किलपॉक स्थित एससी शाह भवन में विराजित उपाध्यायश्री युगप्रभविजयजी ने योगशास्त्र की 26वीं गाथा की विवेचना करते हुए कहा कि महाव्रत की पहली भावना मनोवृत्ति बताई गई है। मनोवृत्ति यानी मन पर नियंत्रण रखना। जिनशासन में मात्र द्रव्य हिंसा का नहीं, भाव हिंसा का अधिक महत्व है। भाव हिंसा के माध्यम से द्रव्य हिंसा नहीं होने पर भी 7वीं नरक में जाना पड़ता है। मन के ऊपर नियंत्रण नहीं है तो भाव हिंसा लगती है। हिंसा का पाप तीन तरह से बताया है करण, करावण और अनुमोदन। अनुमोदना मन के माध्यम से होती है। कार्य करने वाले ने आरंभ सारंभ नहीं किया लेकिन उसके कार्य की हमने अनुमोदना कर ली तो कर्मबंध कर लेते हैं। मनोवृत्ति के कारण काया, वचन से कर्म नहीं बांधे लेकिन मन से अनुमोदना करने से कर्मबंध का काम कर दिया।
उपाध्यायश्री ने कहा कि द्रव्य हिंसा से बचना है तो भाव हिंसा से बचना पड़ेगा। भाव हिंसा से बचने का उपाय परमात्मा ने बताया है। भावों के अंदर निष्ठुरता आ जाए, इसलिए भाव हिंसा से बचने का उपाय बताया है। मनोवृति से सुरक्षा के लिए मनोगुप्ति बताई गई है। मनोगुप्ति का मतलब है भूतकाल की कल्पनाएं और भविष्य के संकल्प मनोवृति को अटकाने वाली चीज है। ईर्यासमिति की शुरुआत साढ़े तीन हाथ नीचे देखकर चलने का बताया है। मनोगुप्ति में वर्तमान में हम क्या कर रहे हैं, उस पर एकाग्र बन जाना है। मनोगुप्ति को सिद्ध करने के लिए भूतकाल, भविष्य काल की नहीं सोचना है।
उपाध्यायश्री ने कहा कि हमें पता चल जाए, आज मेरा अंतिम दिन है तो करने योग्य, सद्कार्य ही करेंगे। इसे ही वर्तमान जोग कहते हैं। कई बार भूतकाल की कल्पना के कारण हम निराश हो जाते हैं लेकिन आज के दिन क्या करना है, वह सोचना। पहले दैनिक कर्तव्य को सही बनाओ फिर पाक्षिक, वार्षिक व संवत्सरी कर्तव्य को सही बनाओ। सपने साकार करने के लिए मन में जो यथाशक्ति संभव है, वही करने की सोचना चाहिए, इससे शक्ति का वर्धन होता है। वर्तमान में करने योग्य कार्य का या तो भूतकाल में सोचकर कठिनाई महसूस करेंगे या भविष्य पर फेंकेंगे। कार्य करने का भाव और बोलने की परंपरा सकारात्मक होनी चाहिए। परमात्मा कहते हैं वर्तमान में करने योग्य संभव कार्य को करने की उपेक्षा की तो उसमें पात्रता नहीं आती।
उन्होंने कहा कि अगर आपको स्वीट मेमोरी बनानी है तो भूतकाल की ये बातें याद आनी चाहिए। पहली, अच्छे संस्मरण की स्मरण यात्रा करना। उपकारियों के उपकारों को याद करना। उनके उपकारों को याद करके आंसू आए तो कर्म निर्जरा व मोक्ष में उपयोगी बनता है। देव, गुरु, धर्म तो है ही, माता-पिता, कल्याण मित्र, साधु- साध्वी आदि अन्य उपकारी का स्मरण कर सकते हैं। उपकारियों के उपकार नहीं होते तो आज हमारी दुर्दशा हुई हो सकती है। उन्होंने कहा कि जो याद आए और मन प्रफुल्लित हो उठे, उससे राग- द्वेष घटता है और श्रद्धा आदि गुणों का विकास होता है। गुरु का सानिध्य पाने से भावों में परिवर्तन आना संभव है। साधु की सेवा कभी निष्फल नहीं जाती। शुभ भावों से मनोगुप्ति मजबूत बनती है। दूसरा, हमें परमात्मा का शासन मिला है, चतुर्विध संघ मिला है तो चार शरणों के भाव का स्वीकार करना। ये हमें अनंतकाल के बाद मिला है और अभी उपेक्षा की तो अनंतकाल तक नहीं मिलेगी।
उन्होंने कहा कि मनोगुप्ति रखने के लिए अशुभ भाव में से शुभ भाव में आना, इसके लिए प्रयत्न करना है। आर्तध्यान, रौद्रध्यान में से धर्मध्यान में आना है। तीसरा, जीवन में जो भी खुद से दुष्कृत हुए हैं उनका पछतावा करना। वह समाधि काल में सहायक बनता है। चौथा, सुकृत की अनुमोदना करना। पहले खुद के सुकृत की अनुमोदना करना। अपनी भूल को नहीं भूलना और दूसरों की भूल को भूल जाना, यही क्षमापना है। भूलों का पुनरावर्तन नहीं करना है तो उससे दूर रहना है। पांचवां, दूसरों के गुणों को ऐसा याद करना कि उनका नाम याद आने पर गुण याद जाए। हितकारी के गुणों की अनुमोदना करनी चाहिए। महापुरुष का गुण सत्वद्ष्टि रखकर याद करना चाहिए। संघ के प्रति बहुमान रखना चाहिए। गुणदृष्टि के कारण ही संघ के प्रति बहुमान रखा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि बुद्धि सागरजी महाराज ने अपने अवधि ज्ञान से 108 वर्ष पहले ही बता दिया था कि महावीर स्वामी के शब्दों के कारण हमारे देश को स्वतंत्रता मिलेगी। उनकी बात पर पिछले 75 वर्षों में आध्यात्मिक क्षेत्र में भी ज्ञानवीर और कर्मवीर पैदा हुए हैं, जिससे शासन का कायाकल्प पलटा है। दूसरों के आंसू पोंछने वाले दयावीर भी उत्पन्न हुए हैं। साधर्मिक उत्थान हुआ है। दुनिया में सर्वत्र शांति के लिए, हिंसा पर नियंत्रण करने के लिए महावीर की अहिंसा बड़ी भूमिका निभाएगी। आज ये सब बातें अक्षरशः सत्य सिद्ध होती प्रतीत होती है। मोदी जी ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इसका उल्लेख किया।