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खुद की नजर बिगड़ी हो तो ही खुद का काम बिगड़ सकता है

खुद की नजर बिगड़ी हो तो ही खुद का काम बिगड़ सकता है

ऊपर चढ़ने के बाद नीचे गिरने वाले को दुःख होता है न की बाहर की बाते सुनाने वाले को। नयसार को कई लोगों ने टोने टोटके बताए, लेकिन सब बाहरी टोटके बता रहे है, कोई भी अंदर का टोटका नही बता रहा है। नयसार असफल हो चुका है वो रो रहा है, अपनी पत्नि से कहता है की मैने किसी का क्या बिगाड़ा था, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ। खुद की नजर बिगड़ी हो तो ही खुद का काम बिगड़ सकता है खुद की नजर अच्छी है तो कोई कुछ नही बिगाड़ सकता है। चार रोटी पोटली में बाँधकर नयसार और उसकी पत्नि घर छोड़कर निकल पड़ते है, नयसार के मन में आत्महत्या के भाव लगातार चल रहे है ।

चलते चलते दोपहर के वक्त वो एक सुनसान जंगल में पँहुच गए, एक पेड़ के नीचे सुस्ताने के लिए बैठे पत्नि ने कहा मुझे भूख लगी है आप रोटी खाओगे तभी में खाऊँगी। नयसार कहता है न तो मुझे खाना है न जीना है मुझे केवल मरना है । शिवा उसे समझाती है की जो हुआ उसे भूल जाओ मरना बहुत मुश्किल है। इतने में नयसार की नजर सामने पड़ती है तो भरी दोपहर में साधुओं का टोला दिखाई देता है। नयसार उनके आभामंडल से प्रभावित होकर उनकी और गया और उनके सामने नतमस्तक हो गया। संतो से जंगल में आने का कारण पूछा तो सन्त बोला हम आहार के लिए निकले थे लेकिन आहार नही मिला दोपहर हो गई और हम रास्ता भी भटक गए है।

नयसार ने कहा आइए मैं आपको आहार बहराता हूँ, वो सुपात्रदान को नही समझता था, लेकिन फिर भी उसने एंव उसकी पत्नि ने वो चार रोटी बड़े प्रेम से उन्हें बहराइ । और उन्हें जंगल से निकलने का रास्ता भी समझया। सन्तो ने नयसार से उसकी उदासी का कारण पूछा, पत्नि ने पूरी बात बताई। नयसार ने सन्तो को रास्ता बताया अब सन्त नयसार को रास्ता दिखाते है की गलती तुम्हारी है, तुम्हारे भीतर अहंकार आ गया था, और उस अहंकार में वशीभूत होकर ही अकेले सब कार्य करने की ठानी थी। अब पुनः सबको साथ में लेकर चलो तो बिगड़े हुए कार्य फिर से बन जाएंगे। इस प्रकार सन्तो ने नयसार को सदज्ञान दिया अब आगे क्या होता है, नयसार आत्महत्या करेगा, कलाकारी करेगा या संयम ग्रहण करेगा। ये समय आने पर पता चलेगा।

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