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साध्बी नूतन प्रभा श्रीजी ने बताया हिन्दु धर्म के 18 पुराणों और जैन धर्म के 32 आगमों का साथ

साध्बी नूतन प्रभा श्रीजी ने बताया हिन्दु धर्म के 18 पुराणों और जैन धर्म के 32 आगमों का साथ

बताया पाप क्या है और पुण्य क्या है, समझाया शुद्ध भावों से अनासक्त भाव से करें कर्म

Sagevaani.com @शिवपुरी। संसार के सभी धर्म हमें अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देते है। कोई भी धर्म पाप करने और किसी को सताने का संदेश नहीं देता है। हिन्दु धर्म के 32 पुराणों का सार जब मर्हिषि व्यास से पूछा गया तो उन्होंने बताया था कि परोपकार करना पुण्य है और दूसरों को सताना पाप है। हिन्दु धर्म के 32 पुराणों का सार है एक तो अनासक्त भाव से कर्म करें और मन में सभी के प्रति शुद्ध भावना रखें, भाव बिगड गया तो भव बिगड जाता है।

उक्त उदगार प्रसिद्ध जैन साध्बी नूतन प्रभा श्रीजी ने कमला भवन में आयोजित एक विशाल धर्म सभा में व्यक्त किए। धर्म सभा में साध्बी बन्दना श्रीजी ने अपना उदवोधन देते हुए बताया कि संकट के समय हमें धैर्य रखना चाहिए और कभी घुटने नहीं टेकना चाहिए। आज की धर्म सभा में साध्बी रमणीक कुंवर जी ठाणां 5 सतियों के दर्शन और बन्दन करने के लिए सबाई माधोपुर राजस्थान और इन्दरगढ से बडी संख्या में धर्मावलंबी धर्म सभा में पहुंचे थे।

प्रारंभ में साध्बी जयश्रीजी ने सुन्दर भजन का गायन किया। इसके पश्चात साध्बी नूतन प्रभा श्रीजी ने बताया कि जब तक हमें धर्म का प्रारंभिक ज्ञान नहीं है तब तक शास्त्र पढने की आज्ञा नहीं है। उन्होंने कहा कि धार्मिक व्यक्ति में संवेदना और भावना होनी चाहिए। उसमें दूसरों के दुख को समझने और महसूस करने का ज्ञान होना चाहिए। उसे यह समझना चाहिए कि जिस तरह से मेरी आत्मा है और मुझे दूसरे के सताने से कष्ठ होता है उसी तरह दूसरे को भी कष्ठ होता है और मुझे उसे कष्ठ नहीं देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि 18 पुराणों का सार यहीं है कि हम दूसरे के कल्याण की भावना मन में रखें। ऐसा कोई काम न करें जिससे दूसरों को दुख हो। दूसरे को दुखी करना और सताना पाप है। यह बात सत्य है कि कोई किसी को सुखी नहीं कर सकता और कोई किसी को दुखी नहीं कर सकता। लेकिन हमें अपनी भावना शुद्ध रखनी चाहिए। यदि कोई हमें दुख पहुंचाने का प्रयास करता है तो हमें समझना चाहिए कि कोई मुझे दुख नहीं पहुंचा सकता और यदि मुझे दुख मिल रहा है तो यह मेरे कर्मों का फल है।

यह भावना आते ही सारी शिकायतें दूर हो जाती है। साध्बी जी ने कहा कि उसी तरह से जैन धर्म के 32 आगमों का सार यह है कि हम कर्म बन्धन तोडते चलें। अपनी आत्मा पर किसी कर्म का बोझ न पडने दें । जिस दिन हम कर्म बन्धन से मुक्त हो जायेंगे उसी दिन हमें मोक्ष जाने की पात्रता हासिल हो जायेगी। आगमों का दूसरा सार यह है कि मन में शुद्ध भावना रखें। अंत में उन्होंने कहा कि नीम बोने वालों को कभी आम नहीं मिलते है।

सबाई माधोपुर से पधारे श्राबकों का हुआ सम्मान

धर्म सभा सबाई माधोपुर से पधारी बहनें श्रीमति गीता जैन और श्रीमति मंजू चौधरी ने स्वागत गीत गाकर साध्बियों का सम्मान किया। कन्हैया जैन ने जीवन है उलझन का नाम भजन का गायन किया। इन्दरगढ से पधारे सुमेर जी और राजेश जैन ने अपनी भावना व्यक्त करते हुए जैन साध्बियों से सबाई माधोपुर पधारने की बिनती की। सबाई माधोपुर से पधारे श्राबकों का चार्तुमास कमेंटी ने बहूमान किया।

साध्बी पूनम श्री के साथ नन्हे बालक पियूष ने की तपस्या

सिद्धी तप कर चुकीं साध्बी पूनम श्रीजी का तप फिर से प्रारंभ हो गया है। वह बेले-बेले की तपस्या कर रही है। उनके साथ बहुत से भाई बहन एकासना की तपस्या कर रहें है। लेकिन बालक पियूष कर्नावट साध्बी जी के साथ बेले-बेले की तपस्या कर रहा है। पियूष कर्नावट श्राबक मोती कर्नाबट के सुपुत्र है।

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