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संसार परिवर्तनशील है: डॉ. श्री रुचिकाश्री जी महाराज

संसार परिवर्तनशील है: डॉ. श्री रुचिकाश्री जी महाराज

श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी बावीस संप्रदाय जैन संघ ट्रस्ट, गणेश बाग श्री संघ के तत्वावधान में एवं शासन गौरव महासाध्वी पूज्या डॉ. श्री रुचिकाश्री जी महाराज, पूज्या श्री पुनितज्योति जी महाराज, पूज्या श्री जिनाज्ञाश्री जी महाराज के पावन सानिध्य में गुरूवार प्रातः दिनांक 9 सितम्बर 2021 को श्री गुरु गणेश जैन स्थानक, गणेश बाग में पर्वाधिराज महापर्व पर्युषण के छठा दिन सूत्र वाचन, प्रवचन एवं धर्माराधना प्रतियोगिताएं, प्रतिक्रमण आयोजित किया गया।

पर्वाधिराज महापर्व पर्युषण के छठा दिन के अवसर पर महासाध्वी पूज्या डॉ. श्री रुचिकाश्री जी महाराज ने अपने विशेष प्रवचन – है रे बुढ़ापा विषय पर फ़रमाया कि संसार परिवर्तनशील है। इसके कण कण में प्रत्येक क्षण परिवर्तन का चक्र चला करता है। आज जो बालक है, कल को वह वृद्ध हो जाता है। वृद्धावस्था में व्यक्ति शारीरिक, मानसिक रूप से कमजोर हो जाता है इच्छाओं की वृद्धि एवं आशाओं का बढ़ाव इस काल में चरम सीमा पर होता है। आज समाज में स्थिति ये है कि माता पिता मिलकर अपनी चार संतानों को पाल सकते हैं, किन्तु चार संतानें मिलकर माता पिता की देखभाल नहीं कर सकतीं। जीवन के अंतिम पड़ाव पर पड़े वृद्धों की सेवा करना भी युवाओं का ही पुनीत कर्तव्य है।

वृद्धजन अपने अनुभव से हमारे साहस और संघर्ष के साथ ही हमारे पुरुषार्थ को बढ़ाते हैं। जीवन की वास्तविक परिस्थितियों का दर्पण दिखाकर हम पर ज्ञान की वर्षा करते हैं। हम में विनम्रता को बीज बोकर यश से सम्मान योग्य बनाते हैं। नित्य बड़ों की सेवा और प्रणाम करने वाले व्यक्ति की आयु, विद्या, यश और बल में निरंतर वृद्धि होती है। उनके सानिध्य को पाकर, जीने का गुरु मंत्र पाओ। साध्वी जी ने कहा की कोई मनुष्य अगर सोचे कि बुढ़ापे में ध्यान करें, साधना करेंगे, यह बहुत ही बड़ी भूल होगी। शेष जीवन की एक एक घड़ी से अधिकाधिक लाभ उठाने की इच्छा रखे। जैसे-जैसे शरीर में बदलाव आता है, वैसे-वैसे ही भावों में बदलाव आते रहना चाहिए। बुढ़ापे में काम की अच्छी चीजों को साथ रखते हुए अनावश्यक चीजों को छोड़ना भी सिखना चाहिए, अनावश्यक आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। जो ज्ञान और अनुभव संचित कर लिया जायेगा वह अगले जन्म में काम देगा ऐसा सोच कर मृत्यु की घडी तक ज्ञान संपादन करने, योग्यता बढ़ाने, अनुभव प्राप्त करने, भूलो को सुधार करने, एवं अपने अनुभव से दूसरो को लाभ पहुंचाने का प्रयत्न निरंतर जारी रखना चाहिए। यदि ऐसा प्रयत्न वृद्ध लोग करते रहे तो बूढ़ा होना दुःख की बात न रहकर गौरव की बात होगी।

साध्वीजी ने प्रेरणा दी कि समय से पहले अपने आप को बदल ले, नकारात्मक सोच न रखें और सेवा लेने का तरीका सीख ले तो वृद्धावस्था वरदान बन जाती हैं। 60 की आयु छूते छूते अपने खाने-पीने की आदतों पर संयम रखें; अपने प्रवृत्तियों में संयम रखें और अपना अधिकतर समय धर्म ध्यान में दें। जैन जीवन शैली के सुत्रों को अपनाकर स्वतंत्र रूप में आत्मा में रमण करे। संतुलित जीवन जीते हुए परम लक्ष्य मोक्ष जाने की भावना रखकर अपने जीवन के अन्तिम समय को सार्थक करे।

साध्वी श्री जिनाज्ञाश्री जी महाराज ने श्री अंतकृतदशांग सूत्र का वाचन किया। आपश्री अपने मंगलवाणी में फ़रमाया कि जिंदगी भर जो तुमने पाप करके कमाया उसे छोड़कर यहीं चले जाओगे, लेकिन उसे दान धर्म में लगाएंगे तो वह तुम्हारे साथ जाने वाला होगा, वह तुम्हारे काम आएगा। ऐसा प्रयास करो, धर्म करो, संयम-साधना करो, साधु -संतो के साथ जुड़ जाओ। तुम्हारा बेड़ा पार हो जाएगा, जीवन का उद्धार हो जाएगा। साध्वी श्री पुनितज्योति जी महाराज ने कल्पसूत्र वाचन किया।

धर्म सभा का संचालन करते हुए गणेश बाग श्री संघ के सदस्य सुनील सांखला जैन ने बताया कि शुक्रवार को संस्कारों का शंखनाद एवं शनिवार को सरोवर चलके क्षमा का – विषय पर साध्वी वर्या द्वारा विशेष प्रवचन रहेगा। सांखला ने बताया कि सांवत्सरिक महापर्व शनिवार दिनांक 11 सितम्बर को है जिसमे सूत्र वाचन, प्रवचन, पौषद, प्रतिक्रमण एवं दिन भर धर्माराधना के कार्यक्रम होगा। श्री संघ का सामूहिक क्षमापना रविवार दिनांक 12 सितम्बर को प्रातः: 8 बजे गणेश बाग में होगा। इसी दिन सभी तपस्वियों के अभिनन्दन एवं पारणे की व्यवस्था श्री संघ की और से गणेश बाग में रहेगी।

प्रवचन के पश्चात धार्मिक अंताक्षरी आयोजित किया गया और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया एवं विजेताओं को श्री संघ की और से पुरुस्कृत किया गया। महापर्व पर्युषण छठा दिन के अवसर पर गणेश बाग में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। धर्म सभा का संचालन एवं स्वागत गणेश बाग श्री संघ सदस्य सुनील सांखला जैन ने किया। डॉ. श्री रुचिकाश्री जी महाराज ने मंगलपाठ फ़रमाया ।

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