जालना : दुखी आत्मा को दया मिले तो कितना अच्छा है. दुःख में डूबी आत्मा स्वभाव से ही दुखी हो जाती है| लेकिन ऐसे जीवन को महत्व देना करुणा कहलाता है| करुणा हम में भी प्रकट हो, आत्मा में शांति के बिना नहीं रहेगा, उपदेश डॉ, श्री. गौतम मुनिजी म.सां उन्होंने यहां बात की| वे गुरु गणेश नगर के तपोधाम में चातुर्मास के अवसर पर आयोजित प्रवचन को संबोधित कर रहे थे| इस समय, आदरणीय वैभवमुनिजी म.सां, उपदेश प्रभावक श्री. दर्शन प्रभाजी म.सां, सेवाभावी श्री गुलाबकंवरजी म.सां, सेवाभावी श्री हर्षिताजी म.सां, यह मौजूद थे|
आगे बोलते हुए, डॉ. श्री. गौतम मुनिजी म.सां,उन्होंने कहा कि करुणा की भावना सभी धर्मों को पवित्र करती है| हिंसा करुणा पैदा नहीं कर सकती, लेकिन करुणा हिंसा को नहीं रोक सकती| करुणा की भावना हर जीव के लिए समस्या नहीं है| घर में अक्सर वाद-विवाद होता रहता है| परन्तु जिस घर में करुणा वास करती है, वह तब तक नहीं रहता, जब तक वह शुद्ध और पवित्र न हो| भगवान भी करुणा के अवतार हैं| वे कहते हैं कि जानवरों और पार्टियों को मत मारो और हमें इसे लागू करना चाहिए, करुणा की भावना आत्मा को भगवान बनाती है| भागवत ने करुणा पर बहुत कुछ सिखाया है| हम कुछ ग्रंथों को पढ़ रहे हैं, विचार कर रहे हैं और सोच रहे हैं|
कोई यह न कहे कि हम जानवरों से गए हैं| साधु और साधना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं| लेकिन आप किस पक्ष को चुनेंगे? यह एक वास्तविक प्रश्न है, पी. ईसा पूर्व डॉ| गौतम मुनिजी एम. सा कहाङ्गइससे पहले, परम पावन वैभवमुनिजी एम| सा कल के आज के विषय पर संक्षेप में चर्चा की| उन्होंने कहा कि साधु के जीवन में आज्ञाओं का पालन करना पड़ता है| धर्म साधना को इस आवश्यकता को पूरा करना चाहिए| क्या अतिरिक्त धन को अपने पास रखने से कोई लाभ है? हमें केवल वही रखना चाहिए जो आवश्यक हो| अतिरिक्त पैसे रखने से यह आपके साथ नहीं आएगा| साधु का जीवन स्वच्छ और पवित्र होता है| जिससे भवन, स्टेशन नहीं बनते| उन्हें रत्नों की भी आवश्यकता नहीं है| वे अपने बड़ों द्वारा दिए गए आदेशों का पालन करना अपना सर्वोच्च धर्म मानते हैं| वे गेहूं या चावल का भंडारण नहीं करते हैं| आप कितना भी कमा लें, वह साथ नहीं आएगा| तो जमाखोरी पर जोर क्यों? साथ ही डब्ल्यू. ईसा पूर्व वैभवमुनिजी म.सां, कहा| इस समय श्री. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ कीे पदाधिकारी, श्रावक-श्राविका बड़ी संख्या में उपस्थित थे|