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चित्त और मन की निर्मलता के लिए ध्यान का प्रयोग करें

चित्त और मन की निर्मलता के लिए ध्यान का प्रयोग करें

बालोतरा. आज पर्युषण पर्वाधिराज का सातवां दिवस ध्यान दिवस के रूप में मनाया गया। इस विशेष अवसर पर मुनिश्री मोहजीत कुमारजी ने फरमाया कि जैन परम्परा में भगवान महावीर ध्यान के महान प्रयोक्ता थे। उन्होंने अपने दीक्षा काल मे ध्यान की उत्कृष्ट साधना की ।उनकी उत्तरवर्ती आचार्य परम्परा में कई आचार्य एवं मुनि ध्यान के विशिष्ट साधक हुए हैं। ध्यान का अर्थ-अपने आपको देखना। अपने शरीर, मन, भाव और आत्मा के सूक्ष्म स्पन्दनों को देखना और जानना। शुद्ध ध्यान से मनुष्य के भावों में परिवर्तन संभव है। ध्यान के द्वारा आत्मशुद्धि कर मोक्षत्व को प्राप्त कर सकता है।

आचार्य महाप्रज्ञ ने 20 वर्ष तक ध्यान की विशिष्ट साधना कर उसको प्रेक्षाध्यान के रूप में जनमानस को दिया। प्रेक्षा ध्यान को साधने के लिए काया की स्थिरता जरुरी है। ये विचार पर्युषण पर्व आराधना के ध्यान दिवस पर मुनि मोहजीत कुमार ने प्रकट किए। मुनि मोहजीतकुमार ने भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा को 26 वें भव तक कर्मों के उतार चढाव का वर्णन कर जन मानस को संबोध प्रदान किया। मुनि भव्य कुमार ने उत्तराध्ययन सूत्र के चित्र संभूत प्रसंग को सरसता से प्रस्तुत किया।

मुनि जयेश कुमारजी ने तीर्थंकर पार्श्वनाथ के जीवन वृत के गूढ़ रहस्यों को प्रकट करते दुए जयाचार्य द्वारा रचित गीत के पद का संगान किया। तेयुप से नवीन सालेचा ने बताया कि इस अवसर पर तपस्या के क्रम 80 से अधिक जनों ने बड़ी तपस्या का प्रत्याख्यान किया। नगर परिसर में लगभग 100 वर्षीतप का क्रम निर्बाध गति से चल रहा है। सभा अध्यक्ष धनराज ओस्तवाल एवं मंत्री महेन्द्र वैद ने आवश्यक जानकारियां दी। इस अवसर पर वृहद संख्या में तेरापंथ श्रावक समाज उपस्थित हुआ।

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