पर्युषण पर्व के सप्तम दिवस के उपलक्ष्य मे जैन संत डाक्टर राजेन्द्र मुनि जी ने शरीर वादी न बनकर आत्मवादी बनने का सन्देश दिया, हमारे जीवन का अधिकांश समय शारीरिक व्यवस्था व भविष्य को सुरक्षित रखने मे व्यतीत होता रहता है! मुलत : मानव मन भयशील रहता है भय निवारण के लिए घर परिवार मित्र समाज खड़ा करके अपने को अभयी मानता है मगर मृत्यु के भय को वह कभी भी नहीं जीत पाता, भगवान महावीर ने संसार को भय मुलक एवं आत्मा को अभयमूलक माना है! आत्म सिद्धांत को हम जब तक जीवन मे आत्मसात नहीं कर पाते शरीर सम्बन्धित यह भय कभी भी समाप्त नहीं हो पाएगा मुनि जी ने महावीर कालीन घटना का उल्लेख करते हुए राजा परदेसी का वर्णन सुनाया।

एक समय अनात्म वादी होने से नाना प्रकार के पापकारी कृत्य कर कर के वह खुशियाँ मनाता था किन्तु जब आचार्य केशी कुमार जी के सत्संग मे आया उसका अज्ञान अंधकार दूर हो गया एवं वह आत्मवादी बनकर पूर्णतः सदाचारी सत कर्मी बना एकांत मे मौन ध्यान जप तप मे लीन रहने लगा। परिजनों को यह अनुचित लगा अंततः उसी की रानी के हाथों से उसे जहर दे दिया गया!
अंतिम समय वह समता भाव से समाधि मरण को प्राप्त कर आत्म कल्याणी बना! आत्म वादी पाप से डरता है आत्मवादी पुण्य परोपकारी होता है आत्मवादी शाकाहारी जीवदया प्रेमी होता है! सभा मे साहित्यकार श्री सुरेन्द्र मुनि जी द्वारा उन महान आत्माओं का वर्णन किया गया जो संसार के समस्त मोह माया राग द्वेष का परित्याग कर के मोक्षमार्ग को उपलब्ध होते ऐसी आत्माये कर्मों का अन्त करती है अत : आगम का नाम अंतकृत कथा रखा गया!महामंत्री उमेश जैन ने स्वागत सूचनाएं प्रदान की