जैन धर्म का सर्व श्रेष्ठ पर्युषण पर्व के समापन पर आयोजित होने वाले सम वत्सरी पर्व को क्षमापना पर्व के रूप मे मनाते हुए डाक्टर राजेन्द्र मुनि जी ने इस अवसर पर साल भर मे जो भी आपसी मन मुटाव हुए हो उसे समाप्त करने की प्रेरणा दी! जैन इतिहास मे इस पर्व को पूर्णतः आत्मिक पर्व माना गया है! जीवन मे जो भी छोटे बड़े सालभर मे लगे दोषों की इस अवसर पर स्वतः प्रेरित होकर आलोचना की जाती है मानव मन स्वभाव वश हमेशा अन्यो की आलोचना करने व सुनने मे लगा रहता है प्रभु महावीर ने इसके विपरीत स्व के द्वारा ही अपने लगे दोषों की आलोचना का विधान किया है!
इसी के साथ जो भी अमर्यादित जीवन जीया है जीवन मे स्वभाव के चलते खाने पीने बोलने चालने व्यपार व्यासाये मे जो भी अतिक्रमण किया हो तो इस दिन विशेष प्रतिकर्मण कर के मिच्छामि दुक्डम दिया जाता है! आज के दिवस पर स्वधर्मी सेवा के लिए जीवदया व मानव मात्र के कल्याण के लिए प्रतेक जैनी अपनी भावना के अनुसार दान राशि प्रदान करते है एवं विशेष रूप से उपवास बेले तेले अठाई आदि करने वाले भाई बहन रात्रि शयन धर्म स्थानक मे करके रातभर धर्म चिंतन स्वाध्याय संवर की आराधनाये सम्पन करते है!
मुनि जी ने क्षमा के महत्व को बतलाते हुए राजा उदयन का उदारहण प्रस्तुत करते हुए कहा इसी क्षमापना हेतू राजा ने दुश्मन राजा को अपना जीता हुआ राज्य देते हुए उसे बन्धन मुक्त करके क्षमा मांग कर आत्म कल्याण किया! सभा मे साहित्यकार श्री सुरेन्द्र मुनि द्वारा प्रारम्भ मे अंतगढ़ सूत्र का विविध कथानको द्वारा समापन किया! जैन स्कूल व विविध लोगों द्वारा धार्मिक नटिकाये व संगीत गीत प्रस्तुत किए गए!
समाज के प्रधान महेश जैन ने एवं महामंत्री उमेश जैन आदि ने सामाजिक गतिविधिओं का उल्लेख करते हुए दान दाताओ का महावीर युवक मण्डल व गौशाला कमेटी जैन स्कूल संचालक प्रमोद जैन पुरषोत्तम जैन मक्ख़न जैन विमल जैन व पुशपिंदर जैन आदि का आभार व्यक्त किया समारोह मे जैन ध्वज का ध्वजरोहन महिला मण्डल व युवती मण्डल के सदस्यों द्वारा किया गया एवं अन्त मे आलोचना पाठ व विविध प्रत्याखन व सूचनाएं प्रदान की गई! दिनांक 13सितम्बर को कलयुग के कल्प बृक्ष भक्तामर को 48 दिवसीय कार्यक्रम प्रारम्भ होगा!








