साहुकारपेट, चेन्नई ; जन्म से अनुयायी हो सकते हैं, पर व्रत स्वीकार किए बिना श्रावकपन प्राप्त नहीं किया जा सकता। श्रावकत्व व्रतचेतना से जुडी स्थिति है। यह यात्रा आगे बढ़ती-बढ़ती साधुत्व और अयोग तक पहुंचते-पहुंचते मोक्ष का वरण करती है। उपरोक्त विचार अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद् के तत्वावधान एवं तेरापंथ युवक परिषद चैन्नई की आयोजना में तेरापंथ सभा भवन, साहुकारपेट, चेन्नई में बारह व्रत कार्यशाला में साध्वीश्री डॉ मंगलप्रज्ञाजी ने कहें।
संसार परिभ्रमण रोकने का माध्यम है- सम्यकदर्शन
श्रावक समाज को सम्बोधित करते हुए साध्वीश्री डॉ मंगलप्रज्ञाजी ने कहा सम्यक दर्शन प्राप्ति से प्रकाश की यात्रा प्रारंभ होती है। संसार परिभ्रमण रोकने का माध्यम है- सम्यकदर्शन। अध्यात्म यात्रा का प्रथम पड़ाव सम्यक दृष्टिकोण है। व्यवहार जगत में पहला पड़ाव यानि सम्यक दर्शन अनिवार्य है। वह यात्रा व्रत चेतना से जुड़ती है तो श्रावकपन प्राप्त होता है। श्रावकत्व की प्राप्ति जन्म से नहीं, पुरुषार्थ से होती है। भगवान महावीर ने आगार और अणगार दो रूप में धर्म की व्याख्या की। इन दोनों धर्मो के आधार पर ही साधु-साध्वी, श्रावक और श्राविका रूप चतुविध धर्म का निर्धारण हुआ है। जीवन में संयम का वैभव महत्त्वपूर्ण होता है।
साध्वी श्री जी ने बारह व्रतों की विशद् व्याख्या करते श्रावकों को बारह व्रत की विशिष्ट साधना करनी चाहिए। इच्छाओं का निरोध करना चाहिए। अव्रत का जितना जितना सीमाकरण होता है, संयम की भावना पुष्ट होती है, जिससे अनावश्यक हिंसादि प्रवृतियों से बचा जा सकता है।
श्रावक-जीवन का सबसे बड़ा धन है – बारह व्रत
साध्वी श्री जी ने सम्पूर्ण परिषद को बारहव्रतीं बनने की प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि श्रावक अपनी चर्चा को अच्छी तरह समझे, चिन्तन करे और व्रत के मार्ग पर बढ़ने का संकल्प करें। जैन श्रावक की गरिमा को बढ़ाए। व्रत चेतना की भावना से अपने आपको भावित करें। श्रावक-जीवन का सबसे बड़ा धन है – बारह व्रतों का खजाना। इस खजाने और सुरक्षा कवच की अच्छी तरह संभाल करते रहें। व्रतों की स्वीकार करने में किसी तरह की बाध्यता नहीं है। बारह व्रतों का उपक्रम एक सहज, सरल जीवन की साधना है। *व्रतों को स्वीकार करके अपने जीवन को आनन्दमय बनाएं, प्रकाशमय बनाएं।
तेरापंथ युवक परिषद द्वारा ‘लक्ष्य है ऊंचा हमारा’ संगान से कार्यक्रम का प्रारंभ हुआ। तेयुप के चिन्तनशील उपाध्यक्ष श्री संतोष सेठीया ने स्वागत स्वर प्रस्तुत करते हुए बारह व्रतों को जीवन का अनमोल आभूषण बताया। साध्वीश्री डॉ राजुलप्रभाजी ने कहा त्याग की चेतना जगाना, श्रावक-जीवन की महत्वपूर्ण साधना है। बारह व्रत विवेक जागरण की सशक्त और परिणामी साधना है। सोचना, बोलना और करना, इस तीनों प्रकृतियों के साथ विवेक को जोड़ लेना चाहिए। जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं के साथ संयम की भावना भी बनी रहे। कार्यक्रम का कुशल संचालन करते हुए मंत्री संदीप मुथा ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।
प्रेचक : स्वरूप चन्द दाँती