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चातुर्मासिक प्रवचन की अमृतधारा  बहा रहे वीरेन्द्रमुनिजी

चातुर्मासिक प्रवचन की अमृतधारा  बहा रहे वीरेन्द्रमुनिजी
वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ सेलम के महावीर भवन में जैन दिवाकर श्री चौथमलजी म सा के प्रपौत्र शिष्य एवं तरुण तपस्वी श्री विमलमुनिजी म सा के सुशिष्य वीरेन्द्रमुनिजी महाराज ने सेलम शंकर नगर स्थित जैन स्थानक में  चातुर्मासिक प्रवचन की अमृतधारा  बहा रहे  है जैन दिवाकर दरबार में  विमलशिष्य ने सुख विपाक सूत्र के माध्यम से श्रोताओं  को  संबोधित करते हुए कहा कि जम्बू स्वामी के पूछने पर आर्य सुधर्मा स्वामी फरमा रहे हैं कि  – अदिन शत्रु राजा की रानी धारणी अपने गर्भ का अच्छे प्रकर से सावधानी के साथ धर्म की आराधना साधना दया दान के द्वारा पालन कर रही थी,  आप बच्चे को कैसे बनाना चाहते राम महावीर बुद्ध गौतम स्वामी ऐवन्ता मुनि या चोर उच्चका डाक व्यसनी  जैसा भी बनाना चाहेंगे वैसा बना सकते बच्चा जैसा माता पिता के कार्यं कलापों को देखेगा वैसा ही संस्कार उसमें आयेंगे !
गुरुदेव कहते थे कि एक बार एक चौर  पुलिस के पकड़ में आया कैस चला –  उसने अपने जीवन में  बहुत सारी चोरियां की थी , मारना पीटना चोरी करना उसके बाये हाथ का खेल था, आखिर एक  दिन पकड़ा ही गया – कैस चला सारे प्रमाण ( सबुत ) उसके विरुद्ध थे जिसके कारण उसे सजा सुनाई गई थी !
उसके सारे अपराधों के देखते हुए उसे फांसी का सजा सुनाई गई ! निश्चित समय पर फांसी की तैयारी की जा रही थी तब उस से पूछा बोलो तुम्हारी अंतिम ( आखिरी ) इच्छा क्या है चोर बोला मैं अंतिम समय में अपनी मां से मिलना चाहता हूं पुलिस जाकर के उसकी मां  को लेकर के आये वह चौर मां के गले लगते हुए मां को कंठ  ( गले ) से  लगाते हुए उस ने मां का नाक अपने दांतो के बीच में दबा लेता  है – जिससे नाक कट गया और खून हो गया ! पुलिस वालों ने उसे अलग किया  !
जज साहब ने पूछा मान्यवर तुमने मां का नाक क्यों काटा – चौर बोला जज साहब इसने मुझे चोर बनाया इसलिये आज मैं फांसी के फंदे तक पहुंचा हूं  ! इस  माँ ने अगर शुरू में ही मुझे चोरी करने पर डांट फटकार लगाई होती तो आज मैं चौर नहीं बनता और न फांसी पर लटकने की नौबत आती!
जब मैं छोटी मोटी कर रहा था तभी मेरी मां दो थप्पड़ मार कर कान पकड़ कर कहती बेटा चौरी करना पाप है अपराध है इसलिये कभी चौरी नहीं करना परंतु इस माँ ने थप्पड़  के बदले प्रसन्न हुई खुशियां मनाई कि मेरा बेटा कितना होशियार हो रहा है  किसी को भी चौरी का पता नहीं चल रहा ! बताइये ऐसी मां को सजा मिलनी ही चाहिये कि नहीं ! देखा आपने मां चाहती तो उसे सुधार सकती थी अच्छा नागरिक बना सकती थी इसलिये माता-पिता को चाहिये कि बच्चों को संस्कार दें जिससे उनका भविष्य सुधर सके!
महारानी धारणी धर्म की जानकार थी, इसलिये  स्वाध्याय चिंतन तीर्थंकरों की जीवन गाथा ओं का स्मरण करते हुवे दान धर्म करते हुवे समय पूर्ण होने पर एक सुंदर पुत्र रत्न को जन्म दिया ! दासी ने आकर राजा को बधाई दी राजा ने भी प्रसन्न होकर बधाई देने वाली दासी को दासी पने से मुक्त करके उसकी  सात  पीढ़ी बैठ करके खाये इतना धन उपहार में दिया !
फिर राजा ने पुत्र का जन्मोत्सव  बड़े धूमधाम से मनाया! और अतिथियों का  स्वागत भोजन व उपहारों  से किया –  बच्चे का नाम करण करते हुए – कहा इसकी बाहे सुंदर होने से बच्चे का नाम सुबाहू कुमार रखते  हैं ! बच्चे के लालन-पालन के लिये 5 धाय  माता व 32 देश की दासियों को रखा गया जो बच्चे को एक पल के लिये दूर नहीं रखती – इस प्रकार धीरे-धीरे बच्चा बडा होता गया 8 साल का होने पर गुरुकुल में पढ़ने के लिये रखा गया!
          
         *शेष – अगले प्रवचन में*

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