बेंगलुरु। आचार्यश्री देवेंद्रसागरसूरीश्वरजी ने यहां अक्कीपेट में शुक्रवार को अपने प्रवचन में कहा, धर्म एक जीवनशैली है, जीवन-व्यवहार का कोड है।
समझदारों, चिंतकों, मार्गदर्शकों, ऋषियों द्वारा सुझाया गया सात्विक जीवन-निर्वाह का मार्ग है, सामाजिक जीवन को पवित्र एवं क्षोभरहित बनाए रखने की युक्ति है, विचारवान लोगों द्वारा रचित नियम नैतिक नियमों को समझाइश लेकर लागू करने के प्रयत्न का एक नाम है, उचित-अनुचित के निर्णयन का एक पैमाना है और लोकहित के मार्ग पर चलने का प्रभावी परामर्श है।
निरपेक्ष अर्थ में ‘धर्म’ की संकल्पना का किसी पंथ, संप्रदाय, विचारधारा, आस्था, मत-मतांतर, परंपरा, आराधना-पद्धति, आध्यात्मिक-दर्शन, किसी विशिष्ट संकल्पित मोक्ष-मार्ग या रहन-सहन की रीती-नीति से कोई लेना-देना नहीं है।
उन्होंने कहा कि सच्चा धर्म सकारात्मक होता है, नकारात्मक नहीं। अशुभ एवं असत से केवल बचे रहना ही धर्म नहीं है। वास्तव में शुभ एवं सत्कार्यों को करते रहना ही धर्म है।