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जीवन पानी के बुलबुले के समान क्षणिक: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. जीवन पानी के बुलबुले के समान क्षणिक जीवन है, शरीर रोगों का घर है, इस शरीर को छोडऩे से पहले इससे कुछ प्राप्त करना है, संसार असार है एवं संयम जैसा सुख नहीं है। यह समझकर मृगापुत्र संयम लेने के लिए तत्पर रहें क्योंकि इस जीव ने नरक गति में भयंकर वेदनाएं सहन की। तांबरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा संयति राजा मृगापुत्र ने प्रभु की जिन वाणी स्वीकार करके शांति साता-समाधि और सुख प्राप्त किया। जीवन की नश्वरता को समझा, यह शरीर अनित्य है, अपवित्र है, अशुचि पदार्थो से इसकी उत्पति हुई है। देवगति ने भी बंधनों को सहन किया, अब मनुष्य जीवन में राजमार्ग पर आकर जीवन को सार्थक करना है। जब इंसान के हृदय में से असक्ति का गीलापन हट जाता है तो घर, बंगला और धन्ना जी का महल, जम्बूजी और शालिभद्र का सुख छोडऩे में कोई तकलीफ सहन नहीं करना पड़ता। साध्वी धर्मलता ने कहा हमारा जीवन सडक़ की तरह निर्लिप्...

जीवन का सच्चा लाभ परमात्मा की भक्ति में: गौतममुनि

चेन्नई. जीवन का सच्चा लाभ उठाने के लिए परमात्मा की भक्ति का लाभ ले लेना चाहिए। पुण्य से मिली चीजों को गंवाने के बजाय उनका पूरा लाभ लेने को तत्पर रहना चाहिए। छोटे बच्चों में जब लगन होती है तो वे धर्म के क्षेत्र में बहुत आगे निकल जाते हैं। इस लिए बचपन से ही बच्चों को धर्म संस्कारों से भावित करना चाहिए। साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा गुरु चरणों में बैठ कर परमात्मा की वाणी का लाभ लेना चाहिए। भाग्यशाली लोगों को ही गुरुवाणी सुनने का मौका मिलता है। भाव प्रकट कर वाणी का अनुसरण करने से जीवन में नया मार्ग खुलता है। इससे मनुष्य के कर्मों की निर्जरा के साथ मन को शांति मिलती है। ऐसा मौका मिलने पर तत्पर होकर जीवन को आगे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य का जीवन ऊंचाई पर पहुंच जाता है। सागरमुनि ने कहा धर्म रूपी लोक में परमात्मा ने प्रकाश कर प्रत्येक जीव पर अनंत उप...

प्रकृति के साथ हो सामंजस्य : आचार्य श्री महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में त्रिदिवसीय*प्रकृति के साथ सामंजस्य और 21वीं सदी में जैन विजन*सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर जनमेदनी को संबोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि हमारी दुनिया में अनन्त अनन्त प्राणी हैं| प्राचीन मान्यताओं के अनुसार 84 लाख जीवा योनीयों में से मनुष्य भी एक प्राणी हैं| सब जीवों में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी हैं, क्योंकि जैन सिद्धांतों, ग्रन्थों के अनुसार मनुष्य ही केवलज्ञान प्राप्त कर, भगवत्ता, सिद्धतत्वता, मुक्ति को प्राप्त कर सकता हैं|* आचार्य श्री ने आगे कहा कि हमारी दृश्य दुनिया, जिसमें पेड़- पौधे, पशु इत्यादि हैं, उसमें मनुष्य के पास एक अच्छा दिमाग हैं, जिसके आधार पर वह कई तरह के कार्य कर लेता हैं, उसने कितने ही आविष्कार किये हैं, नये-नये यंत्रों का निर्माण किया है, नई-नई ज्ञान की बाते सामने आई हैं| इस दिमाग, मस्तिष्कीय क्षमता के ...

सम्यक पुरुषार्थ सफलता का स्रोत: उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

चेन्नई. प्रभु महावीर के समवशरण का ध्यान और रचना अपने अन्तर में कराते हुए उत्तराध्ययन सूत्र में कहा गया है कि संसार का कोई भी जीव श्रम और पराक्रम किए बिना नहीं रहता है। किंतु जहां श्रम और पराक्रम यदि सम्यक हों तो सपने पूरे होते हैं और जहां पुरुषार्थ मिथ्यात्व में होता है तो सपने टूट जाते हैं। श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज ने गुंरुंवार को श्रद्धालुओं को यह मार्ग बतलाया। उन्होंने जीवन की सभी समस्याओं का समाधान करने के लिए ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप को जानें। परमात्मा द्वारा बताए गए 71 बोलों में से यदि एक की भी आराधना कर ली जाए तो बाकी सभी आपके जीवन में साकार होने लग जाएंगे। मन, वचन काया और योग को हिंसामुक्त करेंगे तो अन्य भी स्वत: मुक्त हो जाएंगे। मंजिल पाने के लिए सभी प्रयास करते हैं और लम्बे रास्तों पर भी चलते हैं लेकिन प्र...

चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता: वीरेन्द्र मुनि

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता बह रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि आर्य सुधर्मा स्वामी ने जंबू स्वामी से कहा कि – भगवान महावीर स्वामी काश्यपगोत्रीय थे। जिस प्रकार हजारों देवों का अधिपति इंद्र है जो कि रूप बल ऐश्चर्य वाले हैं। उसी प्रकार भगवान महावीर स्वामी भी सभी मुनियों में रूप गुण बल ऐश्वर्य आदि से सर्वोत्तम है। उन्होंने पूर्व के ऋषभदेव भगवान से लेकर के 23 तीर्थंकरो ने जिस प्रकार धर्म की व्याख्या – परुपणा करके गये हैं। उसी प्रकार भगवान ने भी धर्म के मर्म को समझाया वैसे जिन लोगों को जैन धर्म के विषय में अधूरी जानकारी है। कई यह जानते हैं और कहते भी है कि हिंदू धर्म में से जैन धर्म निकला है उन लोगों को यह नहीं पता है कि जैन धर्म से हिंदू धर्म व अन्य धर्म की उत्पत्ति ह...

संसार की असारता को समझें: साध्वी महाप्रज्ञा

चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी महाप्रज्ञा ने कहा जीवन का अर्थ समझकर अनर्थ नहीं करें। धर्म एवं स्वाध्याय कर अपने मानव भव को सफल सार्थक करें। नमिपवज्जा की 9 शिक्षाओं के माध्यम से एक शब्दों के अर्थ एक-एक अध्ययन का शब्द से नाम अगर सोचें एवं चिंतन करें तो यह शब्द जीवन का उद्धार करेगा। नौवें अध्ययन में दो संस्कृति का मिलन है- एक गृहस्थ आश्रम, दूसरा संन्यास आश्रम। व्यक्ति को कितना ही समझाएं पर उसे गृहस्थ आश्रम ही अच्छा लगता है। संसार की असारता को समझें जीवन को व्यर्थ न गवाएं। संसार में निस्वार्थ अवस्था में रहकर व्यक्ति अपने भावों को शुद्ध बनाएं। शुद्ध बनाकर अपने आपका जीवन सफल सार्थक करें। संसार में रहो, कीचड़ में कमल की तरह रहोगे तो जीवन सफल होगा। उत्तराध्ययन सूत्र का 9वां अध्ययन रोज कर कर्म काटकर अपने घर-परिवार में रिद्धि-सिद्धि प्राप्त करें। महाप्रज्ञ ने गीतिका एवं भजन क...

पाप का प्रायश्चित करने वाला ही श्रेष्ठ: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि श्रेष्ठ भिक्षु और पापी श्रमण दोनों ही जीवन यापन करते हैं। जीवन में पाप हो जाना स्वाभाविक है मगर छिपे हुए पाप की आत्मा की साक्षी से निंदा करे, गुरु के समक्ष गर्हा करे और गुरु जो प्रायश्चित दे उसे स्वीकार करे वही श्रेष्ठ भिक्षु कहलाता है और जो नियम को यम समझता है, पद प्रतिष्ठा से जुड़ा रहना चाहता है वह पापी श्रमण कहलाता है। जिसके भीतर पाप के लिए अरुचि, अप्रीति और घृणा पैदा होती है वही साधक आलोचना और प्रयश्चित कर सकता है। प्रायश्चित हल्का होने की एक विद्या है एक अनूठा इरेजर है पाप छिप नहीं सकता है और प्रकट करेंगे तो वह घटता जाएगा। छिपाकर रखेंगे तो वह दृढ़ हो जाएगा। पाप शरबत जैसा मीठा है। आत्मनिंदा चिरायता जैसे कड़वी है पर रोगी के लिए चिरायता फयदेमंद है। मन फिसलपट्टी जैसा है, एक बार फिसल गया तो फिसलता चला जाएगा। पारे की तरह बिखरता...

भक्ति से मिलती है सहन करने की क्षमता: पुष्पदंत सागर

चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा छाता बरसात को नहीं रोक सकता पर वर्षा के पानी से बचा सकता है। एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने का हौसला बढ़ सकता है। एक स्थान पर धैर्य से खड़ा रख सकता है। इसी प्रकार पूजा, भक्ति, परमात्मा की आराधना, सत्संग, स्वाध्याय हमारे दुखों को कम तो नहीं कर सकते पर उन्हें सहन करने की क्षमता जरूर देते हैं। समता भाव को, विवेक को जरूर जन्म देते हैं। समझ को पैदा कर सकते हैं। आगामी अनैतिक विचार को रोक सकते हैं इसलिए दान पूजा भक्ति करो, पुण्य बढ़ेगा। सत्संग करो परमात्मा पर आस्था बढ़ेगी। जीने की कला मिलेगी। पाप से अनैतिक आचरण से बचने की प्रेरणा मिलेगी। तुम अभाव में भी मुस्कुरा सकोगे। जड़ दिखती नहीं है पर वृक्ष को पूरा पोषण देती है। पुण्य दिखता नहीं है पर जीवन को सुविधाएं और परमात्मा पिपासु को समझ संयम की प्रेरणा जरूर देता है। सद्का...

स्वाध्याय से जीवन होता है सफल: गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने बुधवार को कहा उत्तराध्ययन के माध्यम से सभी परमात्मा की दिव्य वाणी को सुन रहे हैं। इसका सही से लाभ लेकर जीवन को धन्य बनाने का प्रयास करना चाहिए। स्वाध्याय के साथ ही मनुष्य को दूसरों को भी स्वाध्याय करने की सलाह देनी चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य का जीवन ऊंचाइयों पर पहुंच जाता है। परमात्मा की वाणी सुनकर मनुष्य अपने जीवन के कर्मो की निर्जरा कर सकता है। इसे समझने वाले महान लोगों में शामिल हो जाते हैं। मनुष्य को जिनवाणी सुनकर उस तत्व में अपने जीवन को आगे बढाने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य को बहुश्रुत बनने के लिए विनयवान बनने की जरूरत है। उन्होंने कहा मिले इस मनुष्य भव में धर्म के कार्य कर इस भव के साथ आने वाले भव को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करके मनुष्य खुद की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति करा देता है। उन्होंने कहा मनुष्य भव को ...

सेवा से मिलता हैं मेवा : आचार्य श्री महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर में ठाणं सूत्र के छठे अध्याय के इकत्तीसवें सूत्र का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि समचतुरस आदि छः संस्थान होते हैं। संस्थान हमारे शरीर की आकृति होते हैं। शरीर का अपना सौंदर्य होता है, शरीर का गठन अलग-अलग होता हैं| कोई लंबा, तो कोई ठिगना, कोई सुंदर और कोई भद्दापन| शरीर के आधार पर व्यक्ति के भाग्य का आंकलन हो सकता हैं| हस्तरेखा और पैर की रेखा से भी भाग्य का आंकलन हो सकता है। कभी-कभी पद चिन्हों को देखकर भी भाग्य का आंकलन हो सकता है। कान कैसे, आँख कैसी, कानों पर बाल आदि आकृति से भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का आंकलन हो सकता है। आचार्य श्री ने आगे कहा कि गणी संपदा में भी एक शरीर संपदा बताई गई है। शरीर की संपदा में, शरीर की क्षमता व इंद्रियों की सक्षमता भी देखी जाती है।* मनोनयन पर शरीर ठीक हो, साथ में सुंदरता भी वांछनीय हैं। प्रथम दर्शन में चेहरा ही साम...

मन से हिंसा भी हो सकती है और पुण्य भी: प्रवीणऋषि

चेन्नई. बुधवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज ने उत्तराध्ययन सूत्र का वाचन कराया। उन्होंने कहा कि सदैव स्वयं को शुभ समरम्भ, समारम्भ और आरम्भ में लगाएं रखें। किसी कार्य को करने की मन में इच्छा करना, उस कार्य को करने के लिए आवश्यक सामग्री इक_ा करना तथा उस कार्य की शुरुआत करना समरम्भ, समारम्भ और आरम्भ है। यह शुभ कार्मों में भी हो सकते हैं और अशुभ भी। इससे अपने मन की पूरी शक्ति को उसी कार्य करने में लगा दिया जाता है। जिस प्रकार अभयकुमार अपनी मां की दोहद इच्छा पूरी करने के लिए तप करता है और देव को आना ही पड़ता है। ऐसा मन का सामथ्र्य है। मन से हिंसा भी ऐसे हो सकती है और पुण्य भी हो सकता है। आगम में दिए गए सूत्रों का हमें केवल जानकारी और ज्ञान बढ़ाने के लिए ही नहीं व्यवहारिक जीवन में भी प्रयोग करने चाहिए। रास्ते देखने के लिए नह...

लोभ पाप का बाप है: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. लोभ के वशीभूत अपनी संस्कृति से अलग हो जाता है। लोभ तो पाप का बाप है। लोभ मजीठ के रंग जैसा है। जो कभी उतरता ही नहीं। लोभ का जन्म मन की चंचलता और निरंकुशता से होता है। एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि जितनी कम होगी मांग की मात्रा उतनी सफल होगी जीवन की यात्रा। मानव का मन बड़ा विचित्र है। जो उसके पास है वह उससे संतुष्ट नहीं होता है और जो दूसरों के पास है उसे पाने के लिए वह उत्सुक रहता है। वह हक का नहीं हराम का खाना चाहता है। श्मशान की अग्रि और पेट की तरह लोभ का गड्डा भी कभी भी भरता नहीं। इंसान के मन में काम, क्रोध , मद , लोभ की ज्वाला जब जागृत हो जाती है तब वह पंडित होते हुए भी मूर्ख जैसे कार्य करता है। इसलिए कहा गया है कि लोभ दुख का कारण है और संतोष सुख का कारण है। साध्वी सुप्रतिभा ने कहा कि जीव कर्मों के अनुसार भुगतान करता है। सातवेदनीय कर्म का बंध गुरु भक्ति...

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