जिसके गुण-कर्म-स्वभाव जितने सात्विक और सुरुचिपूर्ण होंगे, उसका जीवन उतना ही प्रसन्न, उतना ही सुंदर होगा। जो अविचारी, व्यभिचारी अथवा अवगुणी है, वह कितना ही धनवान, शान-शौकत वाला, सुंदर शरीर और रहन-सहन वाला क्यों न हो, सुंदर जीवन की परिधि में नहीं आ सकता।
उपरोक्त बातें आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में प्रवचन देते हुए कही, वे आगे बोले कि इसके विपरीत जो सामान्य स्थिति का है, गरीब है, सुंदर शरीर वाला भी नहीं है, परंतु शिष्ट, सभ्य, सुशील, संतुष्ट और शांत है तो वह अधिक सुंदर जीवन वाला कहा जाएगा। जीवन की सफलता का प्रमाण जहां किसी के कार्य और कर्तृत्व से दिया जाता है, वहां उसकी अंतिम श्वास में सन्निहित शांति एवं संतोष की मात्रा भी इसका एक सुंदर प्रमाण है। जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का अपना एक लक्ष्य, एक उद्देश्य होना आवश्यक है। युवा उम्र के इस स्वर्णिम दौर को व्यर्थ न जाने दें। अपने लक्ष्य को महान सामाजिक उद्देश्यों से जोड़ें।
लक्ष्य सबके लिए कल्याणकारी हो । बस फिर यह ध्यान रहे कि तमाम व्यवधानों के बावजूद मंजिल पानी है। समय निकल जाने पर पश्चात्ताप के सिवाय कुछ नहीं बचता है। किसी भी कार्य की सफलता के लिए लगन, निष्ठा, कड़ी मेहनत, दूरदृष्टि, पक्का इरादा और अनुशासन आवश्यक है। जब मनुष्य की सारी शक्तियां विचारों की, समय की, शरीर की, साधन की एक ही लक्ष्य की ओर लग जाती हैं, तो फिर सफलता प्राप्ति में संदेह नहीं रहता। अपनी शक्ति को पहचानें। अपने लक्ष्य को चुनौती के रूप में स्वीकार करें।
संकल्प करें, मैं अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करूंगा, कर सकता हूं। दृढ़ संकल्प के आगे कोई विघ्नबाधा, कठिनाई टिक नहीं सकती। अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सदा जूझते रहो, जूझते रहो, जूझते रहो, कभी हिम्मत न हारो। सच्ची लगन और निरंतर प्रयत्न यही दो महान साधनाएं हैं, जिनसे शक्ति को प्रसन्न करके उनसे इच्छित वरदान प्राप्त किया जा सकता है।उन्होंने आगे यह भी कहा कि परिश्रम! परिश्रम !! घोर परिश्रम!!! आदत में होना चाहिए। परिश्रमी और अपने कार्य में दिलचस्पी लेने वाले व्यक्ति सोने के समय को छोड़कर अन्य सारे समय लगे रहते हैं और जरा भी नहीं थकते। सच्ची लगन, दिलचस्पी, रुचि और झुकाव एक प्रकार का डायनुमा है, जो काम करने के लिए क्षमता की विद्युत शक्ति हर घड़ी उत्पन्न करता रहता है।