चेन्नई. जैन धर्म दिवाकर आचार्य आत्माराम म न केवल जैन के अपितु जन-जन की आस्था के आयाम थे। वे ज्ञान के सूर्य थे। कौन से आगम में क्या लिखा है सब उनकी स्मृति में स्थाई रूप से सुरक्षित था। इसीलिए संतजन व विद्वान लोग उन्हें चलते फिरते पुस्तकालय कहा करते थे। हर आगम की पृष्ठ संख्या, पंक्ति नंबर व गाथा – श्लोक तक उन्हें हृदयंगम था। यह विचार- ओजस्वी प्रवचनकार डॉ. वरुण मुनि ने जैन भवन साहुकारपेट में सभा को संबोधित करते हुुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा आज हिंदी महीने के अनुसार भादवा सुदी द्वादशी है। आज ही के दिन पंजाब प्रांत के जालंधर जनपद के राहों ग्राम में आत्मा राम जी म. का अवतरण हुआ।
जब वे मात्र 2 वर्ष के थे तो माता-पिता का देहावसान हो गया। 8 वर्ष की आयु में वे आचार्य मोतीराम जी म.की चरण शरण में आए और 12 वर्ष की अल्प आयु में उन्होंने सन्यास जीवन धारण किया। अनेक प्रकार के जप-तप, स्वाध्याय, साधनाओं के द्वारा वे साधना की इतनी उच्च अवस्था में पहुंच चुके थे कि लुधियाना में बैठे-बैठे ही जर्मन, अमेरिका, जापान, चीन, कनाडा तक की घटनाओं को सहज ही जान लेते थे। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंहजी, प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू जी, मोरार जी देसाई महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे बड़े- बड़े राजनेता, धर्मनेता, अभिनेता भी उनके दर्शन करने व आशीर्वाद लेने समय – समय पर आते रहते थे।
जैनाचार्य आत्माराम म.का जब छाती के कैंसर ऑपरेशन हुआ तो बिना बेहोशी के उन्होंने सर्जरी करवाई और मुंह से ऊफ तक न की। आचार्य भगवन ने अपने जीवन काल में लगभग 60 से अधिक ग्रंथों का लेखन व संपादन किया। लगभग 18 आगम ग्रंथों पर उन्होंने सुविशाल हिंदी टीकाएं- व्याख्याएं लिखी। चांद की चांदनी में आगम लेखन करते-करते उनके आंखों की रोशनी चली गई परंतु भीतर ज्ञान रोशनी जागृत हो गई वे भविष्य की घटनाओं को बंद आखों से ही जान लेते थे। सच में वे जैनागम रत्नाकर एवं युग प्रधान आचार्य सम्राट थे। उनके संयम- साधना को हम सादर करते नमन हैं। उप प्रवर्तक पंकज मुनि के मंगलपाठ द्वारा धर्मसभा का समापन हुआ। भीलवाड़ा से भी भाई-ब बहनों ने प्रवचन श्रवण एवं गुरु दर्शन का लाभ लिया।