जैन संत डाक्टर राजेन्द्र मुनि जी नेआदिनाथ भगवान की महिमा का वर्णन करते हुए कि भगवान के गुणों को श्रवण करके हम भी जीवन मे गुणों को ग्रहण करें! लेकिन इन्सान बातें तो पुण्य कि करता है पर कार्य पाप को बढ़ाने वाले करता रहता है! भला किसान अनाज की खेती कर के अंगुर का फल पाना चाहे तो कैसे संभव होगा, हम जैसे बीज बोते है वैसे ही फल प्राप्त होते है! हम जैसा खाना खाते है शरीर मे उसका परिणाम भी वैसा नजर आता है! माइक मे जैसा बोला जाता है वो ही आवाज़ जनता को सुनाई देती है!
लोगों को सुख आराम दोगे तो हमें भी सुख आराम मिलेगा जैन दर्शन की स्पष्ट मान्यता है कि हमारा ही किया दिया हुआ कष्ट या सुख पुन : लौटकर हमें प्राप्त होता है! व्यर्थ मे इन्सान अच्छा परिणाम का कर्ता स्वयं को मान लेता है एवं बुरा फल दूसरों का देने वाला मानता रहता है! यही हमारी अज्ञानता मूढ़ता है!महापुरषो ने तो यहाँ तक कहा जो कुछ है वो मेरा है इस भव का या पूर्व भव का परिणाम है! सभा मे साहित्यकार श्री सुरेन्द्र मुनि जी द्वारा आराध्य देव भगवान आदिनाथ माता चक्रश्वरी देवी का जीवन महत्व बतलाया एवं उनके सद्गुण जीवन मे धारण करने की प्रेरणा प्रदान की! मन्त्री पुष्पइंडर जैन द्वारा सूचना व स्वागत किया गया!




