“सोच मैं मोच आती हैं तब रिश्तों मे खरोंच आती हैं – मुनि अर्हत् कुमार ” समझपुर्वक बनाया गया समूह ही समाज कहलाता हैं। जिसकी सबसे छोटी इकाई परिवार है। परिवार सामंजस्य की एक प्रयोग शाला हैं। परिवार की एकता के लिए आवश्यक है एक दूसरो के प्रती स्नेह , समर्पण और सामंजस्य का भाव। जिस परिवार मै बड़ों के प्रति सम्मान और छोटो के प्रति वात्सल्य का व्यवहार होता है। वह परिवार साक्षात स्वर्ग हैं। यह सुविचार मुनि श्री अर्हत् कुमारजी नै ‘ टूटते परिवार बिखरते परिवार ‘ की वर्कशॉप पर व्यक्त किए, उन्होंने आगे कहा – बौद्धिक युग मैं शिक्षा का जितना विकास हो रहा है उतना ही मूल्यों का हास भी हो रहा है। यह एक ज्वलंत समस्या हैं। परिवार टूट रहे हैं और रिश्तों मै दरार पड़ रही हैं। घर टूटता हैं तो दिवारे टूटती हैं लेकिन जब आदमी टूटता हैं तो साहस, शक्ति, घैर्य, संकल्प व विश्वास सब कुछ टूट जाता हैं।
आज घर तो बड़े हो गए पर दिल छोटे हो गए हैं। हमें रिश्तों की कदर करनी चाहिए जिससे रिश्तों की डोर कमजोर ना हो सके। आपस मैं स्नेह दीप जलता रहे, सामंजस्य के सूत्र मैं बंधा हुआ परिवार कभी टूट नहीं सकता । एक दूसरे की भावनाओ का सम्मान करे जिससे परिवार मैं खुशहली का वातावरण बना रहे। सहयोगी संत मुनि भरत कुमारजी ने चित् परिचित लहेजे में कहा -विश्वास ही जीवन विकास का द्वार हैं।
विश्वास से ही होती मंजिलपार हैं। घर- परिवार को जोड़ने का सुंदरतम सूत्र हैं यह, विश्वास ही जीवन का बनता श्रुंगार।।
विश्वास जमने पर उसको मिला प्यार।
बालसंत जयदीप कुमारजी ने कहा- रिश्तों की अहमियत समझे क्यौकि रिश्तें मुकदर से मिलते हैं।
मंगलाचरन सूरत से सीमा और नीलम परमार ने किया। सभा अध्यक्ष जयंतीलालजी जीरावला ने सभी का स्वागत किया। कन्या मंडल ने सुंदर प्रस्तुती दी। महिला मंडल ने रोचक नाटक प्रस्तुत कर जनमानस को भावविभोर कर दिया। आभार ज्ञापन स्थानकवासी समाज के अध्यक्ष नेमिचंदजी बाफना ने किया। कार्यक्रम का संचालन सभा मंत्रि धीरज दुगड़ ने किया।






