किलपॉक स्थित एससी शाह भवन में विराजित उपाध्यायश्री युगप्रभविजयजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि परमात्मा को पुरुषोत्तम कहा गया है। उनमें विशिष्ट गुण देखने को मिलते हैं। उनकी आत्मा कोई भी भव में गई हो, ये गुण मिलेंगे। उनका प्रमुख गुण है परार्थ भावना। जो अपने स्वार्थ को गौण करता है, वही परार्थी बन सकता है। उनको औचित्य का पालन करना होता है। परोपकार करने के लिए दूसरों के लिए कोमल बनना पड़ेगा और स्वयं के लिए कठोर।
उपाध्याय प्रवर ने बताया कि मरुदेवी माता को पुत्र आदिनाथ परमात्मा से असीम स्नेह था, क्योंकि वे उनके प्रथम पुत्र थे। प्रथम का आनंद हर जगह विशिष्ट होता है। वात्सल्य के कारण आदिनाथ परमात्मा के साधना के कठिन मार्ग पर जाने की बात पर माता मरुदेवी को आघात लगा और उनके नयनों में आंसू बहने लगे। मरुदेवी माता की दूसरी सोच भी थी कि उनके पुत्र ने आत्मकल्याण का मार्ग चुना है, वह सही है।
उन्होंने कहा कि जब हमारे यहां मुमुक्षु दीक्षा लेते हैं तो मुमुक्षु की अपेक्षा माता पिता का त्याग ज्यादा विशिष्ट होता है। मुमुक्षु को तो संसार जहर के समान लगता है। लेकिन माता-पिता अपने होनहार पुत्र रत्न का त्याग करते हैं, इसलिए उनका त्याग अधिक महान् है। यह परार्थ भावना व औचित्य गुण मरुदेवी माता में भी कूट-कूट कर भरा हुआ था। कर्मसत्ता और धर्मसत्ता पाई- पाई का हिसाब रखते हैं। उन्होंने पुत्र के कल्याण के लिए मानसिक वेदना सहन की। पुत्र के दुख की अधिक संवेदना माता को होती है।
उन्होंने कहा कि जो दूसरों के दुख देखकर दुखी होते हैं, वे परम सुखी बनते हैं। दूसरे व्यक्ति के दुख देखकर करुणा की भावना उत्पन्न हो, वही धर्म है। वह व्यक्ति आगे जाकर मोक्ष का हकदार बनेगा। सकारात्मक सोच दवाई का काम करती है। नकारात्मक सोच के कारण उत्पन्न मानसिक तनाव ज्यादा तकलीफ देते हैं इसलिए नकारात्मक सोच व तनाव से दूर रहना चाहिए। नकारात्मक विचारों के कारण कर्मबंध होते हैं, वहीं सकारात्मक विचारों से कर्म निर्जरा होती है।
उन्होंने कहा कि मन का मालिक स्वयं की आत्मा है। जो काम होने योग्य नहीं है, उसके लिए मौन धारण कर लेना चाहिए। योगी बनना है तो संसार में कोई अपेक्षा टूटे, आघात लगे तो आंखें बंदकर एकत्व भाव में डूब जाना चाहिए। यह अटूट सत्य है कि आत्मा अकेली आई है और अकेली ही जाएगी। बहुत बार व्यक्ति अनुभव से सीखता है। आदिनाथ परमात्मा के परार्थ भाव में जो योगदान था, वह मरुदेवी माता का था। स्वयं दुखी होकर भी दूसरों को सुख के मार्ग पर जाने देना, यही परार्थ भाव है।