Sagevaani.com /चेन्नई. बिन्नी नोर्थटाउन के श्री सुमतिवल्लभ जैन मूर्तिपूजक संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि साधना में दो बातें मुख्य हैं स्वार्थ और अहंकार का त्याग। जगत के लौकिक व्यवहार चाहिए तो यह भी स्वार्थ के त्याग से मिल जाएगा। थोड़ा त्यागने से ज्यादा मिलता है। किसान इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। वह फसल के लिए खेत में बीज डालता है।
फसल खराब हो जाए, उसे फिर से खेत में बीज बोना पड़ता है। इस प्रकार वह पहले त्याग करता है, उसके बाद ही कई गुना पाता है। किसी के साथ आप अपना स्वार्थ छोड़कर व्यवहार करेंगे तो वह उत्तम है। दुश्मन के साथ भी अगर आप स्वार्थ त्याग कर व्यवहार कर सकें तो भी आपको कुछ घाटा नहीं होगा। उसके मन में भी आपकी कीमत बढ़ जाएगी। स्वार्थ त्याग में सब तरह से लाभ ही है। त्याग से आप सबको अपना बना सकते हैं। इसी तरह से आप भी अगर पहले थोड़े सुख का त्याग करोगे तो उसके बदले में आपके सामने सुख का ढेर लग जाएगा।
उसी तरह त्याग के फल का भी त्याग कर देने से उसका फल अनंत गुना हो जाता है और ऐसा करते-करते अंत में जीव जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। हमें तो त्याग की महिमा को जान लेना चाहिए। त्याग करते ही रहो ऐसा करते-करते यदि आपके शरीर का बलिदान देना पड़े तो उसमें भी आपका कल्याण ही है। निराश कभी न होना, निराशा में हानि है। ये सब बातें मात्र सुनने की नहीं, सीखने की भी हैं, जीवन में धारण करने की हैं। जब तक ये आचरण में नहीं आएंगी तब तक कार्य की सिद्धि होगी ही नहीं। समय व्यतीत हो रहा है। मालूम नहीं कि हम काल के पंजे में कब आ जाएं। मनुष्य जीव का मुख्य लक्ष्य परमात्मा प्राप्ति है, यह सदैव स्मरण रखें।