श्री जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन में जयधुरंधर मुनि के सानिध्य में जयपुरंदर मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र का वांचन करते हुए कहा भगवान महावीर की वाणी जगत् के समस्त जीवों के लिए कल्याणकारी एवं हितकारी होती है।
आगम के हर शब्द में बहुत सार छुपा हुआ है जिसे समझने की आवश्यकता है। आगम के सूत्र त्रिकाल सत्य होते हैं। जहां विनय होता है वहां विवेक भी स्वतः आ जाता है। जिस प्रकार एक सर्प सीधा बिल में घुस जाता है, उसी प्रकार बिना स्वाद लिए आहार को सीधे मुंह में प्रवेश करवा देना चाहिए।
स्वाद ले लेकर प्रशंसा करते हुए आहार करने से कर्मों का बंध होता है। शिक्षा उसे ही दी जानी चाहिए जो ग्रहण करने के लिए तैयार हो। जैसे दुष्ट घोड़े को शिक्षा देते हुए घुड़सवार खेदित होता है, उसी प्रकार अविनीत शिष्यों को शिक्षा देता हुआ गुरु खेदित होता है।
क्षिद्रान्वेषी बनकर दूसरों के दोष देखने की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए। जो धर्म युक्त व्यवहार का पालन करते हैं, वह कभी संसार में दूसरों के द्वारा निंदा को प्राप्त नहीं होते हैं। अपितु ऐसे लोग सर्वत्र प्रशंसनीय बनते हैं। जिस प्रकार पृथ्वी सभी प्राणियों के लिए आधारभूत होती है, उसी प्रकार विनय भी सद्गुणों का आधार रूप होता है।
दूसरे अध्ययन का विवेचन करते हुए मुनि ने कहा साधना के दहलीज पर कदम बढ़ाने के बाद आने वाले परीषहओं को समभावपूर्वक सहन करना चाहिए।
जिस प्रकार संग्राम के अग्रिम पंक्ति में रहा हुआ शूरवीर शत्रु के बाणों की परवाह न करते हुए शत्रु सेना को परास्त कर देता है ,उसी प्रकार उत्तम साधक कष्टों की उपेक्षा करते हुए क्रोध आदि भाव शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए आत्म संग्राम में डटा रहता है। एक संयमी साधक अपने व्रतों में दोष लगाने की बजाय प्राणों की आहुति तक देने के लिए तैयार हो जाता है।
क्षुब्धा के समान कोई दूसरी वेदना नहीं होती है। फिर भी शरीर चाहे काक जंगा के समान दुर्बल एवं कृष हो जाए तो भी आहार – पानी की मर्यादा को जानने वाला साधु मन में दीनता के भाव ना लाते हुए दृढ़ता के साथ कष्टों का सामना करता है।
दुखों से घबराने के बजाय उसे संघर्ष करना चाहिए। मुनिवृंद के सानिध्य में प्रातः 8:00 बजे से पुच्छिसुणं जाप एवं 9:00 बजे से उत्तराध्ययन सूत्र का विवेचन गतिमान है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित हो रहे हैं।