानो ताकि मनुष्य जन्म सार्थक हो सके।

शुभ भावना से दिया गया दान मोक्ष की ओर ले जाता है: साध्वी कुमुदलता

चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने कहा कि शुभ भावना से दिया गया दान मोक्ष की ओर ले जाता है। अब मन को तेजो लेश्या में लाना है। पद्म और शुक्ल लेश्या में आभा मंडल शुभ होगा। पद्म और शुक्ल लेश्या वाला व्यक्ति सात्विक जीवन जीता है। कीचड़ में रहकर भी कमल खिलता है। पद्म लेश्या में इलायची कुमार जीते थे। उन्हें नृत्य देखकर वैराग्य आया। हम चार महीने इसलिए प्रवचन सुनते हैं क्योंकि हमारे व्यवहार में बदलाव आए। सत्कार्य से कर्म के बंधन कम होंगे। यही पद्म और तेजो लेश्या के भाव हैं। पद्म सरोवर देखेंगे तो सरोवर के पार जाने और मोक्ष पाने का भाव जागेगा। साध्वी परमकीर्ति ने कहा क्रोध करने के पहले अच्छी तरह से सोचो। हर बात में फायदा और नुकसान देखते हो और क्रोध करने के पहले नहीं सोचते। क्रोध आए तो सोचो इसका क्या फायदा है और क्या नुकसान। क्रोध से किसी भी प्रकार लाभ नहीं होता। इसके ...

अहंकारी घंटाघर के बंदर के समान: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा अहंकारी व्यक्ति अपने आपको ही सब कुछ जबकि दूसरों को मूर्ख समझता है। अहंकारी घंटाघर के बंदर के समान होता है जो खुद को सबसे ऊपर समझता है। अभिमानी कहता है कि जगत मेरा सेवक है और विनयी कहता है मैं जगत का सेवक हूं। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो उसके पास में न तो काम होता है और न ही धाम। न कोई पद होता है और न ही प्रतिष्ठा। नाम के चक्कर में पद और प्रतिष्ठा की दीवार खींचने वाला व्यक्ति अभिमानी हो जाता है। जो अपने आप को नहीं पहचान सकता वह ज्ञान-ध्यान-तप-बल का अभिमान करता है। संसार में तीन प्रकार के रोग हैं तन का, मन का और आत्मा का। मान के कषाय पर विजय प्राप्त करने से ही केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है। साध्वी अपूर्वा ने कहा तीर्थंकरों का नाम दिव्यता से भरा है चौबीस तीर्थंकरों के नाम में सुविधिनाथ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा यह नाम प्रेरक भी...

जीवन में सफलता के लिए सामायिक और स्वाध्याय जरूरी

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा जीवन में सफलता के मार्ग पर जाने के लिए सामायिक और स्वाध्याय करना बहुत ही जरूरी होता है। गुरु भक्ति मनुष्य को ऊंचाई पर ले जाने वाली होती है। इसे ध्यान में रखते हुए अपने जीवन को गुरु चरणों में समर्पित करना चाहिए। संयम और श्रद्धा का पाठ सुनकर मन में जीवन को बदलने का विचार आता है। उन्होंने कहा मनुष्य को राग-द्वेष छोडक़र मन में क्षमा भाव रखते हुए सही मार्ग पर पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। अपने दोषों की शुद्धि के लिए स्थानक जाकर गुरु के ज्ञान जाने से जीवन में से प्रकाश होगा। उन्होंने कहा कि मोक्ष के मार्ग का अनुसरण करने से ही जीवन का कल्याण संभव है। परमात्मा की दिव्यवाणी का श्रमण करने के लिए देवलोक के देवता भी अपने सारे सुख को छोडक़र आते है। यह सिर्फ परमात्मा के प्रति अहोभाव आने पर ही संभव  है। मनुष्य को भी अपने दिखावे के सुख को छोड...

मन को सदा रखे शुद्ध : आचार्य श्री महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सुत्र के दूसरे अध्याय के 460वें श्लोक में मन परिचालना का संदर्भ आता है| बारह देवलोकों में 10 इंद्र होते हैं| देव जगत में कुल इन्द्रों की संख्या 64 होती हैं| 9वें-10वें तथा 11वें-12वें देवलोक में देवों की कामेच्छा मन से ही पूरी हो जाती हैं| उनमें सहज उच्चता होती है| उन देवों में समव्यवस्था भी होती है|   आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि हम मन पर विचार करें| मन सभी समनस्क मनुष्यों में, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, देव तथा नारकों में विधमान होता हैं| हम मन से स्मृति, कल्पना, चिंतन व विचार करते हैं| हमारा मन दुर्मना ना रहे, सुमना रहे| हमारा मन खराब न हो, पवित्र रहे|      *प्रभु को मन में बैठा लेने से मन बनता निर्मल     आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि हम मन को सदा शुद्ध रखने का प्रयास करें| हार के आगे उपसर्ग लगने से शब्द का अर्थ बदल जाता है | हार के पू...

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