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कषाय आत्मा में सद्गुणों को समाप्त कर देते है: साध्वी संबोधि

कषाय स्वयं ऐसी भयंकर आग है जोआत्मा के सद्गुणों का विनाश कर देती है।कषाय साधक के तन-मन और वचन को संतप्त, व्याकुल एवं अशान्त कर देती हैं। जब तक कषाय जीव के साथ संलग्न है तब तक संसार में गमनागमन जारी रहता है। क्रोध-मान-माया और लोभ ये चार कषाय हैं जो मन-वचन-काया की चंचलता को बढ़ाने वाले एवं कर्मों को आकर्षित करने वाले ‘आश्रव’ भी हैं तथा कर्मों को टिकाकर रखने वाले ‘बन्ध’ का कारण भी है। क्रोध रोजमर्रा जीवन की ज्वलन्त समस्या है। इसका द्वेष, ईर्ष्या या वैर और उद्विग्नता से गहरा सम्बन्ध है। एक क्षण भर का किया हुआ प्रबल क्रोध, करोड़ पूर्व वर्षों में अर्जित तप को नष्ट कर देता है। जीवन की मूलभूत समस्या अहंकार है जो मनुष्य को अंधा बना देती है। मान (अहंकार) आत्म-गुणों का घातक है। भगवान महावीर ने कहा मान से व्यक्ति अधम गति, अधम जाति एवं अधम कक्षा में पहुँच जाता है।तात्पर्य यह है क...

संसार अनंत, सुख क्षणभंगुर; वैराग्य हेच खऱ्या मुक्तीचे द्वार

प्रवचन – 19.08.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) “संसार भावना – वैभवातून वैराग्याकडे” जैन धर्मातील 12 भावना हे आत्मशुद्धीचे महत्त्वाचे साधन आहे. त्यातील संसार भावना आपल्याला शिकवते की – हा संसार अखंड दुःखाचा प्रवाह आहे. जन्म, मरण, लाभ, हानी, ऐश्वर्य, मानमरातब – हे सर्व क्षणिक आहे. या भावनेतून वैराग्य निर्माण होते व आपले पाऊल मोक्षमार्गाकडे वळते. ऐश्वर्यसंपन्न शालिभद्र – ३२ राण्या, अमर्याद संपत्ती, वैभवशाली जीवन! तरीही त्यांच्या मनाला शांती नव्हती. एक दिवस त्यांना सत्याची जाणीव झाली की – “ही संपत्ती, हे वैभव क्षणभंगुर आहे. खरे सुख आत्म्यात आहे.” त्यांच्या मनात वैराग्य जागले. आणि त्यांनी ठरवले की – संसार सोडून अनागार जीवन स्वीकारायचे. शालिभद्र “सर्वांचा नाथ” बनला, वैभवाचा नाही – तर वैराग्याचा! शालिभद्राची दीक्षा घेतल्य...

तपस्या दृढ़ मनोबल का परिचायक : मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार

तपस्विनी दिव्या भटेरा व प्रज्ञा सेठिया का तपोभिनंदन कल से पर्युषण पर्व का शुभारंभ आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार, मुनि रमेश कुमार, मुनि पद्म कुमार एवं मुनि रत्न कुमार के पावन सान्निध्य एवं श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के तत्वावधान में मंगलवार को स्थानीय तेरापंथ धर्मस्थल में श्रीमती दिव्या भटेरा (धर्मपत्नी : श्री सिद्धार्थ भटेरा) तथा सुश्री प्रज्ञा सेठिया (सुपुत्री : अशोक कुमार सेठिया) दोनों के नौ (9) की तपस्या के उपलक्ष्य में तपोभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर तेरापंथी सभा, गुवाहाटी की ओर से साहित्य एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर तपस्वी भाई के तप की अनुमोदना की गई। इस अवसर पर मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार ने दोनों तपस्विनी बहनों के तप की अनुमोदना करते हुए कहा कि तपस्या दृढ़ मनोबल का परिचायक है। जिनके मन में जागरण होता है, वही तपस्या के क्षेत्र में आग ...

त्रिदिवसीय आवासीय शिविर डिवाइन टच सामायिक स्वाध्याय भवन, किलपाक में सम्पन्न

श्री जैन रत्न श्राविका मण्डल, तमिलनाडु के संचालन में आचार्य भगवन्त पूज्यश्री हीराचन्द्रजी म.सा भावी आचार्यश्री महेन्द्रमुनिजी म्.सा की आज्ञानुवर्तिनी महासतीजी श्री सुमतिप्रभाजी म.सा ठाणा 7 के सानिध्य में बालिकाओं के संस्कार रोपण हेतु त्रिदिवसीय आवासीय शिविर डिवाइन टच का आयोजन किलपाक में स्थित चातुर्मास स्थल सामायिक स्वाध्याय भवन में रखा गया,जिसमें 110 बालिकाओं ने भाग लिया | संस्कारीय शिविर में महासतीजी श्री सिन्धुप्रभाजी म.सा,श्री तितिक्षाजी म.सा,श्री वर्षाजी म.सा,श्रीमती संगीताजी मेहता,सीमाजी भंसाली, विनीताजी सुराणा,श्री दिनेशजी भंसाली,अशोकजी बोकड़िया ने विभिन्न कक्षाओं के माध्यम से नैतिकता व व्यवहारिकता,धार्मिकता आदि सद्गुणों को समझाते हुए प्रेरणास्प्रद उद्बोधन दिया | शिविर समापन कार्यक्रम में बालिकाओं ने शिविर में हुए अपने अनुभव बताए व विजेताओं की घोषणा श्राविका मण्डल की मन्त्री दीपिकाजी...

समस्त दुखों का कारण प्रमाद: साध्वी संबोधि 

हितकारी शुभ कार्यों में अरुचि रखना तथा धर्मक्रियाओं में अनुत्साह दिखाना प्रमाद है। प्रमादी मनुष्य का करणीय-अकरणीय का बोध धुंधला हो जाने से उसकी जागृति खो जाती है। प्रमाद का अर्थ मात्र आलस्य या नींद लेना ही नहीं है अपितु आत्मविस्मृति का नाम प्रमाद है। इसी कारण प्रमादी मनुष्य करने योग्य कार्य नहीं करता और नहीं करने योग्य कार्य में रुचि दिखाता है। प्रभु महावीर ने समस्त दुःखों का मूल कारण प्रमाद को बताया है। जितने भी कर्मबन्ध होते हैं वे चाहे किसी भी माध्यम से हुए हों किन्तु उनके मूल में प्रमाद है। उच्च कोटि के साधक भी कभी अपरिहार्य कारण से तो कभी अकारण ही प्रमाद का सेवन करके अपनी आत्म-विकास की साधना को अवरुद्ध कर लेता है। प्रमाद तो एक प्रकार से जीते जी मृत्यु है। गणधर गौतम स्वामी जैसे महान् साधक को भी प्रभु महावीर ने प्रमाद-त्याग की बार-बार प्रेरणा देते हुए कहा, मनुष्य का जीवन वृक्ष से टूटे ह...

प्रभू महावीर आमच्या जीभेवर आमच्या जीवनात नाही-प.पू.रमणीकमुनीजी म.सा.

जालना : प्रभू महावीर आज प्रत्येकाच्या जीभेवर आहेत. परंतू ते आमच्या जीवनात आहेतच, असे नाही म्हणूनच म्हटले आहे की, भगवान महावीर हे आमच्या जीवनात सुध्दा असायला हवेत, असे वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना सांगितले. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, आत्मा अगर नसती तर दुकान नसती, आणि भगवान परत्माही नसता. आमच्या तुमच्यात आत्मा नसती तर काय झाले असते हे माहित नाही. मात्र आत्मा आहे म्हणून परमात्मा आहे. वीरत्थुई कमालची आहे. मैत्रीभाव असल्याशिवाय जैनत्व नाही. दिगंबर, श्रेश्वांतांबर काहीही नाही. केवळ मैत्रीभाव ठेवावाच लागेल. यथा नाम तथा वो, ...

भाव – आत्म्याची खरी ओळख

प्रवचन – 18.08.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) जैन धर्मात कर्म, आत्मा आणि मोक्ष यांचा अभ्यास करताना एक अत्यंत महत्त्वाचा शब्द वारंवार येतो – तो म्हणजे भाव. ‘भाव’ म्हणजे केवळ भावना किंवा मन:स्थिती नव्हे, तर आपल्या अंतर्मनाचा प्रवाह, आपली अंतःप्रवृत्ती आणि आपल्या आत्म्याची दिशा. जैन धर्म सांगतो की, कर्मबंधनाची निर्मिती केवळ आपल्या कृतींनी होत नाही, तर आपल्या कृतीमागील भावनांनी होते. एकच कृती वेगवेगळ्या भावनेतून केली, तर तिचा कर्मपरिणाम वेगळा होतो. एखाद्याला मदत केल्यावर अहंकाराने “मीच त्याला वाचवलं” अशी भावना आली, तर त्यात अहंकारबंधन तयार होतं, त्याच मदतीत करुणा आणि निःस्वार्थ भाव असेल, तर पुण्यबंधन होतं. भावांचे २ प्रकार • शुभ भाव: मैत्री, करुणा, क्षमा, दान, संयम, नम्रता यांसारख्या सद्गुणी भावना. • अशुभ भाव: क्रोध, अहंकार, लोभ, मत्सर, ईर्ष...

प्रभावशाली व्यक्तित्व की धनी थी महासतीजी श्री दर्शन प्रभा जी: डॉ वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म. सा. ने दक्षिण सिंहनी शासन प्रभाविका श्रमण संघीय उप प्रवर्तिनी परम विदुषी महासतीजी डॉ. श्री दर्शन प्रभा जी म सा के सोमवार को बैंगलोर में संथारे सहित देवलोक गमन हो जाने पर अपने भाव पुष्प अर्पित करते हुए कहा कि आप संयम प्रिया, स्पष्ट वक्ता, सरलमना और बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी महाश्रमणी साध्वी रत्ना थी। आपके जीवन में हमेशा ही मन्द मन्द मुस्कान नजर आती रहती थी। तप संयम में अनुरक्त सरल प्रकृति भाव वाली, तथा परिषहो को समभाव पूर्वक सहन करने वाली साधक आत्मा के सुगति प्राप्त होना सरल है। आप ज्ञान, दर्शन, और चारित्र साधना का अनूठा त्रिवेणी संगम थी। हमें भी कई बार आपके दर्शन, मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आपके सदैव वात्सल्यपूर्ण व्यवहार और जिनशासन की महती प्रभावना करने और श्रमण संघ संगठन को और मज...

शुभ कार्यो के रोकने में भी बाधक अन्तराय कर्म: साध्वी संबोधि

आत्मा में अनन्त शक्ति है। इस अनन्तशक्ति को प्रकट करने के लिए जो शक्ति चाहिए उसमें बाधा डालने वाला अन्तराय कर्म है। बहुत मेहनत के बावजूद भी अभीष्ट वस्तु का लाभ या अनुकूलता न मिल पाना, सम्पत्ति या सामग्री की प्रचुरता होने पर भी उपलब्ध सामग्री का उपयोग न कर पाना, दान देने का उत्साह जागृत न हो पाना और स्वयं को उत्साह हीन या असमर्थ महसूस करना इसी कर्म का प्रभाव है। जैसे राजा के आदेश देने पर भी भण्डारी धन प्रदान करने में आनाकानी करता है उसी प्रकार अन्तराय कर्म दान, लाभ, भोग-उपभोग की इच्छा पूर्ति में रुकावट डालता है तथा तप, संयम, त्याग की क्षमता को कुण्ठित कर देता है। अन्तराय कर्म के प्रभाव से प्राप्त वस्तुएं नष्ट या गायब होती हैं और हाथ में आई बाजी भी बिगड़ जाती है। भविष्य में प्राप्त होने वाले प्रत्येक प्रकार के लाभ में विघ्न पैदा करना इस कर्म का कार्य है। शक्ति होने पर भी जो परोपकार के कार्य न...

ह्या मनाला मारुन आपण पुढे कसे जाणार-प.पू.रमणीकमुनीजी म.सा.

जालना : जीवनात ह्या काही करायचे म्हटले तर मनाला मारुन कसे जमेल, त्यासाठी ह्या काहीही करा परंतू ह्या मनाला कधीही मारण्याचा प्रयत्न करु नका, असे वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना सांगितले. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, जीवनात आपल्या जर का पुढे जायचे असेल तर ह्या मनाला मारुन कसे चालेल. म्हणूनच म्हणतो की, ह्या जीवनाला काही रंग – रुप द्यायचे असेल आणि ते पुढे जावे असे वाटत असेल तर ह्या मनाला मारु नका. परमात्म्याला जोडायचे असेल तर मनाला मारुन कसे चाललेल. ह्या आत्मामुळेच सर्व काहीही आहे. असा विचार करा. आत्म्यातूनच परमात्मा ही ...

 51 साधकों ने की एकदिवसीय साधुसम साधना 

साधक साधना शिविर का हुआ आयोजन किलपॉक, चेन्नई : भारतीय संस्कृति के उत्थान में सन्त महात्माओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वर्तमान युग में इस संत संस्कृति संवर्धन के सोद्देश्य भिक्षु निलयम,किलपाॅक में मुनि मोहजीतकुमार ठाणा 3 के सान्निध्य में तेरापंथ युवक परिषद के तत्वावधान में किशोर मंडल, किलपॉक के द्वारा एकदिवसीय साधक साधना का विशिष्ट उपक्रम चला। जिसमें 51 सदस्यों ने भाग लेकर अपने आप को साधुचर्या से सम्बद्ध किया।  प्रातःकाल सूर्योदय के साथ ही मुनि मोहजीतकुमार ने सभी साधको को साधना की उपसम्पदाओं से संकल्पित करवाया। सभी साधक मुनि वेशभूषा में रहे। साधक संरक्षक श्री ताराचंद बरलोटा ने संभागी साधकों को रजोहरण प्रदान किया। मुनि जयेशकुमार ने भगवान महावीर द्वारा उल्लेखित साधुचर्या की तरह सभी साधकों को पूर्ण जागरूकता के साथ पूरा दिन बिताने की प्रेरणा दी। उसके पश्चात उन्होंने 10 साधक लीडरों की नियुक्त...

हर एक आत्मा में परमात्मा का निवास है : श्री वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधी नगर बंगलौर में चातुर्मास हेतु विराजमान दक्षिण सूरज ओजस्वी प्रवचनकार डॉ. श्री वरुण मुनि जी महाराज ने प्रवचन करते हुए कहा कि दीन, दुखी और पीड़ित प्राणियों की अनदेखी करना साक्षात धर्म और परमात्मा का अपमान करने के समान है। हर एक आत्मा में परमात्मा का निवास माना गया है। उसकी सेवा में समर्पित होना चार धामों की यात्रा करने के बराबर है। हर एक धार्मिक स्थान सेवा का केंद्र बने। उन्होंने कहा कि अहिंसा, दया और तपस्या सभी धर्मों से श्रेष्ठ धर्म है, सेवा धर्म सबसे कठिन है। सभी धर्मों की उपासना पद्धति अलग-अलग हो सकती है, परंतु सेवा को सभी धर्मों ने पहला स्थान दिया है। उन्होंने बताया कि यदि कोई प्राणी तड़प रहा हो और हम मौन दर्शक बने रहें, तो यह मनुष्य को धार्मिकता का पात्र नहीं बनने देता। सेवा और सहयोग धर्म के दो स्तंभ हैं। इनके बिना धर्म अधूरा है। उन्होंने कहा कि धर्म कोई भी हो...

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