नवकार मंत्र के पांचों पदों के रंगों की बताई महत्ता
Sagevaani.com @चेन्नई ; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास के शनिवारीय प्रश्नोत्तर में धर्मपरिषद् को सम्बोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने कहा कि सारें रंगों का राजा होता है- सफेद। सफेद रंग निर्दोष, स्वच्छ, दाग रहित होता है, इसलिए अरिहंत को सफेद रंग का प्रतिक मानते है, उन्होंमें किसी भी तरह का दोष नहीं होता। सिद्धों के लिए लाल रंग। लाल रंग स्वस्थता का प्रतिक है। सबसे खतरनाक रोग है कर्मों का, सिद्ध सारे कर्मों से मुक्त हो गए और स्वस्थ आत्मा में आत्मस्थत हो गए। दीपक के ऊपरी ज्योति की तरह वे भी ज्योति में समा गए। लाल रंग वशीकरण का रंग है और सिद्धों ने सभी को वंश में कर ही सिद्धत्व को प्राप्त किया है और हम भी सिद्ध बनना चाहते है, अतः सिद्धों के लिए लाल रंग की कल्पना की जाती है। आचार्य के लिए पिले रंग की कल्पना की जाती है। आचार्य भगवंत संघ के राजा होते हैं।
राजा जैसे सोने के आभूषण पहन कर बैठते थे, उसी तरह आचार्य भगवंत 36 गुणों के आभूषण को पहने रखते हैं। आँखों की रोशनी के लिए हरे रंग का ध्यान किया जाता है, प्रातःकालीन हरे रंग की घास को देखा जाता है। उपाध्याय ज्ञान की रोशनी देने वाले होते है, अतः उसके लिए हरे रंग की कल्पना की जाती है। साधु एक सैनिक है- युद्ध के मैदान पर चल पड़ा है, दीक्षा लेना यानि युद्ध लड़ना। रणभूमि में सैनिक शत्रुओं से लड़ते हैं, साधु भी द्रव्य से नहीं भाव से अपने कर्म शत्रुओं, पापों से, कषायों से लड़ाई करते हैं। सैनिक जैसे हर समय सावधान रहता है कि शरीर पर कोई तीर, हथियार न लगे,उसके लिए वै कवच पहन कर रखते, वे लोहे के बने होते, लौहा काला रंग का होता है। साधु भी पंच महाव्रत रुपी कवच को धारण करता है। झाडू से बाहर का कचरा निकालते समय कभी मुंह काला हो सकता है, उसी तरह साधु भी रजोहरण से भीतर के कचरे को बुहारते है। साधु हर क्रिया जैसे आहार, प्रतिक्रमण इत्यादि से कषायों को दूर करता है।
◆ गलतियों की बनिस्पत गलतफहमियों से होता ज्यादा तनाव
गुरुवर ने कहा कि वर्तमान में परिवार, समाज, संघ, सर्वत्र में गलतियों के कारण तनाव कम होता है, अपितु गलतफहमी के कारण तनाव ज्यादा होते है। लोहा मजबूत होता है, उसी तरह साधु भी हर परिस्थितियों में मजबूती से रहते है। साधु दु:खो को भी प्रसन्नता से सहन करता है। वो यह मानता है कि जो भी दु:ख या सुख मिलेंगे, उसे उसी अपने कर्मों के फल को समझ कर सहन करना है। साधु कभी उछलता नहीं है।
गुरुवर ने कहा कि आत्म शुद्धि के लिए हमारी आचरण शुद्धि और व्यवहार शुद्धि जरूरी है। अन्तर में जयना का भाव रहना चाहिए। हर कार्य को करते हुए हिंसा हो सकती है। अतः भगवान ने कहा कि आप कोई भी कार्य करते हुए यतनापूर्वक कार्य करने से पाप कर्मों का कम से कम बंधन होता है। हमारा व्यवहार स्वयं के प्रति भी शुद्ध रहना चाहिए। कोध्र करते समय हम दूसरों की बनिस्पत पहले स्वयं अपना ही अहित करते हैं। अतः अध्यात्म का मार्ग परम् शुद्ध मार्ग है, उसमें केवल और केवल आत्मा ही है।
समाचार सम्प्रेषक : स्वरूप चन्द दाँती