*विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, श्रुत समुद्र श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश
🪔 *विषय अभिधान राजेंद्र कोष भाग7*🪔
~ श्री नमस्कार महामंत्र का स्मरण मात्र ही हमारे चित्त को प्रसन्न कर देता है क्योंकि श्रेष्ठ तत्व का स्मरण उसमें है।
~ जब हमारे भीतर में अहं का नाश का, भाव प्रकट होता है तब हमारे में रहे अरिहंत प्रभु स्वयमेव प्रगट होते हैं।
~ जब तक मृत्यु का बोध स्पष्ट रूप से नहीं होगा तब तक हमारा जीवन जागृति पूर्ण होना कठिन है ।
~ साधक अपने प्राणों तक श्री नमस्कार महामंत्र का जाप करता है जिसके प्रभाव से साधक स्वयं ही पूर्ण पुरुषता को प्राप्त करता है।
~ जो स्वयं की आत्म वैभव का अत्यंत निकट रहकर अभ्यास करें वह है उपाध्याय भगवंत।।
~ श्री नमस्कार महामंत्र की अखंड श्रद्धा और अद्वितीय पुरुषार्थ के बल से साधक का ज्ञान केवल ज्ञानी प्रभु जैसा स्पष्ट होता है।
~ जो स्वयं के गुणो में ही निरंतर लीन रहते हैं और अन्य को लीन रहने का मार्ग दिखाते हैं वह है उपाध्याय भगवंत।
~प्रभु महावीर स्वामी ने 12 1/2 साल तक निरंतर स्वयं की चेतना में ही ली रहे थे।
~ प. पू. प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी म. ने 14 1/2
साल तक निरंतर अभिधान राजेंद्र कोष का लेखन करके परम गुण वैभव को पाया था।
*”जय जिनेंद्र-जय गुरुदेव”*
🏫 *श्री राजेन्द्रसुरीश्वरजी जैन ट्रस्ट, चेन्नई*🇳🇪