चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित साध्वी कंचनकंवर व साध्वी डॉ.सुप्रभा ‘सुधाÓ के सानिध्य में साध्वी डॉ.उदितप्रभा ‘उषाÓ ने भाई दूज के त्यौहार पर विशेष उद्बोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति में मनाए जाने वाले सभी पर्व उच्च सांस्कृतिक, सामाजिक आदर्शों से जुड़े हैं और संस्कारों की धारा प्रवाहित करते रहते हैं।
गौतम पड़़वा का पर्व गुरु शिष्य और शिष्य का त्यौहार है जिसमें शिष्य गुरु की ओर बढ़ता है और भक्त भगवत्ता को प्राप्त करता है। भाई दूज का त्यौहार भाई-बहिन के बीच प्रेम, स्नेह, सौहार्द और निश्छल प्रगाढ़ता का त्यौहार है।
दूज का चंद्रमा लघुता से पूर्णता की ओर अनवरत बढ़़ता है और यह संदेश देता है कि भाई-बहिन का प्रेम और विश्वास लघुता से चन्द्रमा की कलाओं की भांति पूर्णिमा के चंद्रमा के समान पूर्णता को प्राप्त करे। भाई अपनी बहन के घर जाकर उसे उपहार प्रदान करता और बहिन उसे प्रेमपूर्वक भोजन कराती है। हमारी संस्कृति में भाई के कष्टों के समय में बहिन सदा हिम्मत और सम्बल देती है, साथ खड़ी रहती है।
प्रभु महावीर स्वामी के निर्वाण के बाद उनके भाई नंदीवर्धन अन्न-जल त्यागकर शोकविह्वल हो गए तब उनकी बहन सुदर्शना ने भाई दूज के दिन ही आकर उन्हें सम्बल दिया और समझाकर अपने घर लेकर जाती है और भोजन कराती है। वैदिक परम्पराओं में भी आज के दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर जाते हैं और प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देते हैं।
यह त्यौहार पवित्र संबंध में भाई-बहिन के हृदयों को बांधता है। ऐसा निश्छल प्रेम, स्नेह का संबंध और कहीं नहीं है। भाई शब्द के साथ दूज का जुडऩा रिश्तों की आत्मीयता के उत्तरोत्तर प्रगति का संदेश देता है। घर-परिवार में एक-दूसरे के प्रति प्रेम, प्यार, आत्मीयता बनी रहेगी तो संबंध चिरस्थाई बने रहेंगे।
साध्वी डॉ.इमितप्रभा ने कहा कि तीन शब्द हैं जन्म, जीवन और मरण। जन्म और मरण तो संसार में सभी का होता है, जब तक मोक्षप्राप्त नहीं होता जन्म-मरण होता रहता है। लेकिन जीवन एकमात्र मनुष्य का होता है, जहां जीवन है वहां संबंध होते हैं।
देव, तीर्यंच, नारकी अन्य किसी योनी के जीवों में न जीवन और न ही आपसी संबंध होते हैं। तीर्यंच में मात्र दुग्धपान तक संबंध होते हैं और देव, नारकी में आयुष्यपूर्ण तक। मनुष्य जीवन में चार प्रकार के संबंध हैं- पहला जो रिश्ते-संबंध जन्म से मिलते हैं और खून के रिश्ते हैं।
दूसरा आत्मीय संबंध- किसी से प्रेम और आत्मीयता होने से जोड़ा जाता है। तीसरा सामाजिक संबंध जो परस्पर सहयोग देने से बनता है। चौथा नाटकीय संबंध जिनमें प्रेम, सामंजस्य, सहयोग और आत्मीयता का अभाव होता है लेकिन उन्हें निभाना पड़ता है।
हमें प्रथम तीन प्रकार के संबंधों को अपनाना है। अनुभवियों ने संबंधों को पौधे से उपमित किया है। रिश्तों को पौधों की तरह पल्लवित-पुष्पित होने के लिए प्रेमरूपी पानी, खादरूपी विश्वास, हवारूपी सहयोग, धूपरूपी सहिष्णुता और सहनशीलता की जरूरत होती है।
इन अमूल्य तत्वों को घर का प्रत्येक सदस्य अपना ले तो सभी घर-परिवार स्वर्गसमान सुखी बन जाएं। कम से कम पर्व त्यौहारों पर तो घर के सभी सदस्यों को आपस में मिलना और साथ रहना चाहिए। भाईदूज का पर्व हमें यही संदेश देता है कि प्राचीनकाल से चला आ रहा यह रिश्ता दूज से पूनम के चांद की तरह 16 कलाओं से युक्त हो संपूर्णता को प्राप्त करे।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में तपस्वियों ने विभिन्न तप के पच्चखान लिए। धर्मसभा में लोगस्स साधना की करवाई गई। श्री मधुकर उमराव अर्चना चातुर्मास समिति के सहमंत्री किशोर चोरडिय़ा ने चातुर्मास समिति की ओर से सभी को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए भाईदूज के महत्व पर प्रकाश डाला और सभा का संचालन किया।
इस अवसर पर अनेक श्रद्धालु उपस्थित थे। 02 नवम्बर को पू.गणेशीलालजी महाराज की जन्मजयंती मनाई जाएगी।