Author: saadhak

कषायों से मुक्त हुए बिना नहीं हो सकता जीवन का कल्याण- इन्दुप्रभाजी म.सा.

एक पाप समाप्त कर सकता हमारे जीवन के सारे सुख-दर्शनप्रभाजी म.सा. गोड़ादरा स्थित महावीर भवन में चातुर्मासिक प्रवचन Sagevaani.com /सूरत। हमे दूसरों की निंदा करने की बजाय अपने अंदर झांकना चाहिए ओर निंदा करनी है तो समय की करो। जब तक आत्मा में क्रोध, मान, माया, लोभ जैसे कषाय रहेंगे तब तक उसका कल्याण नहीं हो सकता है। कषायमुक्त होने पर ही आत्मकल्याण की राह खुलेगी। धर्म की शरण लेने ओर जिनवाणी सुनने से कषाय ...

निर्जरा के पश्चात् कर्म का स्वरूप

*अंतिम क्रमांक!* *क्रमांक — 478* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹निर्जरा के पश्चात् कर्म का स्वरूप* *👉 यह एक स्वाभाविक प्रश्न है कि निर्जरा के पश्चात् ये कर्म चतुःस्पर्शी ही रहते हैं अथवा अष्टस्पर्शी भी हो सकते हैं? उत्तरस्वरूप निर्जरण के पश्चात् ये साधारण पुद्गल के रूप में भी रह सकते हैं और चतुःस्पर्शी रह कर भाषा, मन आदि में भी प्रयुक्त हो सकते हैं। आहारक, वैक्रिय, तैजस आदि अष्टस्पर्शी पुद्...

शांति का स्थान सिर्फ धर्मस्थानक है

जिनेश्वर देव जिनका वात्सल्य एक एक माता जैसा होता है, इसलिए उनको जगत माता कहा जाता हैl भगवान का उपकार भी अनंत है, आज जगत में तीन जनों के उपकार हैl माता-पिता मालिक सद्गुरु माता-पिता के उपकार हम चुका नहीं सकते पर शुभ कार्य में निमित्त बन सकते हैं। उनका धर्म के सम्मुख ले जा सकते हैं उनके हाथों से सात कार्य कर सकते हैं। यही अवसर उपकार चुकाने का माता-पिता के उपकार इस भौतिक है तीर्थंकर का उपकार अनंत अनंत...

इच्छाओं का निरोध करना ही तप का परिपालन है: साध्वी चन्दन बाला

वीरपत्ता की पावन भूमि आमेट मे किया तपस्या का स्वागत  लक्ष्य संचेती ने 8 के प्रत्यक्षण लिए एवं कैलाश खाब्या की सुपुत्री डॉक्टर निधि खाब्या के 9 के उपवास के प्रत्यक्षण लिए । इस अवसर पर आमेट श्री संघ, चंदनबाला महिला मंडल ने व युवा मंडल ने दोनो तपस्वी का शाल-माला से स्वागत सत्कार किया । तपस्या के स्वागत मे साध्वी चन्दन बाला ने कहा कि इच्छाओं का निरोध करना ही तप का परिपालन है। जिस प्रकार आकाश अनंत और व...

जीवन को उन्नत व आध्यात्मिक बनाने का मार्ग तप त्याग- इन्दुप्रभाजी म.सा.

दान देने का अवसर उनको ही मिलता जो सौभाग्यशाली होते है-दर्शनप्रभाजी म.सा. गोड़ादरा स्थित महावीर भवन में चातुर्मासिक प्रवचन Sagevaani.com /सूरत,। तप त्याग करके हम अपने जीवन को उन्नत व आध्यात्मिक बना सकते है। तप शरीर को तपाने के साथ आत्मा को भी पावन बनाता है। तप करने से आत्मा निखरती है। तप करने की भावना कई लोगों के मन में लेकिन सभी कर नहीं पाते है। जो तपस्वी करते है उनकी अनुमोदना करके भी हम पुण्य प्रा...

तप आत्मा, शरीर, मन और बुद्धि को बनाता मंगल: साध्वी डॉ गवेषणाश्री

Sagevaani.com /माधावरम्: तपोभिनन्दन समारोह में तपस्वियों के साथ धर्मपरिषद् को सम्बोधित करते हुए साध्वी श्री डॉ गवेषणाश्री जी ने कहा कि तप मंगल है, टॉनिक है, शक्ति है। तप आत्मा, शरीर, मन और बुद्धि चारों को मंगल बनाता है। भगवान महावीर से प्रश्न पूछा गया- तवेणं भंते! जीवे किं जणयइ?- भंते! तप से जीव क्या प्राप्त करता है? भगवान ने कहा- ‘तवेणं, वोदाणं जणयइ’- तप से वह व्यवदान को प्राप्त करता ...

स्विकारभाव में सुख है- साध्वी जिनाज्ञा श्रीजी।

स्विकारभाव में सुख है- साध्वी जिनाज्ञा श्रीजी। आकुर्डी स्थानक भवन मे आज “पुच्छिसुणं” अनुष्ठान के दुसरी गाथा का जाप हुआ! “ कहं च णाणं कहं दंसणं से,सीलं कहं नायसुयस्स आसि। जाणासि क्षण भिक्खु जहातहेणं,अहासुयं बुहि जहां णिसंतं! “। जिनाज्ञा श्री जी ने लिखनेवाले पेन्सील के पॉंच उपयुक्त गुणोकी तुलना जीवन में सुख पानेके सिध्दांतोसे की! आज सौ. ममता विनोदजी रुंगलेचा जैन की 11 उपवासकी पचछकावणी हुई! येरवडा जै...

जो अज्ञान से पीड़ित है वही दुखी हैं

*☀️प्रवचन वैभव☀️* 🌧️ 5️⃣3️⃣ 🪔 261) समकिती सुख में भी धर्म दुःख में भी धर्म करता हैं.! 262) देह परिवर्तन के पूर्व कर्तृत्व भाव की भ्रांति को तोड़ना होगा.! 263) जो अज्ञान से पीड़ित है वही दुखी हैं.! 264) इन्द्रियों की शक्ति का उपयोग साधना के लिए करेंगे तो संसार से तीर जाएंगे…. भोग के लिए करेंगे तो डूब जायेंगे.! 265) प्रायश्चित भाव से भव्यता का प्रारंभ होता हैं.! 🌧️ *प्रवचन प्रवाहक:* *युग प्रभा...

सुख जगत में कोई नहीं

*🌧️विंशत्यधिकं शतम्* *📚📚📚श्रुतप्रसादम्🌧️* 🌧️ 5️⃣2️⃣ 🪷 जो साधक समर्पण भाव से जिनेश्वर की शरण में रहता है, जिनाज्ञा के आधीन रहता हैं, जगत की कोई दीनता, उदासी उसको छू नही सकती.! ⚪ मोक्ष न मिले तब तक प्रभु शरण से उत्कृष्ट सुख जगत में कोई नहीं.! ⚪ प्रभु स्मरण से भावित सन्मति हो तो नरक भी सद् गति है.! ⚪ कोई भी क्रिया जिनाज्ञा अनुसार हो तो ही हितकारी बनती हैं.! ⚪ जिनाज्ञा से, विपरित किया हुआ लाखो करोड़ों...

गृहीत कर्म पुद्गलों का परिणामों के कारण द्विस्वभावता

*क्रमांक — 477* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹गृहीत कर्म पुद्गलों का परिणामों के कारण द्विस्वभावता* *👉 ग्रहण से पूर्व तक कर्मपुद्गल शुभ अथवा अशुभ के विशेषण से विशिष्ट नहीं होते हैं। जीव उन कर्म पुद्गलों को ग्रहण करते समय ही अपने परिणाम और आश्रय की भिन्नता के कारण शीघ्र शुभ और अशुभ रूप में परिणत कर देता है। उदाहरण स्वरूप एक ही आहार धेनु (गाय) के शरीर में दूध के रूप में और सर्प के शरीर में व...

भीतर के भाव शुद्धि पर जीवन का लक्ष्य पूर्ण हो जाएगा: इन्दुप्रभाजी म.सा.

अपने निंदक स्वयं बने ओर आत्मा की सफाई करते रहे-दर्शनप्रभाजी म.सा. गोड़ादरा स्थित महावीर भवन में चातुर्मासिक प्रवचन Sagevaani.com /सूरत। जीवन में जो समय बीत चुका वह लौट कर नहीं आता। इसलिए बीते हुए का पछतावा करने से अधिक ध्यान जो समय आने वाला है उसे कल्याणकारी कैसे बना सकते इस पर देना चाहिए। धर्म ध्यान के माध्यम से हम अपने को निर्मल व पावन बना सकते है। हमे आत्मा की खोज बाहरी दुनिया में अपने भीतर करनी...

पाप कर्म का बंध नहीं हो सकता

पाप कर्म का बंध नहीं हो सकता! पापोका अंत करना है तो शुभ कर्मोका भुगतान करना पड़ेगा!- साध्वी जिनाज्ञा श्री जी आकुर्डी स्थानक भवनमे आजसे 29 दिवसीय “पुच्छिसुणं “ जाप का अणुष्ठान प्रारंभ हुआ! डॉ. मेघाश्री जी ने नवकार महामंत्र एवं लोग्गस्स मंत्र कह इस अणुष्ठान का प्रारंभ किया ! हर रोज़ एक पद से प्रारंभ कर अगले पदोका उच्चारण कर यह अणुष्ठान 29 दिन चलेंगा! आज नेहा खिरोदिया ने 11 उपवास के प्रत्याख्यान किये...

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