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पूर्वकाल की साधना उपासना को दीर्घजीवी बना देती है: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरिजी

पूर्वकाल की साधना उपासना को दीर्घजीवी बना देती है: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरिजी

 

 

किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्यश्री केशरसूरिश्वरजी के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरिश्वरजी म. सा. ने वैराग्य गुण अधिकार की विवेचना करते हुए कहा वैराग्य प्रबल होता है तो सहनशक्ति बढ़ती है। सहनशक्ति बढ़ने से साधना सुगम बन जाती है।

जिसका वैराग्य कमजोर होता है उसके धर्म टालने के बहाने ज्यादा रहते हैं। जिस व्यक्ति का वैराग्य मजबूत होता है तो उसके लिए साधना इनाम हो जाती है। जहां हृदय में श्रद्धा प्रबल रहती है वहां विघ्न मंद हो जाते हैं। श्रद्धा हो तो जंगल में भी उपासना की जा सकती है, श्रद्धा नहीं है तो महल में भी उपासना करने पर विघ्न पैदा होते हैं। वैराग्य का मतलब ‘उदासीन भाव’ यानी जीवन में आते उतार-चढ़ाव में मध्यस्थ, स्वस्थ रहना, वह वैराग्य का एक प्रकार है। वैराग्य के फायदे बताते हुए उन्होंने कहा कि वैराग्य जिसके जीवन में प्रबल है, उसकी अभिमान वृत्ति घटती है।

वैराग्य से साधना दीर्घजीवी बनती है और वासना अल्पजीवी बनती है और धारणा मरजीवी बनती है यानी मन की ग़लत धारणा, भौतिक कल्पनाएं मृत जैसी बनती है। साधना समय से, स्थान से जुड़ी हुई होती है परन्तु उपासना कभी भी की जा सकती है। उन्होंने कहा कोई भी आराधना में प्रवेश होने के लिए उत्साह, टिकने के लिए धैर्य और पार पाने के लिए उपशम भाव होने चाहिए।

आचार्यश्री ने आगे कहा आज व्यक्ति वासना से ज्यादा धारणा से दुःखी है। दोष दोनों में ज्यादा है लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि हम किसे टाल सकते हैं। भोग्य वस्तु के सेवनकाल में होता हुआ मोह, वह ‘वासना’ है, तो वस्तु न मिलने पर होती हुई आकांक्षा, अपेक्षा, उसे धारणा या कल्पना कहते हैं। हम वासना को शायद छोड़ न पाए, तो कम से कम धारणा को तो छोड़ ही दें।

अपना मन ही अपने को ठगे वह उचित नहीं है। उन्होंने कहा पूर्वकाल की साधना उपासना को दीर्घजीवी बना देती है। मंत्री अभयकुमार ने प्रबल वैराग्य से पांच साल के दीक्षा पर्याय में ही उत्कृष्टता पा ली। कहा गया है सामग्री की शक्ति से साधना की शक्ति महान् होती है। मनोशक्ति से आत्मशक्ति महान् होती है।

धर्म क्रिया में तकलीफ हो सकती है लेकिन उसके कारण तनाव मत करो। धर्म क्रिया को हमेशा आनंद के साथ करनी चाहिए। ज्ञानी कहते हैं आराधना के काल में मन व इंद्रियों का नहीं सुनना, गुरुदेव का सुनना। गुरु के शरण में जाओ तो समर्पण भाव के साथ जाओ। समर्पण भाव के बिना ज्ञान भी फलित नहीं होता। ज्ञान व समाधान औषध के समान है, वह गुरु से मिलता है। ‌उन्होंने कहा हमारी प्रवृत्ति अच्छी होती है लेकिन कई बार सिस्टम में मार खाते हैं। हमारे अंदर शासन के लिए गर्व, गौरव, गंभीरता और गुरुता होनी चाहिए। आत्मशांति पाने के श्रेष्ठ मार्ग है संयम और तप।

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