किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने प्रवचन में मन और आत्मा के अंतर पर प्रकाश डालते हुए कहा आत्मा स्वतंत्र है और मन पराधीन है। मन पुद्गल से बना है और आत्मा चैतन्य है।
मन को हर भव में बनाना पड़ता है, इसे मन:पर्याप्ति कहते हैं जबकि आत्मा को क्रिएट नहीं करना पड़ता है, यह अनादिकाल से हमारे साथ है। मन जो भी चिंतन करता है, वह पूर्व अनुभव, वर्तमान विचार और भविष्य की योजना को लेकर करता है। मन के तीन लक्षण है स्मृति, कल्पना और चिंतन। जबकि आत्मा ज्ञान, दर्शन, चारित्र, उपयोग, तप और वीर्य का स्वामी है। आत्मा की पर्याप्ति नहीं होती, जबकि मन की पर्याप्ति होती है। जहां-जहां आत्म प्रदेश है वहां- वहां मन है। हाल में हमारी आत्मा मन की गुलाम बनकर रही हुई है। हमारी आत्मा में शक्ति बहुत है लेकिन वह मन, इंद्रियों की परतंत्र बनी हुई है। मन, मति, बुद्धि, प्रज्ञा, चित्त सब पर्यायवाची है। आत्मा इन सबसे अटकी हुई है। इंद्रियां भी मन के अनुसार प्रवर्त होती है।
मन ने उपेक्षा की तो इंद्रियां स्वत: शांत हो जाएगी। मन जिसके अंदर जुड़ता है, इंद्रियां उसके अनुसार नाचती है। गुरुदेव ने कहा मात्र मतिज्ञान से शुभ चिंतन व ध्यान करते-करते भी केवल ज्ञान मिल सकता है। ध्यान एक वस्तु पर मन को केंद्रित करने का कार्य करता है, वहीं, चिंतन कई बातों का होता है। सर्वज्ञ के पास भी मन तो होता है लेकिन वे उसका उपयोग नहीं करते। देवलोक के देव परमात्मा के मन को अवधि ज्ञान से देखते हैं। मन जब गलत सोचने लगता है तो मति अज्ञान प्रकट होता है, आज हमारी हालत वही है।
आचार्यश्री ने सरिता व समुद्र जैसे ज्ञान की महानता बताते हुए कहा कि सरिता छोटी है लेकिन स्थिर है। जबकि समुद्र बड़ा है लेकिन अस्थिर है। अल्पज्ञान मोक्ष दे सकता है परंतु विकृत ज्ञान मोक्ष नहीं दे सकता। तात्पर्य यह है कि ज्ञान विराट हो पर वह अस्थिर है तो लाभदायी नहीं होगा।
अल्पज्ञान भी चित्तस्थिरता से लाभदायी होगा। गुरुदेव ने कहा ज्ञान कम होगा तो चलेगा, विकृत ज्ञान नहीं चलेगा। वर्तमान में क्रिया खूब बढ़ी है, यह अच्छी बात है लेकिन क्रिया को ही धर्म मान लेना उचित नहीं है। जब तक तत्व का स्पर्श नहीं करोगे, हमारी क्रिया मोक्ष नहीं देगी। इसके लिए तत्वज्ञानी के साथ रहना पड़ेगा। ज्ञानी के मात्र शब्द ही नहीं, हावभाव, व्यवहार भी ज्ञान देता है। हमें मात्र पुस्तक का ज्ञान ही नहीं बल्कि अनुभव का ज्ञान भी अर्जन करना चाहिए। गुरुदेव ने कहा मरण पांच प्रकार के हैं अभी आविची मरण, अवधि मरण, अत्यांतिक मरण, बाल मरण और पंडित मरण।
आविची मरण यानी पल- पल अपने आयुष्य का स्टोरेज कम होते जाना। मृत्यु कभी भी आए, हमें उसका स्वागत करने के लिए तैयार रहना चाहिए। अवधि मरण यानी समय पूरा होने पर मरण होना। बाल मरण यानी चिंता, वेदना, शोक, पीड़ा आदि में जो मरण होता है। पंडित मरण यानी सर्वविरतिधरों का मरण। यह उन्हें मिल सकता है, जिन्होंने जीवन में व्रत, पच्छक्खाण आदि अच्छे से पाले हो और उनको गुरु का सान्निध्य मिला हो। गुरुदेव ने कहा सुंदर भावनाएं हमें अनुकूलता प्रदान करती है, किए हुए भाव निष्फल नहीं जाते। इसलिए मनोरथ हमेशा शुभ रखना चाहिए।