बेंगलुरु। यहां अक्कीपेट संघ के तत्वावधान में आचार्यश्री देवेंद्रसागरसुरीश्वरजी ने अपने दैनिक प्रवचन में बुधवार को कहा कि संसार में यह बड़ी विचित्र बात है कि लोग सहज प्राप्त अमृत को ठुकरा कर कठिनता से प्राप्त विष का प्याला पीते हैं। इस लोक में सुख और शांति तथा परलोक में श्रेष्ठतम कर्मों से ही प्राप्त हो सकता है अन्यथा नहीं।
उन्होंने कहा कि धर्माचरण बिना कठिनाई के हो रहा है तो उसकी भी उपेक्षा करेंगे और पापाचरण पूरी कोशिश से करेंगे। देवेंद्रसागरजी बोले, कर्म सिद्धांत पर मनुष्य को पूरा विश्वास हो जाए तो इसके तीन लाभ होंगे।
पहला लाभ यह कि किसी भी सकंट के आने पर वह घबराएगा नहीं। उसके मन में यह निश्चय होगा कि जो कष्ट मेरे ऊपर आया है, वह मेरे ही दुष्कर्मों का फल है तथा मैं इसको भोग कर ही इससे छुटकारा प्राप्त कर सकता हूँ। जब प्रत्येक अवस्था में मुझे यह दुःख भोगना ही है तो फिर रोने-चीखने का क्या मतलब? मुझे धैर्य और साहस से इसका सामना करना चाहिए।
दूसरा लाभ यह होगा कि हम इतने पर ही संतुष्ट नहीं रहेंगे कि कष्ट आया और शांति से सह लिया। अपितु हममें इतनी दृढ़ता आएगी कि हम प्रभु से कष्ट की प्रार्थना भी करेंगे और कष्ट आने पर उसका स्वागत भी सहर्ष करेंगे क्योंकि माँगने से न सुख मिलता है न दुःख मिलता है।
तीसरा लाभ होगा दुष्कर्मों का परित्याग, क्योंकि संसार के समस्त पाप सुख के लिए किए जाते हैं, दुःख के लिए नहीं। मनुष्य आर्थिक प्रलोभन के कारण झूठ बोलता है।
वह समझता है कि टकी सी जीभ थोड़ी हिलाने से हजारों के वारे-न्यारे हो जाएँगे और फिर उस धन से संसार के अनेकविध भोगों का आनंद लुट लूंगा। आचार्यश्री ने यह भी कहा कि शांत और सुखी जीवन बिताने के लिए ही नहीं अपितु जीवन के मुख्य लक्ष्य मुक्ति के लिए भी मनुष्य को शुभ कर्म करने चाहिए।