कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा सत्य पुस्तकों में नहीं आत्मा में है। ज्ञान को नहीं ज्ञाता को पाओ। शास्त्र पढक़र आचरण में नहीं उतारा तो भगवान महावीर को पूरा नहीं आधा उतारा है। अंधेरा दिख रहा है तो प्रकाश करो, दुख है तो सुख की तलाश करो। बेहोशी है इसलिए जाग जाओ। मूर्छा ही दुख है। यदि दुखी हैं तो पिछला हिसाब देखो। पिछले जन्म में दीन-दुखियों की सेवा नहीं की बल्कि उनको सताया होगा। यदि सुखी हो तो पिछले जन्म में सेवा, दान, पूजा आदि का परिणााम है। जब तक पाप पकता नहीं फल मिलता नहीं। जब पाप पक जाता है जेल में सड़ता है एवं हाथ-पांव गलते हैं। दर-दर भटकता है। जो संतों पर विश्वास नहीं करते, अपने माता-पिता पर विश्वास नहीं रखते एवं सम्मान नहीं करते उनकी दशा हमेशा बुरी ही होती है। दुखी होने पर उन कारणों को जड़ से उखाड़ फेंकें और प्राणी सेवा, पूजा-भक्ति एवं संत सेवा करन...
चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा हमें मानव शरीर तो मिला है लेकिन मानव दृष्टि, भौतिक ज्ञान व समझ नहीं मिली इसलिए भटक गए। मान-सम्मान एवं भौतिक सामग्री में रम गए। हमारे पास बड़ी शक्ति है लेकिन उसका उपयोग नहीं जानते। धर्म की चार दीवारों में बांध दिया है। अपने-अपने संप्रदायों की जंजीरों में जकड़ दिया है। हमारी दृष्टि सिकुड़ गई है। अरिहंत एवं आत्मा का संशेषन नहीं होता। हम बाहर भटक रहे हैं। कैरियर ने कैरेक्टर छीन लिया है। चारित्र चला गया और चित्र एवं तस्वीर रह गई। सच्चा भक्त परमात्मा को देखने के बाद कहता है आपको देख लेने के बाद मन अन्यत्र आकर्षित नहीं होता। जब तक आपका परिचय नहीं हुआ था तब तक पागलों की भांति इधर-उधर भटक रहा था। जीव का निर्णय नहीं किया था। जबसे आपको देखा है, आपका परिचय हुआ है आप तक पहुंचा हूं यही मेरी साधना है और सागर का मधुर जल पीने क...
चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंतसागर ने कहा सज्जन वही है जो साधु प्रेमी है, शांत है, धर्म एवं चारित्र प्रेमी है। दुर्जन वही है जो साधु निंदक व धर्म विरोधी है, आचरणहीन व दूसरों से ईष्र्या-द्वेष रखता है। संसार प्रेमी व विषयभोगी है। मिट्टी शरीर से बेहतर है, वह अन्न, जल व शरण देती है। शरीर का सदुपयोग करने वाले को बुरे विचार नहीं आते, परिवार का हित सोचने व करने वाले के मन में विचार गलत कभी नहीं आते। आत्मशक्ति सबसे बड़ा पावर है जो सबको शक्तिमान बनाता है। शक्ति के सारे पुर्जे आत्मशक्ति से ही चल रहे हैं। शरीर का गलत उपयोग करके आदमी पत्थर जैसा बन जा सकता है एवं सदुपयोग कर सबको प्रकाशित कर सकता है। प्रतिदिन टीवी पर विकथाएं तो देखने को मिलती हैं लेकिन सत्पुरुषों की कथाएं बहुत मुश्किल से देखने को मिलती हैं। महापुरुषों की कथा से मन कभी नहीं भरता बल्कि पुण्य की वृद्धि ...
चेन्नई. कोण्डितोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा, पाप-पुण्य का हिसाब रखना जरूरी है। किसी का अपमान किया हैं तो उससे क्षमा मांगें। यही पुण्य-पाप का हिसाब है। यदि आदमी परमात्मा की भक्ति में डूब जाए, एकाग्र हो जाए, शुद्ध एवं शुभ भावों से भर जाए, तो उसके मन एवं आत्मा से कई प्रकार का अज्ञान, अंधकार, पाप एवं विचार समाप्त हो जाते हैं। पाप की विशेषता है कि वह जाने से पहले अपनी संतति छोडक़र जाता है यानी दूसरे पाप को छोड़ जाता है। हमारे जन्म-मरण की परम्परा सदियों पुरानी है। हमने सदियों से बाहर की गंदगी को अंतर में भरने का प्रयास किया है और अंतस के प्रकाश को बाह्य वस्तु देखने में बर्बाद किया है। हिंसा, झूठ, चोरी, क्रोध, मोह, माया ये सब पाप कर्म हैं। शरीर रूपी घड़ा सोने के समान है मगर हमने उसमें जहर का कचरा भर रखा है। आदमी अहंकार के जोश में धर्म का अपमान करता है। जवानी के...
चेन्नई. कोंडीतोप स्थि सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंतसागर ने कहा भक्त की पवित्रता परमात्मा से जोड़ती है। सरलता परमात्मा के करीब ले जाती है एवं निष्कपटता परमात्मा बनाती है जो आत्मीयता से मिलती है। सत्य का रसपान कराती है। भक्त जब भगवान की भक्ति में डूबता है तो परमात्मा से कहता है मैं एकमात्र तुम्हारा और तुम मेरे हो। मैं चाहे निंदा का पात्र बनूं या प्रशंसा का। हंसाना है या रुलाना, पास बुलाना है या दूर भगाना है, तृप्ति का नीर बरसाना है या अतृप्ति की आग लगानी है। फूल बनकर महकूं या शूल बनकर चुभूं यह सब तुम्हारी मर्जी पर है। आत्मा की अनंत शांति को प्रकट करने तुम्हारी शरण में आया हूं। भगवान की शरण में भिखारी बनकर या पुजारी बनकर जाएं। सुदामा व मीरा की तरह बनकर जाएं तो हृदय का कमल खिल जाएगा। भगवान मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार करें। मेरी शक्ति नहीं है कि मैं बड़ा बनूं। आपके गीत गाऊं और ल...