ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि वैभव शब्द बड़ा आकर्षक, मोहक एवं नैतिक शब्द है। वैभव को समझने के लिए विभु को समझना जरूरी है। विभु बनकर ही वैभव पाया जाता है। वैभव दो प्रकार के हैं आंतरिक व बाह्य। उन्होंने कहा कि सहनशीलता कड़वी होती है परन्तु उसका फल मीठा होता है। सहनशीलता का टॉनिक बाजार में नहीं मिलता। इसके लिए स्वयं को पुरुषार्थ करना होता है। सहनशीलता का उल्टा है उत्तेजना, 18 पापों में अधिकांश पाप उत्तेजना के होते हैं। नारी सहनशीलता की जीती जागती मिसाल है। नव माह तक गर्भ का प्रतिपालन करने के बाद मां का गौरवशाली पद प्राप्त करती है। अपने घर परिवार में शांति से रहने के लिए मिलकर रहना, सम्यक कहना व सब कुछ सहना। साध्वी अपूर्वा ने कहा कि जीवन एक दावत है। मित्रता स्वीट डिश। सच्चे मित्र हीरे की तरह कीमती। झूठे मित्र पतझड़ के पत्तों की तरह। मानव जगत सभ्यता एवं संस्कृति का जगत...
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि भाग्य रथ के दो पहिए है, बुद्धि और पुरुषार्थ। बुद्धि तो पूर्व भव के क्षयोपशम से प्राप्त होती है और पुरुषार्थ से खिल उठती है। पुरुषार्थ के अनुसार ही भाग्य का निर्माण होता है। उद्यम के द्वारा ही मानव महामानव बनता है। आत्मा से परमात्मा, नर से नारायण और देह से देहातीत बनने के लिए पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। धर्म, अर्थ , काम और मोक्ष ये चार प्रकार के पुरुषार्थ है। धर्म और मोक्ष कल्याण की ओर ले जाते है। अर्थ और काम संसार के भाव भ्रमण को बढ़ा देते है। सद्पुरुषार्थ की ओर बढ़कर चरम लक्ष्य को पा सकते है। आठ कर्मों का नष्ट हो जाना ही मोक्ष है। उसमें पुरुषार्थ का प्रथम स्थान बताया है। इसलिए पुरुषार्थ सोच समझकर और सही मायने में किया जाए। इस अवसर पर सोनाली लुंकड़ ने आठ उपवास के प्रत्याख्यान लिए।
एस.एस.जैन संघ में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि लोच शब्द उलटा करने पर चलो बनता है। चलना ही मोक्ष है और लोच की प्रक्रिया आत्मा को कर्म से मुक्ति दिलाकर मोक्ष की ओर ले जाती है। लोच से मोह की पराजय होती है और ज्ञानतंतु सक्षम बनते हैं। देह की सुदंरता मुंह से होती है और मुंह की सुदंरता बालों से होती है। बालों का त्याग करना ही लुंचन है। व्यावहारिक एवं आरोग्य की दृष्टि से भी लोच का महत्व है। लोच दिमाग के लिए रक्त संचार करता है। देह का दमन, विषयों का वमन और कषायों का शमन कर्म निर्जरा के लिए शार्ट कट है। लोच महातप है। तीर्थंकर प्रभु ने भी पंचमुष्ठि लोच किया था। उनका अनुसरण करते हुए आज भी जैन संत आज भी राग का त्याग कर के लोच करते है। साध्वी सुप्रतिभाश्री ने धन की तीन गति दान,भोग और नाश बताई है और कहा कि जंग खाकर नष्ट होने के अपेक्षा जीर्ण होकर नष्ट होना अच्छा है।
ताम्बरम जैन स्थानक में साध्वी धर्मलता एवं अन्य साध्वीवृंद के सान्निध्य में मरुधर केशरी मिश्रीमल की जन्म जयंती मनाई गई। इस मौके पर साध्वी ने कहा मरुधर केशरी मिश्रीमल ने बीस साल की अवस्था में ही संयम अंगीकार करने के बाद जैन और अन्य धर्मों का तलस्पर्शी अध्ययन किया। नौ भाषाओं का ज्ञान करके जीवन मेें नौ ही पदों पर आसीन हुए। उन्होंने 180 रचनाएं की। वे स्वभाव से कडक़ लेकिन हृदय से पूरे दया से ओतप्रोत थे। उन्होंने हम सभी गुरु की दौलत हैं, गुरु की नसीहत ही हमारी असली वसीयत है। साध्वी वरिष्ठ प्रवर्तक रूपमुनि के जीवन पर भी प्रकाश डालते हुए कहा गुुरुदेव जीवदया प्रेमी, देश व समाज सेवा में अग्रणी थे। उन्होंने हजारों परिवारों को व्यसनमुक्त कराया। इस मौके पर सजोड़े जाप, सामायिक का तेला व सामूहिक एकासन का आयोजन हुआ। रक्षाबंधन के बारे में साध्वी ने कहा यह भारतीय संस्कृति का लौकिक पर्व है जिसके पीछे प्रत्येक ...
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा गंगा में स्नान करने से केवल तन पवित्र होता है। गुरु का गुणगान करने से तन, मन और आत्मा तीनो पवित्र होती है। महान पुरुष प्रारम्भ में लघु फिर विराट और अंत में अनंत हो जाते है। उनका चिंतन युग का चिंतन हो जाता है। हम सभी की दौलत गुरु की बदौलत होती है। गुरु की नसीहत ही हमारी असली वसीहत है। मरुधर केसरी मिश्रीमलजी की 128वीं जन्म-जयंती पर सतीश्री ने कहा की गुरुदेव जीवदया के प्रेमी थे।
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा तपस्या से समस्या का समाधान एवं जीवन निर्माण होता है। तप जीवन की सबसे बड़ी कला एवं वासना पर आध्यात्मिकता पर विजय है। स्वत: कष्ट उठाने की कला का नाम भी तप ही है। तप जीवन का प्रथम व अंतिम चरण है। तपे बिना सोना चमक नहीं सकता एवं कोई घट पक नहीं सकता, इसी प्रकार तप बिना कोई साधक सिद्ध नहीं हो सकता। तपस्या से आत्मा परमात्मा के स्वरूप को पा लेती है। तपस्या से अस्थिर स्थिर हो जाता है। सरल, दुर्लभ-सुलभ, दुसाध्य-साध्य बन जाता है। आत्मा से परमात्मा बनने के लिए इस शरीर को तपाना ही होगा। भगवान ने आहार, मैथुन, परिग्रह संज्ञा को तोडऩे ेके लिए क्रमश: तप भाव शील दान की आराधना करने की प्रेरणा दी। तप की महत्ता सभी धर्मों में है।
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा शरीर का आधार आहार है जिसके बिना शरीर का निर्वाह नहीं हो सकता। आहार हितकारी और परिमित होना चाहिए। भले ही खाने के लिए बहुत सी वस्तुएं हैं लेकिन पेट को डस्टबिन नहीं बनाएं। साध्वी ने कहा स्वाद के लिए खाना अज्ञानता एवं स्वास्थ्य के लिए खाना समझदारी व साधना के लिए खाना योग है। आहार तीन प्रकार का होता है-सात्विक आहार जो मानसिक भावना को पवित्र करता है। राजसिक आहार जो जीवन में विलासिता पैदा करता है तथा तामसिक आहार विकार उत्पन्न करता है। आहार और विचार दोनों जुड़वां भाई हैं। ये दोनों अलग नहीं रह सकते। जैसा आहार होगा वैसे ही विचार पैदा होंगे। दिन में एक खाना आहार, दो बार खाना भोजन और बार-बार खाना, खाना भी नहीं। एक बार खाने वाला योगी, दो बार खाने वाला भोगी एवं बार-बार खाने वाला रोगी होता है। साध्वी अपूर्वाश्री ने कहा क्रोध जीव को नरकगामी बना देता है।...
चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा पाप का फाटक बंद करें। डरना है तो किसी अन्य से नहीं पाप से डरें। लिफ्ट का दरवाजा बंद नहीं करें ताकि ऊपर न जा सकें। पाप का फाटक बंद नहीं होगा तो जीवन की ट्रेन सुख की पटरी पर कैसे दौड़ेगी, अत: प्रतिदिन अपना निरीक्षण करें। पाप को पापरूप में पहचानें एवं आत्मसाक्षी से उसे स्वीकारें। हृदय से पश्चाताप करने से ही पाप का फाटक बंद हो पाएगा। मन की गांठें खोलो और पापों को धो डालो। भूल को छिपाने वाला इन्सान भव बिगाड़ लेता है जबकि भूल स्वीकार करने वाला स्वयं को सुधार लेता है। पाप चाहे काम रूप में हो या कल्पना रूप में, उसे स्वीकारना जरूरी है। यह न सोचें मैं पाप एकांत में एवं गुप्त में कर रहा हूं, कर्म की अदालत इतनी सूक्ष्म है कि मन से बुरा सोचा या सपने में भी किसी को गिराने, मारने, लडऩे की सोचो, कर्म की अदालत उसे नरक व तिर्यंच के स्टेशन पर पहुंच...
चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा माया कैंची जबकि सूई जोडऩे का काम करती है। धन वाले को चोरों की भय होता है और कपटी को अपनी पोल खुलने का डर सताता है। छल, कपट, प्रपंच आदि माया के ही पर्यायवाची हैं। मायावी जीव बहुरूपिया होता है। ऊपर से सरल बनता है और अंदर से कपट करता है। ऊपर से तो मीठी छुरी जैसा और अंदर से झूठा होता है। उसकी कथनी और करनी में अंतर होता है। माया शल्य एवं केशर की गांठ की तरह होता है जो सारी साधना को नष्ट कर देती है। साध्वी ने कहा गिरगिट का रंग, कपटी का मन और नेता का दंड कभी भी पलट सकता है, अत: हमें माया कषाय से दूर रहना है। सहमंत्री खेमचंद बोहरा ने बताया कि नौ अगस्त को आचार्य जयमल का सामूहिक जप-तप अनुष्ठान किया जाएगा।
मानवता की राह फूलो नहीं बल्कि काटो भरी होती है। फूल तो स्वभाव से कोमल होता है पर शूल को कोमल बनाना आपकी विशेषता को दर्शाता है। यही गुण गुरुदेव सौभाग्यमालजी में भरे पड़े थे। ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने अपने प्रवचन में कहा की हमे खुद को ऐसा बना चाहिए जिससे की शूल भी फूल में बदल जाए। जन्म तिथि और पुण्य तिथि महापुरषो की मनाई जाती है। महापुरुष धरती पर महावीर का सन्देश सुनाने हेतु अवतरित होते है। साध्वी ने श्री सौभाग्यमालजी की 34वी पुण्य तिथि पर कहा की उनका जन्म 1953 में हुआ था। जब वो दो वर्ष के तभी उनके ऊपर से माता पिता का साया उठ गया। इसके बावजूद उन्होंने धर्म का मार्ग अपनाया। वे अपने प्रवचन में गीता, बाइबिल, कुरआन आदि ग्रन्थ का उल्लेख करते थे। उनका कहना था की मनुष्य को धर्म विशेष को नहीं बल्कि उसकी अच्छाइयों को स्वीकार करना चाहिए। श्रमण संघ की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान है।
चेन्नई. ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने प्रवचन में तप का अर्थ बताते हुए कहा जिस कार्य से कर्मों को तपाया जाए वही तप है, इच्छाओं पर नियंत्रण करना तप है। उन्होंने कहा तप एक लिफ्ट के समान है जो एक मंजिल से दूसरी मंजिल की ओर ले जाती है और अंत में जीवात्मा मोक्ष की सिद्धि पर आरूढ होकर भव भ्रमण से मुक्ति प्राप्त करता है। साध्वी ने कहा तप एक रामबाण औषधि है जिससे बड़े-बड़े रोग भी मिट सकते हैं। कर्म रूपी मैल से आत्मा को शुद्ध करने की ताकत तपस्या में ही है। तप से कभी निदान नहीं करना चाहिए।
चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा पाप मिटाने के लिए धर्म करना जरूरी है। जब तक विषयों में मस्ती, कषायों से दोस्ती होगी तब तक धर्म में सुस्ती रहेगी। विषय-कषाय पतन के गर्भ में धकेलने वाले हैं। विषयों के बजाय धर्म की मस्ती में लगने से ही कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा। जब भी अशुभ कर्मों का उदय हो तो समझ लें पुराना कर्जा उतरने वाला है। सहना है तो कहना क्यों? भोगना है तो भागना क्योंï? क्योंकि आप ट्रेन और प्लेन से चलते हैं। अत: धर्मक्रिया करने से पहले हमारे मन में अहोभाव और धर्म करते समय आनंद और उत्साह तथा धर्म कररे के बाद अनुमोदना के भाव हों। धर्म की सुस्ती दूर करनी हो तो समझ, शक्ति और समय का सदुपयोग करें। भगवान ने हमें रात-दिन के २४ घंटे दिए हैं इसमें हमें २४ मिनट तो धर्म के लिए निकालनी ही चाहिए। साध्वी ने कहा जीवन में धर्म का पैमाना जानना जरूरी है। क्रोधादि कषाय अंगार,...