किलपाॅक में विराजित आचार्य तीर्थ भद्रसूरिश्वर ने कहा परमात्मा जगत गुरु व जगत बंधु है। जो सुख व दुख व सुख में साथ में रहे वह बंधु है। हमारे दुखों की चिंता परमात्मा करते हैं। वे जीव मात्र के हितैषी है। परमात्मा ने हमें साधना का मार्ग बताया, पंच महाव्रत बताए, तत्वों का बोध दिया ताकि हम पापों से दूर रह सकें। उन्होंने कहा सुख में साथ देने वाले बहुत मिलेंगे लेकिन दुख व आपत्ति में साथ देने वाले परमात्मा ही हैं।
परमात्मा जगत के, जीवमात्र के जगत बंधु हैं। वे सुपर से ऊपर पाॅवर है। जिसका इस सुपर पाॅवर से कनेक्शन हो गया, उसके साथ स्वामी सेवक का रिश्ता बन जाता है। यदि आप स्वामी के रुप में उनको स्वीकार करेंगे तो स्वामी सेवक की चिंता करेंगे लेकिन सेवक बनने की तैयारी होनी चाहिए। जो अपना अहंकार छोड़ने के लिए तैयार नहीं है वह सेवक नहीं बन सकता।
जम्बू स्वामी के जीवन चारित्र के बारे में उन्होंने बताया कि प्रभव को प्रतिबोधित करते हुए उनके एक एक शब्द में वैराग्य निकल रहा है। नहीं तो पांच सौ चोरों का सरदार प्रभव उनसे इतना प्रभावित नहीं हुआ होता। शादी की पहली रात जम्बू कुमार आठ सुन्दर पत्नियों के साथ बैठे अपनी उनके प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं।
उनकी प्रथम पत्नी समुद्रश्री पूछती है आप हमारा त्याग कर चारित्र ग्रहण करने की बात कर रहे हैं, गहनता से सोच समझकर निर्णय लीजिए, इतनी जल्दबाजी करना उचित नहीं होगा, आपको कहीं बाद में पछताना न पड़े। आठों पत्नियों के तर्क सुनकर जम्बू कुमार ने जबाब दिया उनका वैराग्य व चारित्र ग्रहण करने का निर्णय अटल है।
आचार्य ने कहा शास्त्रों में तीन प्रकार के वैराग्य है दुख गर्भित, मोह गर्भित और ज्ञान गर्भित वैराग्य। दुख गर्भित वैराग्य यानी दुखों से छुटकारा पाने के लिए जो वैराग्य आता है। जो जीवन में दुखों से कंटाल जाते है व दीक्षा लेते हैं। मोह गर्भित वैराग्य यानी परलोक में स्वर्ग समान सुख की प्राप्ति व मान सम्मान पाने की इच्छा से चारित्र ग्रहण करे। ज्ञान गर्भित वैराग्य वह है जो कर्मों से बंधी आत्मा संसार में कदम कदम पर नए पाप व कर्म बंध करने से बचने के लिए चारित्र अंगीकार करना है।
आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्राप्त करने और कर्मों की निर्जरा की भावना से आया वैराग्य ज्ञान गर्भित वैराग्य है। शास्त्रकारों ने उदारता रखते हुए ऐसा भी नहीं कहा है कि दुख या मोह के कारण दीक्षा नहीं लेनी चाहिए। उन्हें शास्त्राभ्यास कराना चाहिए ताकि मन के भाव बदल जाए। जब संसार के स्वरूप का पता चल जाएगा तो ज्ञान गर्भित किस तरह बनाया जाए, यह कला गुरु को दिखानी चाहिए।
जम्बू कुमार की पत्नियों ने सोचा यह हमारे वश की बात नहीं है कि जम्बू कुमार को बैरागी बनाएं। उन्होंने भी जम्बू कुमार को आप जीते हम हारे कहकर उनका अनुसरण करने का निश्चय किया। प्रवचन के दौरान कोयम्बतूर के पांच मुमुक्ष चिंतन जैन, आदित्य जैन, कलश जैन, महिमा बागरेचा व मीना बागरेचा आचार्य का आशीर्वाद लेने पहुंचे। आचार्य ने उनके चारित्र जीवन की उज्जवलता की कामना करते हुए कहा चारित्र लेना आसान है पर पालन करना कठिन है।
चारित्र लेने का उद्देश्य केवल आत्म कल्याण व जगत के जीवों का कल्याण होना चाहिए। मोक्ष मार्ग के लक्ष्य को लेकर चारित्र जीवन जीना है। सब जीवों के प्रति मैत्री, दुखियों के प्रति करुणा व ज्ञानियों के प्रति बहुमान होगा तो यह चारित्र मार्ग तारने वाला है। परमात्मा की आज्ञा को समझकर शास्त्रों का ज्ञान जरूरी है, द्रव्य, काल, क्षैत्र को समझना पड़ेगा।
मुमुक्ष चिंतन ने भी अपने भाव प्रकट करते हुए कहा जितनी खुशी हमें देने में मिलती है उतनी लेने में नहीं। पांचों मुमुक्ष आगामी 1 फरवरी को आचार्य विजय तपोरत्न सूरिश्वरजी व साध्वी नित्यानंदाश्री जी की निश्रा में सूरत, गुजरात में दीक्षा अंगीकार करेंगे जहां एक साथ पचास दीक्षाएं होगी। किलपाॅक जैन संघ की ओर से मुमुक्षुओं का तिलक, माला व श्रीफल से सम्मान किया गया।