गंगा से बढ़कर पवित्र पानी नही, आत्म ग्लानि से बढ़कर कोई ग्लानि नही। सुनी तो है बहुत सी वाणी लेकिन जिनवाणी से बढ़कर कोई वाणी नही। जिनवाणी एक दर्पण के समान है जैसे दर्पण हमारे अस्त व्यस्त कपड़े शरीर के दाग धब्बे दिखा देता है वैसे ही जिनवाणी का जिसने चिंतन मनन कर लिया और उसमें गहरे उतर गए तो वह व्यक्ति अपने अंदर के पाप रूपी दागों को स्वयं देख सकता है।
आदि व्याधि और उपाधी को जिनवाणी समाप्त कर सकती है । आदि मतलब मानसिक दुख/पीढ़ा/तकलीफ व्याधि मतलब शारीरिक बीमारी और उपाधि मतलब पारिवारिक दुःख ॐ ऋम श्रीं क्लिम नमो लोए सव्व साहूणं का जाप करने से आदि व्याधि उपाधी दूर हो सकती है। जिनवाणी का गहराई से अध्य्यन सभी दुखों को दूर करता है । शिक्षक जीवन बनाता है, डाक्टर जीवन बचाता है, जिनवाणी जीवन सँवारती है । जिस प्रकार बीमार को डाक्टर कड़वी गोली देता है तो व्यक्ति बेमन से लेता है फिर भी ठीक हो जाता है, वैसे ही जिनवाणी मन से सुनो या बेमन से हमेशा फायदा ही करती है।
जिस पिता ने अपने बेटे को अंतिम समय में बेटे से यह वचन माँगा था की जीवन में कभी भी महावीर की वाणी मत सुनना वो खानदानी चोर परिवार था, वो बेटा भी राजगिरी नगरी का कुख्यात चोर बन गया। उसका आंतक पूरी नगरी मैं फैल गया। प्रजा ने राजा श्रेणिक से गुहार लगाई। राजा श्रेणिक ने उस चोर को पकड़ने का जिम्मा अपने सबसे बुद्धिमान मंत्री अभयकुमार को सौंपा।अभयकुमार चोर को सबूत के साथ पकड़ने के लिये मायाजाल की तैयारी करता है।
चोर बचने के लिये नगर को छोड़ने के लिए मुख्य रास्ते से न होकर शार्टकट से निकलने का प्रयास करता है। उस वक्त राजगिरी में गुणशील उद्यान में प्रभु महावीर की देशना चल रही थी। जिसमें प्रभु फ़रमा रहे थे की कर्मों के आघार पर आत्मा की चार गति होती है नरक, तिर्यंच, मनुष्य एंव देव । देवों का वर्णन करते हुए वह आगे फरमाते है की जो मनुष्य भव में अच्छे कर्म का उपार्जन करता है दान शील तप भाव करता है उसके कर्मों की निर्जरा होती है और वो पुण्यानुबंधी पुण्य की सहायता से वह देवगति को प्राप्त करता है । सभा में से एक श्रावक प्रश्न पूछता है की सामने मनुष्य और देव हो तो उनको पहचानेंगे कैसे कैसे पता लगेगा की यह देव है। उस चोर के साथ आगे क्या घटनाक्रम होता है यह अगले प्रवचन में सुनने पर पता चलेगा।
शतावधानी पूज्या श्री कीर्ति गुरु मसा ने फरमाया की फूल और पेड़ का बड़ा होने में बहुत कठिन संघर्ष करना पड़ता है, जो कोई उस संघर्ष को समझ ले उसकी दृष्टि बदल जाती है, जीवन जीने का नजरिया बदल जाता है। कलाकार की दृष्टि विशिष्ट होती है। नयसार उत्कृष्ट कलाकार था और वँहा का राजा कलाप्रेमी थी, वो अपने लिए ऐसी कलाकृति चाहता था जो और किसी के पास न हो, दुर्लभ हो, अनुपम हो, सभी कलाकारों ने कहा ऐसी कलाकृति नयसार बना सकता है। राजा ने नयसार को बुलवाया और अपनी मंशा बताई, नयसार अपनी प्रशंसा सुनकर गर्वित हो गया और अहंकार में बोला ये कार्य में अकेले कर दूँगा।
जँहा अहंकार आ जाता है वँहा पतन निश्चित है, दूसरे कलाकार सोचने लगे की हमने नयसार को आगे बढाया और अब इसे अभिमान आ गया। वो सब नयसार को अब अपना प्रतिद्वंदी मानने लगे। नयसार घर आया और गर्वोक्ति पूर्वक अपनी पत्नि को सब बात बताई, पत्नि समझदार थी, उसे पता था की नयसार को घमण्ड आ गया है । नयसार अपनी रंगशाला में उस विशिष्ट कार्य में रम गया। 6 महीने बीत गए। उसके साथी कलाकार जो उससे द्वेष रखते थे, उन्होंने राजा से कहा की नयसार का कार्य कँहा तक पँहुचा देखना चाहिए, राजा ने नयसार को सन्देशा पंहुचाया की कल सुबह कार्य की प्रगति को देखना है। नयसार ने अपनी पत्नि को यह बात बताई, पत्नि ने कहा भोजन बनने के पहले आधा अधूरा भोजन मैं तो नही परोसती हूँ, लेकिन नयसार नही माना।
रातों रात षयन्त्रकारियों के ने अपना काम कर दिया। सुबह जब राजा रंगशाला आया और कलाकृतियों से पर्दा हटाया तो किसी मूर्ति की आँख गायब, किसी के हाथ किसी के पैर गायब सबकी सब खंडित। राजा ये देखकर बहुत क्रोधित हुआ, नयसार ने बहुत सफाई दी रोया, गिड़गिड़ाया लेकिन राजा ने उसे शाम तक नगर की सीमा छोड़ने का आदेश दे दिया । घर पंहुचकर पत्नि को रोते हुए सारी बात बताई और कहने लगा मैने किसी का क्या बिगाड़ा था, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ अब मुझे नही जीना है में आत्महत्या कर लूँगा। पत्नि ने उस वक्त कुछ नही कहा उसने पोटली में 4 रोटी रखी और घर से निकल पड़े नगर सीमा को छोड़ने के लिये। अब आगे कँहा जाते है क्या होता है क्या नयसार आत्महत्या करेगा ये सब आगे पता चलेगा।