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धर्मात्मा होना मानव जीवन की सार्थकता है: साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

धर्मात्मा होना मानव जीवन की सार्थकता है: साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

उन्होंने बताया कि होश और विवेक से जीवन जीना धर्म है

Sagevaani.com @शिवपुरी। हम सांसारिक प्राणियों का धर्म से नाता सीमाओं में बंधा रहता है। 24 घंटे में एक घंटा धर्म कर लिया, मंदिर चले गए, पूजा पाठ कर लिया, आरती कर ली, सामयिक और प्रतिक्रमण कर लिया तो हम आपने आपको धार्मिक समझकर संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन मानव जीवन की सार्थकता आपके धार्मिक होने में नहीं, बल्कि आपके धर्मात्मा होने में है। 24 घंटे चाहे आप सांस ले रहे हों, चल रहे हों, फिर रहे हों, बैठ रहे हों, सो रहे हों, खा रहे हों हर क्रिया में धर्म की झलक होनी चाहिए।

धर्म अर्थात् होश, धर्म अर्थात् विवेक, धर्म अर्थात् यतनापूर्वक हर कार्य करना। यदि ऐसा हुआ तभी आप धर्मात्मा हैं और धर्मात्मा होना ही मानव जीवन की सार्थकता है। उक्त प्रेरणास्पद उद्गार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने स्थानीय पोषद भवन में आयोजित एक विशाल धर्मसभा में व्यक्त किए। धर्मसभा में उन्होंने यह भी बताया कि कौन सा धर्म श्रेष्ठ और धर्म के मायने क्या हैं? धर्म क्या आपस में लडऩा झगडऩा सिखाता है अथवा जीवन को सद्मार्ग पर लाता है। धर्मसभा में साध्वी रमणीक कुंवर जी ने होश पूर्वक कार्य करने के लाभ भी गिनाए।

प्रारंभ में मधुर गायिका साध्वी वंदनाश्री जी ने ऐसी लागी गुरू से प्रीत, दुनिया क्या जाने, मेरी हार से हो गई जीत दुनिया क्या जाने…भजन का गायन कर पूरे वातावरण को भक्ति रस से सराबोर कर दिया। साध्वी वंदनाश्री जी आशु कवि होने के साथ-साथ ही श्रेष्ठ गायन में भी पारंगत हैं। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने भगवान महावीर के शास्त्रोक्त कथन धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है को स्पष्ट करते हुए पूछा- अब सवाल यह उठता है कि कौन सा धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। दिक्कत यह है कि हम फिर अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ बनाने में संघर्ष पर उतारू हो जाते हैं, लेकिन भगवान महावीर ने किसी धर्म विशेष का नाम ना लेते हुए सिर्फ इतना बताया कि जिस धर्म में अहिंसा, संयम और तप है वह सर्वश्रेष्ठ है। अहिंसा, संयम और तप धर्म के तीन आधार स्तम्भ हैं।

विवेकपूर्वक जीवन जीना अहिंसा है

साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने बताया कि जब तक जीवन में होश का जागरण और विवेक का आगमन नहीं होता तब तक हम हिंसा से मुक्त नहीं हो सकते। हमारे जीवन की एक-एक गतिविधि बताती है कि हम हिंसक हैं या अहिंसक। हिंसा सिर्फ इसलिए होती है, क्योंकि भीतर होश का दीया नहीं जल पाया। होश, विवेक और यत्ना से यदि हम सांस लेंगे, चलेंगे, फिरेंगे, खाएंगे, पिएंगे, सोएंगे, मलमूत्र विसर्जित करेंगे तो हिंसा नहीं होगी। उन्होंने कहा कि धार्मिक भावना होना बड़ी बात नहीं है। एक घंटा मंदिर जाकर आप धार्मिक बन सकते हैं, लेकिन धर्मात्मा होना बड़ी बात है। जब आपकी आत्मा धर्ममय हो जाए, होशपूर्ण हो जाए तब आप धर्मात्मा हैं और संसार में रहकर भी आप धर्मात्मा हो सकते हैं।

अनुशासन हमें विवेकपूर्वक काम करने की नसीहत देता है

साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने कहा कि जब आप विदेश में जाते हैं तो वहां के अनुशासन का पालन करते हैं। वहां सड़क पर गंदगी नहीं फेंकी जाती है। पान और तम्बाकू की पीक से जमीन गंदी करना अपराध है और इसके लिए आपको जुर्माना देना पड़ता है। वहां तो आप सब कुछ ध्यान रखते हैं, लेकिन अपने देश में आकर क्यों भूल जाते हैं। उन्होंने कहा कि विवेकपूर्वक और यत्ना से काम ना करने के कारण ही आपके शहर में गंदगी फैल रही है। उन्होंने कहा कि अनुशासन हमें विवेकपूर्ण काम करने की नसीहत देता है।

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