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जिनवाणी को श्रवण करने से आत्मा कर्म मुक्त होने लगती है: जयतिलक मुनिजी

जिनवाणी को श्रवण करने से आत्मा कर्म मुक्त होने लगती है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि चार गति पांच जाति और छह काय में आत्मा अनादिकाल से भटक कर दुःख भोग रही हैl जिनेश्वर ने फरमाया संसार दुखों का सागर है चाहे आप कोई भी सांसारिक प्रकृति करो आपको दुख ही मिलेगा। परन्तु जिनेश्वर की वाणी सांसारिक दुखों से छुटकारा पाने का सुख दायक मार्ग प्रशस्त करती है। जिनवाणी श्रवण करने मात्र से जीव धर्म में रमण करने लगता है। जिसकी वाणी तन, मन सब धर्म से युक्त बन जाते है वहाँ सभी दुःख अपने आप नष्ट हो जाते हैं।!

जिनवाणी को श्रवण करने से आत्मा पर लगे हुए कर्म क्षीण होने लग जाते‌ जाते हैं जिससे आत्मा कर्म मुक्त होने लगती है और आत्मा को सुख की प्राप्ति होने लगती है। जिनवाणी श्रवण करने वाले‌ को अलग से तंत्र मंत्र की आवश्यकता नहीं पड़ती। नरक में जाने वाला जीव जिनवाणी श्रवण करके देव गति जाने वाला बन जाता है। जिन‌वाणी श्रवण करने वाला साधक पापी से पापी जीव होते हुए भी पापों से निवृत होने लगता है । जो पूर्व रुप से 18 पापों का त्याग नहीं कर पाता वह साधक अपने‌ जीवन को मर्यादित कर लेता है। सभी दुःखो से मुक्ति पाने के लिए जिनवाणी संसार में प्रकट हुई ।

इसका उच्चारण करने वाला कोई भी हो पर ये वाणी तो तीर्थदाता तीर्थकंर की है। जिन्होने स्वयं तीर्थ होने का अनुभव किया और ये वाणी प्रकट की। छोटे -2 बालको को भी यही जिनवाणी श्रवण कराई जाए तो वे पापों को समझ कर नवकारसी, पोरसी, जमीकन्द, रात्रि भोजन त्याग के लिए तैयार हो जाते है। सामायिक करने के लिए तत्पर हो जाते है और ज्यादा धर्म ध्यान‌ करते हुए कषायमंद हो जाता है और दीक्षा लेने के लिए भी लालायित हो जाता है। जिनवानी पर श्रद्धा करने से रोहिणी जैसा चोर भी सयंम का अधिकारी बन जाता है।

फिल्मी गीत एक बार सुनते ही याद हो जाता है पर जिनवाणी याद नहीं रहती क्योकि फिल्मी गीत पुरे मन से सुनते हैं जिनवाणी पर अटल श्रद्धा नहीं होती। जिन‌वाणी में वो शक्ति है जो सोये हो जीव को धर्म में लगा देती है। ये चिन्तन करो कि जिनवाणी हमें किसे मार्ग में चलने की प्रेरणा दे रही है और हम किस मार्ग पर चल रहे है। जो संसार में तो है पर जिसके भीतर संसार नहीं उसके क्रुर कर्मा का बन्ध नहीं होता । छोटी मोटी क्रियाओ से भी धर्म आत्मा में अंकुरित होता है और आगे चलकर मोक्ष रूपी फल को प्राप्त करता है। नमस्कार महामंत्र जाप के कलश लाभ श्रीमती इंदिरा बाई जी- सुरेश सा संचेती परिवार ने लियाl

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