रायपुरम जैन भवन में विराजित पुज्य जयतिलक जी म सा ने बताया कि अनादिकालीन से यह आत्मा कर्मो से बंध होकर चार गति में भ्रमण कर रही है। भव्य जीवों का एक ही परम लक्ष्य है मोक्ष वासी बनना जिसके लिए कर्म निर्जरा ही एक मात्र मार्ग है। जीव आठ कर्मो के बंधन तोड कर उधर्वगामी बन जाए। एक बार सिध्द शीला पर विराजमान फिर से संसार में नहीं आता है।
शास्वत शुख की प्राप्ति के लिए तप के 12 भेद प्रशस्त किया! सामर्थ्यनुसार जीव एक तप भी प्रयाण कर ले जीव मोक्ष मार्गी बन सकता है! आज संसार में अनसन को मात्र तप मानते है कि शेष 11 प्रकार के तप का जो अनुशरण करता भी मोक्ष गामी बनता है! यदि मुर्च्छा है अनासक्ति है तो खाते पीते भी तप हो सकता है! द्रव्य क्षेत्र काल भाव के अनुसार तप को धारण करें। जिससे अनासक्ति बड़ेगी फिर आप अनासक्त भाव से कर्म करते हुए भी निर्जरा होगी। शांत मन प्रसन्न चित्त से जो भोजन ग्रहण कर ले तो वह तपस्वी है।
भूख से कम खाता है तो वह उनोदरी तप है तीसरा तप है भिश्राचर्या :- भिक्षा का अर्थ है लाज शर्म छोड़ कर भाँगना है। कोई दीनता से मांगा, तड़पता हुआ माँगा, दुःखी होकर किंतु यहाँ इस भिक्षा का उल्लेख नहीं है! यहाँ पर साहूकार पना से भिक्षा मांगना है। मिले तो ठीक नहीं मिले तो समभाव में रहना है! भगवान ने भिक्षाचर्या में भी कर्म निर्जरा बताई। क्योंकि वह आरम्भ समारम्भ 18 पाप के त्यागी होने के कर्म निर्जरा होती है किन्तु शरीर निर्वाह के लिए भोजन आवश्यक है। अत: मुनिराज के लिए बताया गवेषणा।
गवेषणा सात प्रकार के काल, भाव, गर्णषणा, परिभोगेषना, उपयोगेषना। आठ तरह के भिक्षाचरी जो मिले उसे ग्रहण करते है। जिस काल में गवेषणा का समय है उसी मे जाये। अभिग्रह धारी मुनिराज बेकाल में भी गोचरी जा सकते हैं। एषनीय, प्रासुक निर्दाश आहार लाता है एवं ग्रहण करने से आठ कर्मो की निर्जरा होती है।
जिस काल में जिस क्षेत्र में अवसर है उस समय आहार की गवेषना करो ! यदि आहार न मिला तो उपवास कर लो। कम मिले तो उनोदरी कर लो। जिस दिन अन्तराय होगी उस दिन सब कुछ मिल जायेगा। दान के तीन प्रकार है! सुपात्रदान, अनुकम्पा दान, साधर्मिक दान।
यह जानकारी गौतमचंद खटोड़ ने दी।