राजस्थान पत्रिका एवं एक्ष्नोरा इंटरनेशनल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हरित प्रदेश अभियान के द्वारा भगवान महावीर के 2622 वे जन्म कल्याण मोहत्सव के उपलक्ष में मेगा वृक्षारोपण आज शासन जैन महिला महाविद्यालय में पौधे रोपण किए, एवं पौधे वितरण किए, कॉलेज की अध्यापिका सशिकला ने पत्रिका के अभियान की सराहना की, इस मौके पर एक्ष्नोरा नॉर्थ सचिव फतेराज जैन ने कहा भगवान महावीर को ‘पर्यावरण पुरुष’ कहा जाता है और अहिंसा को पर्यावरण संरक्षण का अनूठा विज्ञान।
आज से करीब ढाई हजार साल पहले (599 ई.पूर्व ) एक राजघराने में जन्मे महावीर स्वामी का सम्पूर्ण जीवन त्याग, तपस्या व अहिंसा का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने एक लंगोटी तक का परिग्रह नहीं किया। पूरी दुनिया में पंचशील (सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अत्सेय व क्षमा) के सिद्धांत देने वाले स्वामी महावीर ने न सिर्फ मानव अपितु सम्पूर्ण प्राणी समुदाय के कल्याण और विश्व शांति का मार्ग प्रशस्त किया था।
भगवान महावीर मानते थे कि जीव और अजीव से संयुक्त इस सृष्टि में मिट्टी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति ये जो अजीव तत्व हैं, इन सब में भी जीवन है; इसलिए इनके अस्तित्व को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। इनके अस्तित्व को नकारने का मतलब है अपने स्वयं के अस्तित्व को अस्वीकार करना।
स्थावर या जंगम, दृश्य और अदृश्य सभी जीवों का अस्तित्व स्वीकारने वाला मनुष्य ही सही मायने में पर्यावरण और मानव जाति की रक्षा के बारे में सोच सकता है। आज पर्यावरण संकट गहराते जाने का मूल कारण यह है कि हम पहाड़ों एवं वृक्षों को काटकर कंक्रीट के जंगलों का विस्तार करते जा रहे हैं। यदि जल्द ही न चेते तो वह दिन दूर नहीं जब मानव को रेगिस्तान की चिलचिलाती धूप में प्यासा मरना होगा।
जंगलों से हमारा मौसम नियंत्रित और संचालित होता है। जंगल की ठंडी आबोहवा नहीं होगी तो सोचो धरती किस तरह आग की तरह जलने लगेगी? आज महानगरों के कई लोग जंगलों को नहीं जानते, इसीलिए उनकी आत्माएं सूखी हुई हैं। जियो और जीने दो के संदेशवाहक महावीर स्वामी की मान्यता थी कि यह संपूर्ण जगत आत्मा का ही खेल है।
वृक्षों में भी महसूस करने और समझने की क्षमता होती है। यह बात आज पर्यावरण और जीव विज्ञानियों की शोधों से भी हो चुकी है। जैन समुदाय में चैत्य वृक्षों या वनस्थली की परंपरा रही है। इस परम्परा में वृक्षों को काटना अर्थात उसकी हत्या करना महापाप माना गया है। वे कहते थे कि वृक्ष से हमें असीम शांति और स्वास्थ्य मिलता है।
उनके अनुसार चेतना जागरण में पीपल, अशोक, बरगद आदि वृक्षों का विशेष योगदान रहता है। इसीलिए इस तरह के सभी वृक्षों के आस-पास चबूतरा बनाकर उन्हें सुरक्षित करने की परम्परा उस समय में डाली गयी थी ताकि वहां बैठकर व्यक्ति शांति का अनुभव कर सके। जैन समुदाय ने सर्वाधिक पौधों को लगाए जाने का संदेश दिया है। सभी 24 तीर्थंकरों के अलग-अलग 24 पौधे हैं।
जैन समुदाय वृक्षों को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानता है। आज पर्यावरण विज्ञान भी कहता है कि ये वृक्ष भरपूर ऑक्सीजन देकर व्यक्ति की चेतना को जाग्रत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आओ सब मिलकर पेड़ लगाए। इस मौके पर एक्ष्नोरा के गोविंदराज, दीपक एवं अध्यापिका, कई जीवदया प्रेमी एवं पर्यावरण प्रेमी उपस्थित थे।




