आज विजयनगर स्थानक भवन में जैन सिद्धांताचार्य साध्वी श्री प्रतिभाश्री जी ने अपने प्रवचनों में तीर्थंकरों की स्तुति पर आगे और विस्तृत वर्णन करते हुए बताया कि तीर्थंकर अनंताबली आत्माएं होती है। तीन लोक में भी इनके बल की कोई बराबरी नहीं कर सकता है पर तीर्थंकर कभी भी अपने बल का प्रयोग नहीं करते हैं। तीर्थंकर जन्म से ही अनन्त ज्ञान लेकर व शुद्ध परिवार में ही जन्म लेते है।श्रद्धा व भक्ति से की गयी तीर्थंकरो की स्तुति से सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है।
साध्वी दीक्षिताश्री जी ने आगमों के द्ववारा जैन सिद्धान्तों की व्याख्या की।
साध्वी प्रेक्षाश्रीजी ने मद के बारे में बताते हुए कि तप में मनुष्य को मद नहीं करना चाहिए।बड़ी से बड़ी महात्माओं द्ववारा की गयी तपस्याएँ भी मद आ जाने से निरर्थक हो गयी,इसी प्रकार ज्ञान बढ़ने पर भी व्यक्ति को अहंकार नहीं करना चाहिए ज्ञानी होने पर व्यक्ति को विनयवान बनना चाहिए।उसी तरह धन बढ़ने पर भी मद नहीं बढ़ने देना चाहिए।धन बढ़ने पर उससे लोगों का भला करना चाहिये।आगे बताते हुए की माया भी दुःखो की जननी है।मायावी मनुष्य की तुलना बगुले से करते हुए बताया कि बगुला सफेद आकर्षक व एक जगह शांत स्थिरता रखते हुए खड़ा रहता है।लेकिन ज्योंहि अपना शिकार पास में दिखता है और वह इस पर झपट्टा मार देता है।उसी तरह मायावी व्यक्ति सिर्फ मौके की तलाश करता है।इन सभी मदों से ग्रसित व्यक्ति त्रियन्च गति को जाता है।संघ के मंत्री कन्हैया लाल सुराणा ने ता 26 से 28 जुलाई के त्रिदिवसीय कार्यक्रमो के आयोजन की जानकारी देते हुए कि केवल मुनि जी की जन्मजयंती सामुहिक एकासन से तथा ओसवाल संघ स्थापना दिवस पर सहजोडे जाप व विशिष्ट प्रवचन तथा 28 जुलाई को आनंद जाप के साथ सामायिक दिवस के रूप में आचार्य आनंदऋषि जी म सा के जन्मजयंती पर उनका गुणानुवाद किया जाएगा।