संयमरत्न विजयजी

पाश्र्वनाथ की साधना हमें राग-द्वेष से दूर रहने की प्रेरणा देती है: संयमरत्न विजयजी

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजयजी ने कहा प्रभु पाश्र्वनाथ की साधना हमें राग-द्वेष से दूर रहने की प्रेरणा देती है। नेमिनाथ चरित्र से हमें जीवों के प्रति करुणा भाव रखने की शिक्षा मिलती है, मूक पशुओं की रक्षा के लिए नेमिनाथ ने राजुल जैसे सुंदर स्त्रीरत्न का त्याग कर दिया, नव-नव भवों की प्रीत एक साथ तोड़ दी। आदिनाथ परमात्मा ने धन्ना सार्थवाह के भव में साधुओं को शुद्ध घी का आहार  समर्पित कर समकित प्राप्त किया था। अभिग्रहधारी प्रभु वीर ने इंद्रभूति के मन में चल रहे जीव के प्रति संदेह का समाधान करते हुए कहा जिस प्रकार दूध में घी, तिल में तेल, काष्ठ में अग्नि, फूल में सुगंध और चंद्र की कांति में अमृत होता है, उसी प्रकार शरीर में आत्मा का निवास रहता है। प्रभु पाश्र्वनाथ के चरित्रानुसार जगत में कमठ की तरह दुर्जन और धरणेन्द्र की तरह सज्जन ये दो तरह के जीव रहते हैं, लेकिन...

एकाग्रतापूर्वक परमात्मा का ध्यान करने से सिद्धि प्राप्त होती है: संयमरत्न विजयजी

मन की एकाग्रता से नर भी नारायण बन जाता है चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित संयमरत्न विजयजी ने कहा यदि हम एकाग्रतापूर्वक परमात्मा या किसी मंत्र का ध्यान करे तो शीघ्रता के साथ हमें सिद्धि प्राप्त हो सकती है। नर का मन तो वानर की तरह चंचल है जो इधर से उधर भटकता रहता है। मन की एकाग्रता से नर भी नारायण बन जाता है। साधना के समय मन विराधना की ओर जाने लगता है, इसका एकमात्र कारण है-हमारी रुचि। अपने जीवन को अच्छा बनाना हो तो अपने अंदर आना होगा। जीवन को सफल बनाकर सुफल प्राप्त करना हो तो अपनी शक्तियों को केन्द्रित एवं मन को एकाग्र करना होगा। यदि धरती से जल प्राप्त करना हो तो उसे एक ही स्थान पर सौ फीट खोदना होता है, सौ स्थानों पर एक-एक फीट का गड्ढा खोदने से पानी भी नहीं मिलता और पुरुषार्थ भी निष्फल हो जाता है।   जिसमें हमारी रुचि होती है उसमें हमारा मन स्वत: ही संलग्न हो जाता है अ...

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