ज्ञान को आवृत्त करने वाला कर्म- ज्ञानावरणीय कर्म है। आत्मा में सब कुछ जानने की शक्ति होते हुए भी इस कर्म के कारण वह सब कुछ नहीं जान पाती। यह कर्म आत्मा के ज्ञान गुण को नष्ट नहीं करता परन्तु उसी तरह ढक देता है जैसे बादल सूर्य के प्रकाश को ढ़क देते हैं।
इस कर्म के प्रभाव से सुनने व देखने की शक्ति मन्द हो जाती है या बहरापन आना या उनसे प्राप्त ज्ञान की अनुभूति न हो पाना ज्ञानावरणीय कर्म का फल है। सुना हुआ या रटा हुआ ज्ञान विस्मृत हो जाना या पढ़ने-सुनने में चित्त का एकाग्र न हो पाना भी इस कर्म का परिणाम है।
ज्ञान का निरादर करने से और ज्ञान की महत्ता के प्रति विद्रोह करने से यह कर्म बंधता है। ज्ञानी की प्रशंसा सुनकर मन ही मन जलना-कुढ़ना, उनकी प्रकट रूप से निन्दा करना व अफवाहें फैलाना, ज्ञानदाता का नाम छिपाना, ज्ञान प्राप्ति में विघ्न उपस्थित करना और धन या यश बटोरने हेतु ज्ञान की शक्ति का दुरुपयोग करने से भी
इस कर्म का बँध होता है।
ज्ञानावरणीय कर्म के दुष्प्रभाव से बचने के लिए प्रतिदिन नया ज्ञान अर्जित करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। उत्साहपूर्वक अध्ययन-अध्यापन करने से, ज्ञानी-जनों की विनय करने से, ज्ञान के साधनों के प्रति आदर भाव रखने से और निःस्वार्थ भाव से ज्ञान की विशेष आराधना करने से पूर्वबद्ध ज्ञानावरणीय कर्म की निर्जरा होती है।
असहाय जरूरतमन्द को ज्ञानार्जन के साधन वितरित कराने से, ज्ञान के प्रचार-प्रसार हेतु पुस्तकें उपलब्ध कराने से यह कर्म क्षीण होता है इस तरह ज्ञान में निरन्तर पुरुषार्थ करते हुए ज्ञानावरणीय कर्म का सम्पूर्ण क्षय करके केवल (सम्पूर्ण) ज्ञान को प्राप्त करना ही इस कर्म को समझने का सार है।