*अंतिम क्रमांक!* *क्रमांक — 478* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹निर्जरा के पश्चात् कर्म का स्वरूप* *👉 यह एक स्वाभाविक प्रश्न है कि निर्जरा के पश्चात् ये कर्म चतुःस्पर्शी ही रहते हैं अथवा अष्टस्पर्शी भी हो सकते हैं? उत्तरस्वरूप निर्जरण के पश्चात् ये साधारण पुद्गल के रूप में भी रह सकते हैं और चतुःस्पर्शी रह कर भाषा, मन आदि में भी प्रयुक्त हो सकते हैं। आहारक, वैक्रिय, तैजस आदि अष्टस्पर्शी पुद्...
*क्रमांक — 477* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹गृहीत कर्म पुद्गलों का परिणामों के कारण द्विस्वभावता* *👉 ग्रहण से पूर्व तक कर्मपुद्गल शुभ अथवा अशुभ के विशेषण से विशिष्ट नहीं होते हैं। जीव उन कर्म पुद्गलों को ग्रहण करते समय ही अपने परिणाम और आश्रय की भिन्नता के कारण शीघ्र शुभ और अशुभ रूप में परिणत कर देता है। उदाहरण स्वरूप एक ही आहार धेनु (गाय) के शरीर में दूध के रूप में और सर्प के शरीर में व...