मंगलवार 24 अक्टूबर से लालगंगा पटवा भवन में गूंजेंगे महावीर के अंतिम वचन
आज के लाभार्थी परिवार : श्रीमती कांतादेवी धरमचंदजी पटवा परिवार व श्रीमती प्रेमलता राजीवजी तातेड़ परिवार दिल्ली
Sagevaani.com/रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि मनुष्य को मंजिल तब मिलती है जब दिल, दिमाग और पाँव एक ही रास्ते पर चलते हैं। इसलिए दिल में परमात्मा का अस्तित्व, दिमाग में परमात्मा के वचन रहना चाहिए।
अगर दिल-दिमाग में प्रभु बस गए तो पाँव भी प्रभु के पास चल पड़ेंगे। लालगंगा पटवा भवन में सोमवार को उपाध्याय प्रवर श्रुतदेव आराधना कैसे करें और परमात्मा का निर्वाण कल्याणक कैसे मनाएं इस पर चर्चा कर रहे थे। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि आराधना तभी संपन्न होती है जब श्रद्धा होती है। स्वाध्याय बिना श्रद्धा के हो जाता है, इसके लिए श्रद्धा के आवश्यकता नहीं है। ज्ञान बिना श्रद्धा के मिल सकता है, लेकिन यह ज्ञान नर्क ले जाता है। ज्ञान जितना होता है, उतनी ही ऊपर उठने की संभावना रहती है, और उतनी ही नीचे गिरने की संभावना रहती है। अगर श्रद्धा के साथ ज्ञान है तो व्यक्ति प्रभु के चरणों में है, और यदि बिना श्रद्धा का ज्ञान है तो व्यक्ति अहंकार की खाई में है। स्वाध्याय करने से ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी।
उपाध्याय प्रवर ने कहा कि जब परमात्मा से पूछा गया कि श्रुत की आराधना करने से क्या होता है? तो उन्होंने कहा कि अज्ञान समाप्त हो जाता है और संक्लेश नहीं होता है। श्रुत आराधना से मन में दुःख नहीं रहता है। यह तय नहीं है कि स्वाध्याय करने से अज्ञान जाएगा, लेकिन श्रुत आराधना से अज्ञान चला जाता है। जो जितना ज्यादा बुद्धिमान रहता है, उतना क्लेश का ज्ञानी भी रहता है। लेकिन जो श्रुत आराधना करता है उसका अज्ञान और क्लेश समाप्त हो जाता है। स्वाध्याय में कई नियम हैं, लेकिन श्रुत आराधना में नहीं है। जैसे एक पंडित की पूजा और एक भक्त की पूजा में अंतर रहता है, वैसे ही स्वाध्याय और श्रुत आराधना में अंतर है। भक्त को शास्त्र का ज्ञान नहीं रहता है, लेकिन अपनी भक्ति के बल पर वे परमात्मा के पास पहुंच जाते हैं।
भक्ति, आराधना में कोई नियम लागू नहीं होते हैं। परमात्मा ने कहा है कि जब मतलब समाप्त हो जाएगा तभी भक्ति में आनंद आएगा। इसलिए भक्तों के लिए श्रुतदेव आराधना है। आराधना के लिए कोई समय की पाबन्दी नहीं है। परमात्मा से मुलाकात के लिए कोई मुहूर्त नहीं होता है। आगम परमात्मा की वाणी है, और परमात्मा के वरदान 24 घंटे ले सकते हैं। आराधना कभी भी की जा सकती है। श्रुतदेव परमात्मा है, परमात्मा का वरदान है, इसलिए इसकी आराधना होती है। श्रुतदेव आराधना परमात्मा के अंतिम वचन हैं, यह जैनियों के लिए पवित्र ग्रंथ है। बिना बोध के मुक्ति नहीं होती है, एक आस्था का अहोभाव जगाने का अनुष्ठान है श्रुतदेव आराधना।
उपाध्याय प्रवर ने कहा कि देवताओं के पास अवधि ज्ञान होता है, वे स्वर्ग में बैठे बैठे जान सकते है कि महावीर क्या बोल रहे हैं। लेकिन वे नीचे आते हैं, क्यों? ज्ञान आ सकता है, लेकिन महावीर की लेश्या नहीं आ सकती। इसलिए देवता भी महावीर की सभा में आते हैं। धर्मसभा में केवली भी बैठते हैं।
ज्ञानी हैं, सर्वज्ञ हैं, लेकिन वे भी महावीर की शरण में उनकी वाणी को ग्रहण करने आते हैं, क्यों? शमोशरण का जो आनंद हैं, वो केवल तीर्थंकर के सानिध्य में ही मिल सकता है। प्रभु की शरण में भक्ति भाव जाग जाते हैं। देवों को जो सुख स्वर्ग में नहीं मिल सकता, वो सुख तीर्थंकर के शमोशरण में मिलता है। उन्होंने कहा कि 24 अक्टूबर से 13 नवंबर तक धर्मसभा में कोई जयकारे नहीं लगाए जायेंगे, यहाँ केवल परमात्मा का ही वंदन होगा। परमात्मा को छोड़ किसी और की आराधना नहीं होगी, किसी और का वंदन नहीं होगा। सभा में श्रद्धाभाव रहे, बुद्धि भाव नहीं रहेगा। बुद्धिभाव से संसार मिलता है और अहोभाव से परमात्मा। यह अनुष्ठान अहोभाव से संपन्न होगा। 21 दिनों तक हम परमात्मा के समोशरण में रहेंगे और उनके चरणों में वंदना करेंगे।
रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने कहा रायपुर की धन्य धरा पर 24 अक्टूबर से ‘उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना’ प्रारंभ हो रही है। 24 अक्टूबर से 13 नवंबर तक उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना होगी जिसमे भगवान महावीर के अंतिम वचनों का पाठ होगा। यह आराधना प्रातः 7.30 से 9.30 बजे तक चलेगी। उन्होंने सकल जैन समाज को इस आराधना में शामिल होने का आग्रह किया है। उन्होंने बताया कि 24 अक्टूबर के लाभार्थी परिवार श्रीमती कांतादेवी धरमचंदजी पटवा परिवार व श्रीमती प्रेमलता राजीवजी तातेड़ परिवार दिल्ली हैं। श्रीमद उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के लाभार्थी बनने के लिए आप इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं : ललित पटवा – 9425206200