जैन संत डाक्टर राजेन्द्र मुनि जी महाराज ने आदिनाथ भगवान के चरण कमल मे वन्दन करते हुए कहा कि हे योगीश्वर! आप सर्व गुण सम्पन और गुणों के भंडार है! संसार मे ऐसा कोई गुण बाकी नहीं रहा जो आपके जीवन मे न हो, इतने गुण व्याप्त हो चुके है कि अब कोई भी दुर्गुण आप के अन्दर प्रवेश नहीं कर सकते उनके लिए आपके संग रहने का कोई स्थान नहीं बचा! जैसे सूर्य के सामने अन्धकार ठहर नहीं सकता उसी प्रकार आपके सद्गुनो के सामने अन्धकार ठहर नहीं सकता! अन्धकार तो बेचारा दूर से ही भाग खड़ा होता है! आपके तप तेज के आगे दोष स्वतः समाप्त हो जाते है!
आचार्य मानतुंग जी ने कहा जब दुर्गनो को स्थान नहीं मिला तो वे संसार मे जन्म मरण करने वाली आत्माओं मे राग द्वेष मद मोह के रूप मे प्रवेश कर गए एवं उनके कारण से ही जीवआत्माये संसार मे घूम रही है! इन्ही कुदेव कुधर्म के चलते संसार का भव भृमण हो रहा है! अंधे लोगों की नौकायें समुद्र में ही गोते खाती रहती है क्योंकि चलाने व बैठने वाले सभी अंधजन है! संसार भी अज्ञान के अंधेपन से चलायमान है! सभा मे साहित्यकार श्री सुरेन्द्र मुनि जी महाराज द्वारा अच्छी संगत पर प्रकाश डालते हुए कहा गया कि जैसे हम खानपान रहन सहन अच्छा चाहते है वैसे ही जीवन भी अच्छा जीने का प्रयास करें! सभा मे महामंत्री उमेश जैन द्वारा स्वागत व सूचनाएं प्रदान की गई।



