दिवाली, धनतेरस, रुप चतुर्दशी, गोवर्धन पूजा और भाई दूज का संदेश – जीवन में धर्म, ज्ञान और करुणा का आलोक
चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत आज आयोजित धर्मसभा में भारत गौरव डॉ. श्री वरुण मुनि जी महाराज ने गुजराती भवन में अपने चातुर्मासिक प्रवचनों के दौरान कहा कि भारत विविध त्योहारों की पावन भूमि है।
ये पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, धर्म और मानवता के जीवंत प्रतीक हैं। ये हमें जीवन के कर्तव्यों, नैतिक मूल्यों और आत्मिक विकास की प्रेरणा देते हैं। मुनि श्री ने कहा कि दीपावली अपने साथ पाँच प्रमुख पर्वों – धनतेरस, रुप चतुर्दशी, गोवर्धन पूजा, दीपावली और भाई दूज – की श्रृंखला लेकर आती है। प्रत्येक पर्व में गहन आध्यात्मिक अर्थ और जीवनोपयोगी शिक्षाएँ निहित हैं।उन्होंने कहा कि धनतेरस के दिन लोग सामान्यतः स्वर्ण, रजत, आभूषण एवं वस्त्र क्रय करते हैं, किंतु धन केवल भौतिक वस्तुओं तक सीमित नहीं है।
मुनि श्री ने कहा कि “सच्चा धन है – उत्तम स्वास्थ्य, स्नेहमय परिवार, सुसंस्कृत समाज और धर्ममय जीवन,”उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि स्वास्थ्य अच्छा है तो जीवन के सभी सुख सार्थक लगते हैं, परंतु स्वास्थ्य के अभाव में अपार संपत्ति भी निरर्थक प्रतीत होती है। परिवार भी धन का एक अनुपम रूप है – क्योंकि मनुष्य चाहे कितना भी धनी क्यों न हो, यदि उसके पास परिवार और संबंधों का प्रेम नहीं, तो वह जीवन वास्तव में रिक्त है।
“धन से हम भोजन खरीद सकते हैं, पर पाचन शक्ति नहीं; वस्त्र ले सकते हैं, पर नींद नहीं; सुख-सुविधाएँ प्राप्त कर सकते हैं, पर शांति नहीं।”मुनि श्री ने कहा कि सच्चे धन का सर्वोच्च स्वरूप सामाजिक सेवा है। केवल भोग और उपभोग जीवन नहीं, बल्कि दूसरों के दुःख को दूर करना ही मनुष्यत्व की सार्थकता है। दिव्यांगों, असहायों और निर्धनों की सेवा ही सच्चे पुण्य का मार्ग है। उन्होंने आगे कहा कि धर्म भी धन का ही एक दिव्य रूप है, जिसमें ज्ञान, भक्ति और कर्म तीन प्रमुख स्तंभ हैं। आज के युग में सोशल मीडिया हमें असंख्य सूचनाएँ देता है, किंतु वास्तविक ज्ञान और विवेक का विस्तार सीमित होता जा रहा है।
अंत में मुनि श्री ने कहा कि दीपावली से जुड़े ये पाँचों पर्व हमें सिखाते हैं कि सच्चा धन सोना-चाँदी नहीं, बल्कि उत्तम स्वास्थ्य, सुदृढ़ परिवार, सेवा, सदाचार और धर्मपरायण जीवन है।
यही त्योहारों का सार, जीवन का सत्य और मनुष्य का परम कर्तव्य है।कार्यक्रम के दौरान मधुर वक्ता रूपेश मुनि जी म.सा. ने अपने सुरम्य स्वर में भक्ति रस से ओतप्रोत भजनों की मनमोहक प्रस्तुति दी, जिनसे सम्पूर्ण वातावरण आध्यात्मिक आनंद और पवित्र भावनाओं से भर उठा। उनके भजनों की मधुर लहरियों ने श्रद्धालुओं के हृदयों में भक्ति, शांति और समर्पण की भावनाएँ जागृत कर दीं।
इसके उपरांत उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी म.सा. ने मंगल पाठ प्रदान कर सभी को आशीर्वाद स्वरूप शुभकामनाएँ दीं। उनके प्रेरक वचनों ने उपस्थित जनों को धर्ममार्ग पर अडिग रहने तथा जीवन में करुणा, संयम और सादगी को अपनाने की प्रेरणा दी।
पूरे कार्यक्रम का सुसंगत और प्रभावी संचालन श्री राजेश मेहता द्वारा किया गया। उनके संतुलित संचालन ने आयोजन की गरिमा को और भी बढ़ा दिया।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण उपस्थित रहे और मुनि श्री के मंगल वचनों से आत्मिक प्रेरणा प्राप्त की। वातावरण में भक्ति, शांति और आध्यात्मिक उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला।
कार्यक्रम के समापन पर श्रद्धालुओं ने मंगलपाठ के साथ मुनि श्री से आशीर्वचन प्राप्त किए और उनके वचनों से आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया।