नवपद की साधना का प्रथम दिन, अरिहंत पद
गत जन्मों के पुण्य से हुआ लक्ष्मी का अर्जन यदि इसे इस जन्म में पाप कार्यों में विसर्जन कर देंगे तो नव जीवन का सृजन कैसे होगा। हमारा आधा जीवन तो सोने में व्यतीत हो जाता है और आधा सोने को बनाने में। हम भूल गए हैं कि इस संसार में विगत जन्मों के संचित पुण्यों को और अधिक तीव्र करना है ताकि हम मुक्ति पथ की ओर अग्रसर हो सके। क्योंकि जीवन का अंतिम लक्ष्य तो मुक्ति ही है। लेकिन हम हमारे जन्म के इस मूल उद्देश्य से भटक गए। धर्म साधना, प्रभु आराधना तथा उपासना करने का न तो समय है और न ही संकल्प। यह दुर्लभ मानव जीवन यूं ही व्यर्थ बहता जा रहा है।
यह विचार शाश्वती नवपद ओली के प्रथम दिन आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने बिन्नी नोर्थटाउन के श्री सुमतिवल्लभ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ में व्यक्त किए. उन्होंने कहा जीवन में अमरता पाने के लिए हृदयरूपी कमल में करुणा रूपी अमृत की प्रथम आवश्यकता है। हमारे सभी अरिहंत परमात्माा में करुणा रूपी अमृत सर्वोच्च गुण के रूप में विद्यमान है। भगवान महावीर के जीवन में सदैव दु:ख देने वाले संगम के प्रति प्रभु ने सदैव करुणा की भावना रखी। संगम ने प्रभु महावीर के पैरों में किले ठोके, प्रभु का आधा शरीर में धरती में उतर गया। छ महीने तक प्रभु को आहार ग्रहण नहीं करने दिया।
फिर भी प्रभु ने संगम के प्रति करुणा का भाव रख कर उसका कल्याण कर दिया।पार्श्वनाथ भगवान ने कष्ट देने वाले कमठ के प्रति सदा समता और करुणा भाव रखा।अन्य ने भी इसी तरह से करुणा बरसाई। यह सभी शास्त्र सम्मत बातें यही सिद्ध करती है कि परमात्मा के जीवन में करुणा सर्वोपरि थी। करुणा, मां महात्मा और परमात्मा तीनों करते हैं। मां कुछ पाने के लिए, महात्मा नाम की भावना से करुणा करते हैं लेकिन परमात्मा की असीम करुणा के पीछे कुछ भी पाने की प्रवृत्ति नहीं होती। क्योंकि अरिहंत परमात्मा का धर्म, प्रकृति एवं स्वभाव ही करुणामय है और जहां पर धर्म, प्रकृति एवं स्वभाव करुणामय हो जाता है। वहां व्यक्ति कुछ भी पाने की लालसा से मुक्त हो जाता है। यही मुक्ति उसे दिव्य मुक्ति की ओर ले जाती है।